(भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महा महारथी श्रीयुत लोकमान्य तिलक एवं महा बलिदानी श्रीयुत चंद्रशेखर आजाद की जयंती पर सादर समर्पित)

भारत देश इस वर्ष स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। वह स्वाधीनता जिसमें स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। हम स्वाधीनता आंदोलन में जबलपुर के योगदान की बात करें तो यहां आधुनिक भारत में स्वराज आंदोलन के जनक बाल गंगाधर तिलक और क्रांतिकारियों के देवता स्वरूप महा महारथी चंद्रशेखर आजाद ने लोगों को स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य धारा से जोड़ा। यहां आंदोलन को सशक्त करने तिलक का तीन बार आगमन हुआ था। वहीं आजाद गुप्त प्रवास पर कई बार पहुंचे और स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती प्रदान करते रहे।

23 जुलाई 1856 को जन्मे बाल गंगाधर तिलक और 23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर तिवारी आजाद का देश के प्रति समर्पण इतिहास में दर्ज हो गया। आज इन दोनों महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जयंती है, ऐसे में इतिहास के पन्नों में स्वतंत्रता संग्राम में जबलपुर के योगदान की यादें ताजा हो जाती हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन में शहर के इतिहास में कई घटनाएं घटित हुई हैं। इतिहास संकलन समिति कई महत्वपूर्ण घटनाओं पर निरंतर शोध कर रहा है जिसमें कई बातें सामने आ रहीं हैं जो इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हुईं। जब देश में अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ा तो स्वतंत्रता के लिए कई नायक सामने आए। उन्हीं में से एक हैं बाल गंगाधर तिलक (लोकमान्य तिलक)।

जबलपुर प्रवास के दौरान अलफ खां की तलैया में उनका भाषण लोगों में स्वराज की ज्वाला जगाया। जबलपुर में सर्वप्रथम क्रांतिकारी आंदोलन मुखर हुआ था परंतु मुखबिरी हो जाने के कारण अनुशीलन दल का दमन हो गया था, इसलिए नगर में निराशा के कृष्ण में मंडराने लगे थे। तब लखनऊ कांग्रेस से आते समय समय 2 अक्टूबर 1916 को बाल गंगाधर तिलक, दादा साहब खापर्डे और डाॅ. मुंजे शहर पहुंचे और साने के बाड़े में ठहरे। उनके स्वागत के लिए जन सैलाब उमड़ पड़ा था।

लोकमान्य तिलक ने अलफ खां की तलैया में अपना अभूतपूर्व भाषण दिया,जिसमें हजारों की संख्या स्वाधीनता के दीवाने उपस्थित रहे। जबलपुर में युवाओं में राष्ट्रवाद उफान पर था। इसके बाद बाल गंगाधर तिलक 6अक्टूबर 1917 को फिर शहर आए तब तक अलफ खां की तलैया का नाम तिलक भूमि तलैया हो चुका था।

यहां पुनः उन्होंने अपना ओजस्वी भाषण दिया और भालदारपुरा में भी संबोधित किया। तीसरी बार तिलक का आगमन तीन और चार जून 1920 को आए और मर्मस्पर्शी भाषण दिए। देखा जाए तो तिलक भूमि की तलैया स्वतंत्रता संग्राम का पवित्र तीर्थ है। दरअसल यहां से सभी आंदोलन शुरु हुए। जब देश आजाद हुआ तो यहां सरकारी इमारतों के साथ सबसे पहले तिरंगा फहराया गया।
इसलिए याद किया जाता है तिलक को-

स्वराज के जनक बाल गंगाधर तिलक ने 1905 से लेकर 1920 तक लगातार राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होते रहे। जब लोग अंग्रेजों के डर घर से बाहर निकलने में डरते थे तब उन्होंने सार्वजनिक गणेश पूजन की शुरूआत की। पुणे से शुरू हुआ सार्वजनिक गणेश पूजन धीरे-धीरे देश भर में होने लगा। लोग एक मंच पर एकत्र होने लगे। उनकी यही कोशिश थी कि सबसे पहले लोग एकत्रित हों। गणेश पंडाल ही वह जगह हुआ करती थी जहां से एक बार में सभी को मुख्य सूचनाएं मिल जाती थीं। उनका कहना था कि “स्वराज्य हमारा जन्मदिन अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे।”

काकोरी अनुष्ठान के बाद आए थे आजाद-

सन् 1925 के काकोरी अनुष्ठान के बाद जब चंद्रशेखर आजाद को खोजा जा रहा था तब वे लगभग 5 वर्ष बुंदेलखंड में प्रवास पर रहे इसी तारतम्य में अपने गुप्त प्रवास पर जबलपुर आए थे। काकोरी अनुष्ठान में शामिल प्रणवेश कुमार चटर्जी जबलपुर से थे। उनसे मिलने के लिए गुप्त प्रवास के दौरान आजाद शहर आए थे। इस दौरान उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की अलख जगाने रखी।जबलपुर से प्रणवेश चटर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया परंतु आजाद पहुंच से बाहर हो गए।
भौगोलिक दृष्टि से क्रांतिकारियों का पसंदीदा रहा जबलपुर-

स्वतंत्रता आंदोलन में जबलपुर क्रांतिकारियों का प्रमुख केंद्र रहा। यहां रेल मार्ग से दिल्ली, मुंबई और कोलकाता का सीधे जुड़ाव रहा। यही कारण था कि यहां आंदोलन में शामिल लोग आसानी से पहुंच जाते थे। यहां मदन महल की पहाड़ियां और नर्मदा का तट ऐसा स्थल था जहां हर तरह की तैयारी आसानी से हो जाती थी। यहां बमों का परीक्षण भी किया जाता था। जिसका किसी को पता भी नहीं चलता था। क्रांतिकारी जबलपुर से नागपुर और बालाघाट आसानी से चले जाते थे।

काकोरी कांड नहीं, स्वतंत्रता का अनुष्ठान है –
वास्तव में काकोरी कांड नहीं स्वतंत्रता संग्राम का पवित्र अनुष्ठान था। स्व के लिए यज्ञ था। जिसमें सभी ने आहुति दी। यह विडंबना ही नहीं वरन् जघन्य अपराध है कि परजीवी, वामी और तथाकथित सेक्युलर इतिहासकारों ने महारथी चंद्रशेखर आजाद जैंसे महान् क्रांतिकारियों को डकैत और आतंकवादी कहा। यहाँ तक कि उनकी माँ राष्ट्रमाता जगरानी देवी को स्वाधीनता प्राप्त हो जाने के बाद भी डकैत की माँ कहा गया।

महारथी आजाद भारत माता के वह दुर्दम्य योद्धा थे जिन्होंने एसीपी नाटबावर सहित 60 पुलिस वालों से एक साथ एक घंटे तक युद्ध किया और 16 राउंड में से 15 पुलिस वालों को निशाना बनाया। ये स्वतंत्रता के वो सेनानी थे जिनसे देश स्वाधीन हुआ। हमें उन पर गर्व है।

आजाद के मित्रों ने तैयार किए थे पोस्टर मंदिर की वह परिकल्पना जिसे चंद्रशेखर आजाद के मित्रों ने तैयार किया था। मित्र यही कहते थे आजाद तुम्हें मंदिर में स्थापित करेंगे और उसके चारों तरफ हम रहें। मंदिर तो नहीं बना लेकिन इसके पोस्टर जरूर निकले थे।

लेख़क – डॉ. आनंद सिंह राणा
संपर्क – 7987102901