कम्युनिस्ट कांग्रेस के अंतिम संस्कार का समय निकट

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यही हाल समाजवादी तथा प्रान्तीय दलों का भी हो गया है। इस कारण कांग्रेस कम्युनिस्ट पार्टियाँ परेशान होकर विघटनवाद की ओर चल पड़ी हैं। एक समय था कांग्रेस- कम्युनिस्ट दो किनारे अर्थात् 36 के अंक के समान विरोधी थे, परन्तु अपनी घटती साख से परेशान होकर शत्रु का शत्रु,
मित्र के न्याय के अनुसार एकत्रित आये हैं।

योगायोग से पंजाब, राजस्थान, केरल, छतीसगढ़ में कांग्रेस-कम्युनिस्ट की सरकारें हैं। इन सब सरकारों तथा पार्टियों ने योजनापूर्वक सरकारी प्रभाव का प्रयोग करते हुए किसान आन्दोलन खड़ा किया है। इस आन्दोलन में कुछ वे भी सम्मिलित हो गये जिनका प्रभाव मात्र एक-दो जिलों तक सीमित है। ऐसे सीमित कार्य वाले नेताओं को भी मीडिया के माध्यम से प्रसिद्धि प्रदान की जा रही है, जिससे वे नेता यह समझ रहे हैं कि मैं भी अखिल भारतीय हो गया हूँ।

जैसा ऊपर लिखा है कि कम्युनिस्टों ने कभी मजदूर क्षेत्रों में अपनी यूनियनों के माध्यम से छोटे-बड़े उद्योगपतियों के विरूद्ध शोषण का नारा बुलन्द करते हुए, मजदूरों की माँगों का दौर-दौरा आरम्भ किया था, आन्दोलन अनेक बार चलाने के कारण कारखानों में उत्पादन घटता गया, जिससे मजदूरों की माँगों की पूर्ति करना सम्भव नहीं हुआ, बल्कि कारखाना, उद्योग चलाना भी असम्भव होने से कारखाने- उद्योग बंद होते गये और मजदूर बेरोजगार होकर टके सेर हो गये। कभी बंगाल का जूट उद्योग बढ़ा-चढ़ा था, कभी कानपुर बड़ा औद्योगिक केन्द्र था, परन्तु इन कम्युनिस्टों की करतूतों के कारण देश के हजारों औद्योगिक केन्द्र व कारखाने बंद या मृतप्राय हो गये।

मध्य प्रदेश में औद्योगिक की जानकारी -

कम्युनिस्टों का समाजवाद गरीबी का विस्तार करता है। पूंजी होगी तो पूंजी का वितरण होगा, नहीं तो फाकाकसी होगी। भारत में हजारों मजदूरों को कम्युनिस्टों ने फाकाकसी में जीने को ढकेला है। रूस कभी कम्युनिस्ट देश था, सोवियत संघ था। लाल सेना के द्वारा जारों के शासन को मिटाकर कम्युनिस्ट क्रान्ति द्वारा रूस में लेनिन सत्तासीन हुए थे। लेनिन के बाद स्टालिन ने भय व मौत का तांडव मचाकर समाजवाद स्थापित करने का प्रयोग किया।

सरकार सरकारीकरण के साथ सामूहिक खेती आदि प्रयोग चले, परिणाम देश का उत्पादन घटता गया। देश गरीब होता गया और रूस के नेता प्रचार और सेना के द्वारा यह दिखाने का प्रयत्न करते रहे कि रूस तेजी के साथ प्रगति के पथ पर है, परन्तु झूठा प्रचार कितने दिन चलता। आखिर वह दिन आया कि जनता ने लेनिन-स्टालिन की मूर्तियों को तोड़कर समाजवाद को जमीन में गाड़कर देश को लोकतांत्रिक ढंग से चलाना आरम्भ किया।

अब भारत में कांग्रेस के साथ मिलकर कम्युनिस्ट किसान आन्दोलन की राह पर चल पड़े हैं। लगता है अब बर्बाद करने की बारी किसानों की है। श्रम का माहौल बनाया गया है। माया के द्वारा किसानों को उत्तेजित किया गया है। ‘माया बड़ी ठगनी’, यह अब किसानों को बर्बादी की ओर खींच रही है। देश प्रगति करे, यह कम्युनिस्टों के एजेण्डे में नहीं है। भारत और भारतीयों का जो कुछ है, वह सब अप्रगत, त्याज्य व बुर्जुआ है। इन्हें सबसे अधिक हिन्दुओं से, हिन्दू परम्परा, सँस्कृति, इतिहास आदि से उल्टी होती है। ये वेद, पुराण, उपनिषद आदि ग्रंथों का मनमाने ढंग से अनुवाद करके अश्रद्धा निर्माण करने में लगे रहते हैं।

