कोविड काल में भारत  ने जिस मजबूती से कदम बढ़ाये, उसे देखकर विश्व के अर्थशास्त्री न केवल चकित हुये वरन् उन विरोधियों को जो लगातार मुहिम चलाये रखने में महारत हासिल कर चुके हैं, उन्हें भी समझना कठिन हो गया। अपनी इस असफलता की भड़ास निकालने अनेक मंचों का सहारा भी लिया गया। हिन्दुत्व की विचारधारा का विश्लेषण करने और घृणा को बढ़ावा देने वाला तथा इस्लामोफोबिया को विस्तार देने वाली ताकतों को भारत की आर्थिक क्षेत्र में मिल रही बढ़त से मानो तेजी से करेन्ट लगा है।

भारत के बाहर हिन्दुत्व की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर वे भौंचक हैं तथा दुःखी भी हैं, वे समझ नहीं पा रहे कि ऐसा क्या हो गया जिसके कारण हिन्दुत्व का प्रसार सारे विश्व में होता जा रहा है। वे इस बात से भी अचम्भित हैं कि जो भारतीय भारत के बाहर निवास कर रहे है.

वे संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा आदि में अपने हिन्दुत्व के प्रभाव से वहाँ प्रभावित करते हुये, उनके साथ बड़ी गहरायी के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर रहें, जबकि भारतीय मूल के लोगों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। इतना ही नहीं कम संख्या में होने  के बावजूद वहां की बहुसंख्यक जनता के बीच वे न केवल अपनी मजबूत और स्वतंत्र पहचान बनाने में सफल हुये हैं, वरन् उन देशों की राजनैतिक व्यवस्था में भी अपनी पकड़ मजबूत बनाकर उन्हें प्रभावित कर रहे हैं। यह एक ऐसा तथ्य है जो दुर्भाग्य से भारत विरोधी मानसिकता वाला चश्मा पहन लेने के कारण समझ में आना कठिन है।

अभी तक जो भारत विरोधी तत्व हिन्दुत्व की भ्रमात्मक एवं गलत व्याख्या करते हुये अपनी गतिविधियाँ चलाया करते थे, अब उनके हाथों में रहने वाले कबूतर उड़कर भागने लगे हैं। वे इस बात से भी परेशान हैं कि जिन अमरीकी या विदेशी समाचार पत्रों में उनकी झूठी खबरें प्रकाशित होती थी, वहाँ भी  उनके द्व़ार सदा के लिये बन्द हो चुके हैं।

अब हाल ये है कि यहां निवास करने वाले ईसाईयों पर भी हिन्दुत्व की विचारधारा अपना प्रभाव छोड़ रही है। वहां भारतीय हिन्दूग्रंथ बहुतायत से उपलब्ध हो रहे हैं। अब वहां इस्लामी और ईसाईयत का प्रचार थम सा गया है। वहां के लोग हिन्दुत्व और अन्य पंथों का तुलनात्मक परीक्षण करने लगे हैं। उनकी संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है जो चर्च के बाहर आध्यात्मिक सत्य की खोज में लगे हुये हैं।

इस अंतर को भी समझा जा रहा है जब पूरी दुनिया में तालिवान के रूप में जल्दबाजी में घोषित बढ़ती जिहादी कट्टरता सामने दिख रही है। 9/11 की घटना को भी लोग भूले नहीं हैं।

कुछ लोगों का यह मत है कि पश्चिमी दुनिया मुसलमानों के खिलाफ किसी प्रकार का षड़यंत्र रच कर उन्हें अपमानित करती है, इसीलिये मुसलमानों में उनसे बदला लेने की भावना पैदा होती है। यह सत्य नहीं है क्योंकि विश्वभर में ऐसी अनेक मामूली सी घटनायें घटी हैं, जब मुस्लिम समूह ही नहीं, सारे विश्व के मुसलमान देशों ने अपना उग्र रूप दिखाने की कोशिशें की हैं।

सेकुलरिज्म के नाम पर भारत में ही इस्लामिक अतिवाद को हवा देने की नापाक कोशिशें हुयीं हैं। सदियों से एक समुदाय हिन्दुओं की आस्था के प्रतीकों को इस्तेमाल के लिये क्यों चुना जाता है? वह भी अंधविश्वास को दिखाने के लिये? अन्य वर्गों, समुदायों, मजहबों में व्याप्त अंधविश्वासों को उजागर करने के लिये उनके पाखंडों को  क्यों नहीं दिखाया जाता?

