अफगानिस्तान पर तालिबानी कब्जे के बाद अफगान शरणार्थियों की संख्या में अचानक वृद्धि होना विश्व के लिये एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। इस बढ़ती तादाद ने तरह-तरह की समस्यायें पैदा कर दी हैं।

यूनाईटेड नेशंस हाई कमिश्नर फार रिफ्यूजीस द्वारा जारी किये आँकड़ों के हिसाब से सिर्फ इसी वर्ष कम से कम पाँच लाख अफगानी शरणार्थी अफगानिस्तान छोड़कर जा चुके हैं। वैसे तो इस प्रकार की व्यवस्थापन की प्रक्रिया न तो आश्चर्य में डालने वाली है और न ही पहली है। और इस संख्या को अंतिम कड़ी के रूप में भी नहीं देखा जा सकता। वे देश जरूर निश्चिन्त हो सकते हैं, जो इस समस्या से अब तक प्रभावित नहीं हुये हैं। अभी तो यह चिन्ता उन देशों को घेरे हुये है, जहाँ ये शरणार्थी शरण लेने पहुँच चुके हैं तथा अभी भी पहुंचते जा रहे हैं।

वर्तमान भयावह स्थिति यह बन चुकी है कि विभिन्न देशों में बनाये गये शिविरों में करीब आठ करोड़ से अधिक लोग पनाह लिये हुये हैं। इसके लिये कौन जिम्मेदार है, किसे दोष दिया जाये – इससे सारा विश्व अब तक भलीभाँति अवगत हो चुका है। इसे कतिपय देशों द्वारा खतरे की दृष्टि से भी देखा जा रहा है। दयनीय स्थिति यह है कि ये शरणार्थी लगभग  नारकीय जीवन जीने मजबूर हैं। इसका दूसरा पहलू यह है कि इन शरणार्थियों को शंका की नजर से भी देखा – समझा जा रहा है।

शरणार्थियों की समस्या - AFEIAS

अल्जीरिया, इथोपिया, अंगोला, काँगो, युगांडा, ग्रेट लेक्स, दारफुट, नाईजीरिया, सूडान सोमालिया, वेस्टर्न सहारा, लीबिया, सीरिया, ईराक और अफगानिस्तान जैसे देशों से बड़ी संख्या में लोग आये। लेकिन उदारतापूर्वक व्यवस्थायें अब भारी पड़ने लगी है। अब इस पलायन को एक कठिन समस्या के रूप में समझा जाने लगा है।

जर्मनी से प्रकाशित ‘‘दैनिक मेन हाईमर मार्गन’’ समाचार में छपे लेख के अनुसार जर्मनी और यूरोप में बहुत बड़े स्तर पर हो रहा यह अप्रवासियों का आगमन राष्ट्रीय समस्या तो है ही, इसके अलावा यह समस्या पूरे यूरोप के लोगों की एक जुटता को भी खतरे में डाल रही है। अन्य देशों के प्रमुख भी इसी आशय के विचार व्यक्त कर चुके हैं।

यह खतरा उस समय ज्यादा गम्भीर बनने लगता है जब ताकत के बल पर सत्ता पर काबिज हो जाने वाले अफगानी आतंकी तालिबानी यह धमकी देते हैं, कि वे अब काबुल पर कब्जा कर लेने के बाद ग्लोबल जिहाद जैसे कदम भी उठा सकते हैं।

एक अनुमान के अनुसार अब तक 26 लाख अफगान शरणार्थी दुनिया भर के विभिन्न देशों में शरण लिये हुये हैं। पिछले वर्षों इराक के मौसुल को जिस आतंकी नरसंहार ने अपनी गिरफ्त में लिया था उसका दायरा बढ़ा है। यह नरसंहार की मानसिकता देशों की सीमाओं को भी लाँघ रही है। आतंक और वह भी मजहबी आतंक। यह मजहबी उन्माद वैश्विक बीमारी है। इस जहरीले खतरे को समाप्त करने के लिए विश्व के देशों को ही जूझना पड़ेगा। मजहबी कट्टरता जीवन विरोधी है और लोकतंत्र जीवन समर्थक विचारधारा है।

आज विश्व को वर्तमान परिदृश्य से सबक लेने की आवश्यकता है क्यों कि तालिबानी जैसी आतंकी विचारधारा एक देश नहीं वरन् सम्पूर्ण मानवता को खतरा है। इस सोच को, ऐसी खतरनाक मंसूबों वाली विचारधारा को समाप्त करना अत्यन्त आवश्यक है।

बड़े-बड़े रणनीतिकार इस तथ्य को नजर अंदाज कर जाते हैं कि तालिबान वह नाम है, जो पिछले तीस वर्षों से कुख्यात आतंकियों का एक समूह बन गया है। तालिबान का पूरा परिचय आखिर क्यों छिपाया जाता है। ‘तालिबान’ का अर्थ है छात्र, किसके छात्र या विद्यार्थी? देवबंद मदरसों के? यह बात छिपी है भी नहीं। उसी शिक्षा या सीख को तालिबान प्रयोग में ला रहे हैं, जो विश्वभर में गत 14 सौ वर्षों में इस्लामी आक्रमणकारियों और शासकों ने लागू किया। तब सारे विश्व मेंअनजान बनने की कोशिश क्यों की जाती है और कब तक की जाती रहेगी?

लेखक:-डाॅ. किशन कछवाहा