आत्मनिर्भर एवं स्वावलम्बी भारतीय अर्थव्यस्था

प्रस्तावना – विगत दशकों में भारत का आर्थिक विकास उत्साहवर्द्धक रहा है ,किन्तु अभी भी यह विश्व में उस स्थान को प्राप्त नहीं कर सका है जिसका यह वास्तव में हकदार है । इसका कारण है देश में समस्याओं का अम्बार लगा होना, जिनका समाधान एक कठिन चुनौती बनकर हमारे सामने खड़ा है ।

उदारीकरण नीति को अपनाने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।  परंतु ,भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने  के लिए आयात को सीमित करते हुए स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देना होगा व निर्यात पर अधिक बल देना होगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था-

भारतीय अर्थव्यवस्था को मोटे तौर पर तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है:

(i) प्राथमिक या कृषि क्षेत्र-

इस क्षेत्र में कृषि और इसकी सहयोगी गतिविधियाँ शामिल हैं जिनमें डेयरी, पोल्ट्री, मछली पकड़ने, वानिकी, पशुपालन आदि शामिल हैं। प्राथमिक क्षेत्र में, अधिकांश सामान्य प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके उत्पादित किए जाते हैं, क्योंकि भारत एक अति-कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। इसलिए, यह क्षेत्र आर्थिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ii) द्वितीयक या विनिर्माण क्षेत्र-

इस क्षेत्र को औद्योगिक क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। इस श्रेणी में सभी प्रकार के विनिर्माण क्षेत्र जैसे बड़े पैमाने और छोटे पैमाने शामिल हैं। लघु और कुटीर उद्योगों में कपड़े, मोमबत्ती, मुर्गी पालन, माचिस की डिब्बी, हैंडलूम, खिलौने आदि शामिल हैं। ये इकाइयाँ बहुत बड़ा रोजगार प्रदान करती हैं। दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर उद्योग जैसे लोहा और इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, रसायन, उर्वरक, जहाज निर्माण आदि हमारे घरेलू उत्पादन में एक बड़ी राशि का योगदान करते हैं।

(iii) तृतीयक या सेवा क्षेत्र-

यह क्षेत्र परिवहन, संचार, बैंकिंग, बीमा, व्यापार और वाणिज्य जैसी विभिन्न सेवाओं का उत्पादन करता है, जिसमें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों तरह के व्यापार शामिल हैं। इसके अलावा, सभी पेशेवर सेवाएं जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वकील आदि सेवा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। सरकार द्वारा नागरिकों के कल्याण के लिए प्रदान की जाने वाली सेवाएं भी तृतीयक क्षेत्र में शामिल होती हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था में स्वदेशी-

भारत तभी शक्तिशाली बन सकता है जब उसके छोटे-छोटे उद्योग धन्धों को विकसित करके नई प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाए। भारत को सशक्त और विकसित बनाने में स्वदेशी आंदोलन ने अपनी अहम भूमिका है।

चाहे गांधी जी द्वारा चलाया स्वदेशी आंदोलन हो या अन्य किसी महापुरुष द्वारा शुरू किया आंदोलन। सभी ने मेक-इन-इंडिया पर जोर दिया। उन्होंने स्वदेशी भारत का सपना साकार करने के कई सिद्धांत बताए। इनमें विकेंद्रीकरण ग्रामीण आधारित अर्थव्यवस्था कामगार आधारित अर्थव्यवस्था  पर्यावरण संबंधी अर्थव्यवस्था प्रमुख हैं।

स्वदेशी भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार बिंदु है।हमें अपने देश में बनी हुई वस्तुओं का प्रयोग करके इस स्वदेशी आंदोलन को कामयाब बनाना होगा। कला हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। 

भारतीय अर्थव्यवस्था में स्वदेशी की भूमिका –

हमारे शास्त्रों में 64 कलाएं विद्यमान है।  इन कलाओं का  घरेलू और लघु उद्योगों में विनिर्माण के लिए किया जा सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदान कृषि क्षेत्र का है परंतु हमारी कृषि आधुनिक ना होकर परंपरागत है इसका एक मुख्य कारण है कि मशीनों का महंगा होना

  जो कि कृषि में कार्यों हेतु प्रयोग किए जाते हैं यह मशीनें या तो विदेशों से आयात किए जाते हैं यह अपने ही देश में बनाई जाती है। अपने देश में बनाई जाने वाली मशीनें महंगी होती है क्योंकि इनके पुर्जे विदेश विदेशों से मंगाए जाते हैं।

यदि यही कलपुर्जे लघु उद्योग स्थापित करके व विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देते हुए अपने ही देश में बनाए जाए तो कृषि कार्य हेतु उपयोग में लाई जाने वाली मशीनों की कीमत अपेक्षाकृत कम होगी। जिससे आम किसान इसको खरीद के कृषि हेतु प्रयोग कर सकते हैं और इन्हें निर्यात भी किया जा सकता है।

 तृतीय क्षेत्र जो कि सेवा क्षेत्र है इसमें भी हम विदेशों द्वारा बनाई गई वेबसाइट व एप्लीकेशनों का उपयोग करते हैं जिससे कि हमारे देश का बहुत सारा पैसा बाहर जाता है। यदि हम अपने देश में ही ऐसी वेबसाइटों और ऐप के निर्माण हेतु,

अपने देश के युवाओं को प्रेरित करें तो इससे हमारे देश में बेरोजगारी में कमी आएगी अन्य देशों के एप व वेबसाइट व अन्य सॉफ्टवेयर उपयोग कर दो हमें कमी आएगी जिससे हमारे देश का पैसा देश में ही रहेगा।

तृतीय क्षेत्र का भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत ही अहम योगदान है और आ हमारे पास इस क्षेत्र से संबंधित तकनीकी व अन्य सुविधाएं आसानी से उपलब्ध है।अतः हम अपने देश में स्वदेशी  विनिर्माण  को प्रेरित करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नए मुकाम तक पहुंचा सकते हैं।

उपसंहार – इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति को देखते हुए  हमें स्वदेशी विनिर्माण व स्वाबलंबन पर जोर देना होगा इससे हमारी अर्थव्यवस्था सशक्त होगी और देर देश में बेरोजगारी दर घटेगी वह निर्यात में भी वृद्धि होगी। अतः इन सब बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए स्वदेशी व स्वावलंबन का भारतीय अर्थव्यवस्था में अहम योगदान हो सकता है।

आर्यावर्त सिंह                                                                                          (युवा लेखक)