झूठ के पैरों के सहारे चला किसान आन्दोलन हुआ बेदम

झूठ और दुष्प्रचार के सहारे कृषि कानून विरोधी आन्दोलन को जिस तरह से विपक्ष द्वारा हवा दी जा रही है, वह स्वस्थ लोकतंत्र की सेहत के लिये ठीक तो नहीं ही कहा सकता। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कतिपय किसान संगठनों द्वारा चलाया जा रहा आन्दोलन उन कानूनों के खिलाफ है, जो वर्तमान में अस्तित्व में ही नहीं हैं।

इस आन्दोलन के लिये प्रमुख रूप से जिन दो झूठी बातों का प्रचार करके किसानों को भ्रमित किया जाकर उनमें भय पैदा किया जा रहा है कि, सरकार एम.एस.पी. खत्म करने जा रही है, दूसरा अनुबंध खेती वाले प्रावधान से पूंजीपति राहुल गांधी के अनुसार मोदी के तीन चार मित्र किसानों की जमीन छीन लेंगे। इस झूठ का असर किसानों पर होना स्वाभाविक है।

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उन्हें भरोसा दिलाना कितना कठिन है कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला प्रधानमंत्री जी संसद में अपना बयान भी दे चुके हैं कि एम.एस.पी. था, है और रहेगा। अब राकेश टिकैत अपने झूठ से मुकर कहने को मजबूर हुआ है कि ‘हमने कब कहा कि सरकार एम.एस.पी. खत्म कर रही है। पहले इन नेताओं, द्वारा यही बार-बार कहा जा रहा था कि सरकार एम.एस.पी. से भाग रही है।

यह वैसा ही झूठा अभियान है, जैसा नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ शाहीनबाग से चलाया जा रहा है, लगभग वहीं ताकतें अब किसान नेताओं का चोला पहनकर सामने हैं। यह तथ्य अत्यन्त विचारणीय है कि ऐसे आन्दोलनों के जरिये जिन स्थानों को बलात् धरनास्थल बनाया गया है, उससे स्थानीय लोगों,

ग्रामवासियों का आवागमन प्रभावित होने के साथ-साथ उनका काम-धंधा, व्यवसाय ठप्प पड़ गया है, नौकरी पेशावर्ग और मजदूर अपने कार्य स्थल पर नहीं पहुंच पा रहे हैं, मरीजों को अस्पताल या चिकित्सा के लिये ले जाने में मुश्किलें खड़ी हो रही हैं। क्या अपने फायदे के लिये किसानों को दूसरों को नुकसान पहुंचाने का अधिकार भी मिल गया है।

इन किसान नेताओं व प्रदर्शनकारियों ने ऐन 26 जनवरी को ट्रेक्टर परेड निकालने की जिद पर अड़कर लाल किले पर जो शर्मनाक कृत्य किये, क्या वे सब जायज माने जा सकते हैं? सरकार और किसान नेताओं के बीच ग्यारह दौर की बातचीत चल चुकी है इसके बाद भी इस झूठ को प्रचारित किया जा रहा है  कि सरकार इन किसान नेताओं की कोई बात मानने और सुनने को तैयार नहीं है।

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प्रारम्भ से अब तक झूठ, कोरे झूठ का ही सहारा इन किसान नेताओं द्वारा लिया जाता रहा है।सरकार बिजली संशोधन विधेयक वापिस लेने, पराली जलाने पर दंड कार्रवाई का प्रावधान हटाने, कृषि कानूनों में संशोधन कर डेढ़ साल तक रोकने, तीनों कानूनों की बिन्दुवार समीक्षा करने, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लिखित गारटी देने, अनाज के निजी खरीददारों पर टेक्स लगाने, अनुबंध खेती के मामले में ऊँची अदालतों में अपील कर अधिकार देने आदि पर सहमत है,

पर किसान नेता अपनी जिद पर कायम, अड़े हुये हैं। कृषि कानूनों के लिये सर्वोच्च न्यायालय समीक्षा हेतु समिति गठित कर रही है। उसका भी ये किसान नेता बहिष्कार कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा रखी है। इसका तात्पर्य तो यही है कि वे सर्वोच्च न्यायालय की बात भी मानने तैयार नहीं हैं।

किसान नेता न सरकार की सुन रहे हैं, न ही भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सर्वोच्च न्यायालय की।
किसान नेताओं के तार ब्रिटेन, कनाडा, पाकिस्तान से जुड़े प्रतीत होने लगे हैं। इन देशों से किसानों के आन्दोलन को समर्थन दिये जाने के निहितार्थ को गम्भीरता से समझे जाने की जरूरत है। पूर्व इतिहास से सबक मिलता रहा है

