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“बिरसा मुंडा भारत के जनजातीय समुदाय के महान स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक थे “

भारत वर्ष की इस पुण्य धरा पर प्राचीन काल से ही अनेक महापुरुष अवतरित हुए, जिनमें महान ऋषि – मुनि ,समाज सुधारक ,क्रांतिकारी , श्रेष्ठ योद्धा और सम्राट हुए है। जिन्होंने समाज और राष्ट्र को नई दिशा दी , भारतीय संस्कृति और समाज को सुदृढ बनाए रखने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

ऐसे ही एक महान विभूति “बिरसा मुंडा ” थे , जिन्होंने 19वी सदी में मात्र 25 वर्ष की आयु में वनवासी समाज ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत वर्ष के लिए विदेशी ताकत के विरूद्ध क्रांति के प्रेरणास्त्रोत बने ।

और आज भी उनके कार्यों और आंदोलन के कारण बिहार , झारखंड और छत्तीसगढ़ में लोग बिरसा मुंडा को भगवान की तरह पूजा करते है ।उन्होंने अपने नैतिक आचरण , शौर्य , कुशल नेतृत्व क्षमता और आदर्श कार्यों से तत्कालीन और वर्तमान जनमानस को प्रेरित किया है।

बिरसा मुंडा भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक थे । अंग्रेजो के विरुद्ध उनका आंदोलन सर्वविख्यत था । केवल 25 वर्ष के एक छोटे जीवन कल में उन्होंने वह मुकाम हासिल कर लिया ,जिसका हमारा इतिहास और हम सदैव उनके ऋणी रहेंगे।

बिहार का छोटा नागपुर क्षेत्र ,जो बिहार के दक्षिण में स्थित है । यहां एक प्रमुख जनजाति मुंडा आदिकाल से निवास करती है । इसी जनजाति क्षेत्र के एक छोटे से गांव उन्निहात में 15 नवंबर 1875 को सगुना मुंडा (पिता) और करमी मुंडा (माता) के घर एक बच्चे का जन्म हुआ ।

बृहस्पतिवार को जन्म होने के कारण उनका नाम बिरसा रखा गया। बिरसा के जन्म के कुछ समय पश्चात उनका परिवार उन्नीहात गांव छोड़कर आमुगानू गांव चला गया। बिरसा पर “होनहार के होत चिकने पात” की कहावत चरितार्थ होती है। वे बाल्यकाल में अपने मित्रो के साथ भेड़- बकरियां चराने जाते और मधुर बांसुरी बजाकर सबका मन मोह लेते ।

साल्गा गाँव में प्रारम्भिक पढाई के बाद वे चाईबासा के जर्मन स्कूल में पढ़ाई किया था। इनका मन हमेशा अपने समाज की ब्रिटिश शासकों द्वारा की गयी बुरी दशा पर सोचता रहता था। उन्होंने मुण्डा लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिये अपना नेतृत्व प्रदान किया।

1894 में मानसून के कहर के कारण भयंकर अकाल और महामारी फैली गई थी। बिरसा ने पूरे मनोयोग से अपने लोगों की सेवा की। अर्थात अंध विश्वास जैसे भूत प्रेत डाईन प्रथा से दुर करने के लिए लोंगों को प्रेरित किया करते थे ।

1अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजो से लगान (कर) माफी के लिये आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी।

लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और जिससे उन्होंने अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया। उन्हें उस इलाके के लोग “धरती बाबा” के नाम से पुकारा और पूजा करते थे। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी।

इस शोषण के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी फूंकी बिरसा ने। अपने लोगों को गुलामी से आजादी दिलाने के लिए बिरसा ने उलगुलान (जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी ) की अलख जगाई।बिरसा मुंडा : जिनके उलगुलान और बलिदान ने उन्हें ‘भगवान’ बना दिया ।

1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के जनजाति समाज के बहुत से लोगों की गिरफ़्तारियाँ हुईं।

जनवरी 1900 डोम्बरी पहाड़ पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत सी औरतें व बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ़्तारियाँ भी हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये। बिरसा ने अपनी अन्तिम साँसें 9 जून 1900 को रांची जेल में ली ,उन्हें अंग्रेजो द्वारा भोजन में जहर दिया गया था।

बिरसा मुंडा के स्मृति में रांची में एक केंद्रीय करावास और विमान पत्तन का नामकरण उनके नाम पर किया गया है । आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है ।

बिरसा मुंडा के आदर्श और कार्य का महत्व तत्कालीन ही नहीं बल्कि आज भी प्रासंगिक है। जो जनजाति समुदाय ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत वर्ष में राष्ट्रवाद की भावना जागृत करने और जनमानस को प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है ।

        डाॅ .गीतेश पटले

(लेखक सामाजिक चिंतक एवं विचारक)

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