कम्युनिस्टों को भारत से नहीं, विदेशियत से अधिक प्यार है। भारत के इतिहास को कम्युनिस्ट इतिहाकारों ने गया बीता बनाते हुए भारत की भावी पीढ़ी में भी पराभूत मनोवृत्ति निर्माण का उद्योग चलाया है। कांग्रेस विशेषकर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी ने अपने शासन काल में कम्युनिस्टों के अनेक गढ़ों का निर्माण कराया था।

अब फिर से कांग्रेस नेहरू जी की उसी पुरानी डगर पर चलकर कम्युनिस्टों के साथ युति निर्माण कर देश को बर्बादी की राह पर लाने व देश को तोड़ने की दिशा में सक्रिय हो गई है। अपनी डूबती नैया में कम्युनिस्ट-कांग्रेस सवार हैं और वे समझ रहे हैं कि हम सुरक्षित तथा प्रभावी बन रहे हैं। किसी एक प्रांत, एक जाति व एक तबके के आधार पर भारत में कोई सफल नहीं हो सकता। इस कसौटी पर लगता है कम्युनिस्ट-कांग्रेस के अन्तिम संस्कार का समय निकट से निकट आ रहा है।

राष्ट्रवाद यानी देशभक्ति, भारत भक्ति, भारत की प्रगति आदि का प्रवाह तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा है। भारत की युवा पीढ़ी के मन में भारत को विश्वगुरु बनाने का भाव उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। इसलिये आई.आई.टी. के जितने सँस्थान हैं, वहाँ के विद्यार्थी आये दिन नई-नई टेक्नालॉजी को प्रकट कर रहे हैं। हर युवा के मन में भारत जागा है, इसलिये युवा भारत की महिमा को चार चांद लगाने में तत्पर है।

आत्मनिर्भर भारत अभियान से बढ़ रहे हैं रोजगार, विकसित हो रहे हैं तरक्की के विभिन्न आयाम

भारत प्रथम, आत्मनिर्भर भारत यह विषय युवाओं को रूचीकर लगा है। इस कारण वह भी कमर कसकर नवीन की खोज में तथा हर क्षेत्र में भारतीय उत्पादन निर्माण में लग गया है। तकनीशियनों में भी नई तकनीक निर्माण की चाह प्रबल हुई है। डी.आर.डी.ओ. जैसे भारतीय संस्थान भी अद्भुत शस्त्रास्त्र व विमान निर्माण में लगा है। वैज्ञानिकों की नई पीढ़ी पुरानों कार्यों को और श्रेष्ठ बनाने में जुट गयी है। आने वाले कुछ वर्षों में ही भारत विश्व की महाशक्ति के साथ हर क्षेत्र में निर्यातक देश बन जायेगा।

राष्ट्रवाद यह नारा नहीं, यह भारत की सुप्त चित्ति की जागृत चेतना है। राष्ट्र की चिति अर्थात् आत्मा को मारने के पैंसठ वर्ष तक खूब प्रयत्न हुए, इससे चेतना मुर्छाग्रस्त हो गई थी, परन्तु देश की दैवी प्रार्थना तथा भारत के सनातन चलने वाले वैदिक यज्ञ-मंत्रों की प्राणदायी उर्जा से राष्ट्र की चिति की चेतना पुनश्च चमत्कार की तरह सक्रिय व गतिमान हो गई है।

अब भारत जाग रहा है, भारत जागा है, अब जागृति के साथ राष्ट्रमाता का जयघोष भी गूंज रहा है, इसलिये सारे चंचू प्रहार कुंठाग्रस्त होकर निरस्त होंगे। अब कुछ वर्षों में ही भारत हिन्दुत्व के साथ विश्व का सिरमौर बनेगा। सारी रूकावटें सड़क के बोल्डर की तरह सड़क में दबकर दम तोड़ देंगी। देश की युवा पीढ़ी आसमान के तारे तोड़ेगी, विश्व जिसे देखकर स्तब्ध-सा हाथ जोड़कर नमन मुद्रा में जय जयकार करेगा। अब प्रेरणा के स्वरों को हृदय का हार बनाकर चलने की बेला है। चरैवेति चरैवति ।

 
वह देखो पास खड़ी मंजिल,
इंगित से हमें बुलाती है।
साहस से बढ़ने वालों के,
माथे पर तिलक लगाती है।।

लेख़क :- धर्मनारायण शर्मा 

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