कि कतिपय राजनीतिक वर्ग के लोगों ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी की है और उसका दुष्परिणाम देश ने भुगता भी है। ये दुष्परिणाम भारत ने सदियों तक झेले हैं। देश के प्रत्येक नागरिक का भी यह दायित्व है कि वह सजग होकर यह सुनिश्चित करे कि देश के दुश्मनों को देश के आंतरिक स्थितियों में दखल देने का कोई अवसर न मिल सके।

ब्रिटेन और कनाडा के साथ अन्य देशों के कतिपय समूह खालिस्तानी मुहीम को हवा देने सक्रिय होते रहे हैं, वे भी अब भी सक्रिय होते नजर आने लगे हैं। ऐसी देश विरोधी ताकतें भारत को बदनाम करने की कोशिश कर रही है, एक सुनियोजित अभियान चला रही है। विपक्षी दल भी अब तक बेनकाब हो चुका है,

किसान आन्दोलन का समर्थन तो कर रहा है, लेकिन कृषि कानूनों में खामी क्या है? यह बतलाने
में अबतक असफल रहा है। इसी से उसका खोखलापन सामने आ चुका है। वे कृषि कानूनों की समीक्षा करने से भी इन्कार कर रहे हैं। किसान नेताओं की झूठे प्रचार पर आधारित हठधर्मिता को क्या कहा जाय?

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इस आन्दोलन को लेकर जिस तरह की राजनीति हो रही है, वह गम्भीर चिन्ता का विषय है। जिस तरह की बयानबाजी जारी है, उससे आंदोलन तो कम वोटों की राजनीति और राजनीतिक खींचतान ज्यादा देखी जा रही है। कांग्रेस ऐसी विपक्षी पार्टी है जिसका न तो कोईसिद्धांत है, न ही ईमानदार कार्यशैली। अब देखिये केरल में उसकी सत्ता है,

वहां न तो मंडी है, न ही उपज बेचने की कोई सार्थक व्यवस्था है। केरल एक मात्र ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस और कम्युनिष्टों का शासन रहा है। यहां किसानों के पक्ष में जिन नियमों को लेकर विरोध रहा है, वैसा कुछ किसानों की भलाई के लिये केरल में भी तो करना चाहिये। राहुल गांधी के अनुसार कृषि बाजार 40 लाख करोड़ का है,

नये कानून से ये बाजार अम्बानी-अडानी के कब्जे में चला जायेगा। कांग्रेस के शासन में किसकी जेब में जाता था, यह प्रश्न भी तो विचारणीय है, जिसका उत्तर पूछा जा रहा है। एक प्रश्न और उठाया जा रहा है कि क्या आंदोलनकारियों को अपनी स्वार्थपूर्ति तथा राजनीतिक लाभ की छिपी मंशा के पीछे देश के मान-सम्मान-शान से भी कोई सरोकार है या नहीं?

और न ही आंदोलन के कारण जनता को हो रही परेशानियों से कुछ लेना-देना रह गया है। अब तो विदेशी शक्तियाँ भी आंदोलन को किसी अन्य दिशा की ओर मोड़ देना चाहती हैं। इन सबका एक ही मकसद है कि विश्व पटल पर भारत को नीचा दिखाना। इनमें पाप गायिका, पोर्नस्टार मियां खलाफा आदि ऐसी शख्सियत है।

जिन्हें न तो किसानों की समस्या का ज्ञान है, न ही इस मुद्दे से कुछ लेना देना है। ग्रेटा थानवर ने तो पूरी साजिश ही रच डाली, जो उसके टूलकिट से साफ जाहिर हो चुका है। आंदोलनकारी नेता अपनी जिद पर अड़े रहे। प्रशासन और पुलिस को मिल रहे अशान्ति के सूत्रों एवं दिशा निर्देशों का भी उल्लंघन किया गया,

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परिणाम स्वरूप लालकिले पर तांडव हुआ जिसमें पांच सौ से अधिक पुलिस कर्मी एवं अधिकारी आहत हुये। इससे आंदोलनकारी कलंकित भी हुये, उतना ही देश तिरंगे के अपमान से कलंकित और शर्मसार हुआ। किसानों के इस उत्पात ने आंदोलन के प्रति उपजी सहानुभूति की दिशा ही बदल गयी। इसके कारण आंदोलनकारियों का बिखरना स्वाभाविक था।

लेखक -डॉ. किशन कछवाहा

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