पैगम्बर मुहम्मद का नाम आने पर यह सेकुलरिज्म कैसे खतरे में पड़ जाता है? अब समय बदल रहा है, मुसलमानों को यह सिद्ध करना होगा कि वे आतंकवाद और असहिष्णुता का समर्थन नहीं करते? और उन्होंने इससे संबंधित घटनाओं के समय हुये कुकृत्यों को रोकने के लिये क्या किया?

आज विश्वभर में सबसे ज्यादा उथल-पुथल मुस्लिम देशों में ही है। विशेषज्ञ-खोजीजन इसका मुख्य कारण यह बतलाते हैं कि इस्लाम में अन्य मत पंथ के लोगों को कन्वर्ट किया जाना है। यदि कन्वर्जन रूक जाये तो मुस्लिम समाज में आतंकवादी प्रवृत्ति रूक सकती है।

हिन्दू समाज के प्रगतिशील एवं उदार सोच का बेजा फायदा उठाना बेहद आसान है। अमरनाथ यात्रा को पाखंड बताने वाले हज यात्रा पर चुप्पी क्यों साध लेते हैं? चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन तो भारतीय देवी-देवताओं पर बनाई अपनी पेंटिंग्स की वजह से ही चर्चा में रहा है। इसमें भी मुसलमानों का दोहरा चरित्र साफ नजर आता रहा, जब अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला दिया गया, जबकि वह खुले आम हिन्दू आस्थाओं का मखौल उड़ाता रहा। उसने भारत माता की विवादित तस्वीर बना डाली लेकिन सेकुलेरिटी की बहादुरी दिखाने वाले इस कलाकार ने क्या इस्लामिक प्रतीकों को अपनी कला का हिस्सा बनाने का साहस दिखाया?

इस्लामी देशों के नेता इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि मजहब के नाम पर भावनायें भड़काना आसान है। मजहब की यदि ये इस्लाम के अनुयायी इतनी चिन्ता करते होते तो क्या नुपुर शर्मा ने जो कुछ कहा है, उस सबसे ज्यादा कुछ कहने वाला जाकिर नाईक इस्लामी देश का मेहमान नहीं होता। चीन उईगर मुसलमानों की दशा पर सुई पटलक सन्नाटा न होता। यह मुस्लिम बिरादरी का खेल नहीं है, वरन् इस्लामी देशों को भारत के खिलाफ खड़ा करने की घिनौनी कोशिश है।

इस्लामोफोबियाका चैंगा पहनाकर जिहादी मानसिकता द्वारा अपनी हिंसात्मक गतिविधियों की धौंस दिखाकर वैधता प्रदान कराना मात्र उद्देश्य है। इस्लामी देशों में शिया, सुन्नी, कुर्द, अहमरिया और बलोच (सभी मुसलमान) के साथ कितना घृणात्मक व्यवहार होता है, क्या यह दुनिया से छिपा रह सका है?

आरोपों की बौछार भारत पर होती है,जो एक लोकतांत्रिक देश है, जहां 20 करोड़ मुसलमान शान-शौकत और चैन से रह रहे हैं। चीन से आर्थिक लाभ कमाने वाले ओआईसी (मुसलमान संगठन) के देश चीन के बजाय भारत पर निशाना साध रहे हैं। कितना दुर्भाग्यपूर्ण रवैया है-इस्लामी मानसिकता का। यही है दोहरा मापदंड? आरोप लगाने वाले इस्लामी देश और संगठन स्वयं तानाशाही व्यवस्था वाले हैं।

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आतंकवाद, नक्सलवाद एवं अलगाववाद देश की आंतरिक  व्यवस्था के लिये खतरनाक है। इनके एजेंडे देश विरोधी है। उनकी तुच्छ मानसिकता को भली भाँति समझा जा सकता है।

भारत सफलता की कहानी है। वह लोकतंत्र की ऐसी कहानी है, जिसने अनेकानेक बाधाओं का सामना किया है और उन पर विजय पायी है। अभी उसने मीलों आगे बढ़ने का लक्ष्य बनाकर रखा है। आज भारत एक अत्याधुनिक दृष्टिकोण और वसुधैव कुटुम्बकम्विश्व एक परिवार है इसी धारणा को लेकर पूरे विश्वास के साथ आगे कदम बढ़ा रहा है।

लेखक:- डॉ. किशन कछवाहा
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