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भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ – बिरसा मुंडा

धन, वैभव और प्राकृतिक संपदा के अक्षय भंडार से वरदानी भारत की पुण्य भूमि सदियों से विश्व के लिए आकर्षण का केंद्र थी। भारत की इस अकूत संपदा का क्षय करने के लिए , शोषण करने के लिए कितनी बार विदेशी लोगों ने इस भूमि पर आक्रमण किया और इन्हीं आक्रमणकारियों में से एक थे,

अंग्रेज जो सन 1600 में व्यापार करने के उद्देश्य से भारत में आए और धीरे-धीरे हमें गुलाम बना कर हमारे धर्म , हमारे विज्ञान , हमारी तकनीकी सब कुछ समाप्त करके उन्होंने अपनी वैचारिक धर्म और संस्कृति का वृक्षारोपण करना प्रारंभ कर दिया।

उत्थान से पतन का चक्र और पतन से उत्थान का चक्र तक घूमता रहता है और इसी समय चक्र में दक्षिण बिहार के छोटा नागपुर क्षेत्र में रहने वाली प्रमुख जाति मुंडा के एक परिवार में भारत के उत्थान के सूर्य का उदय हुआ उन्निहात गाँव में 15 नवंबर 1875 को सुगना मुंडा और करमी मुंडा के घर एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ।

बृहस्पतिवार के दिन जन्म लेने के कारण परिवार के लोगों ने इनका नाम बिरसा रखा। जन्म के कुछ समय पश्चात ही इनके माता-पिता ने उन्निहात गाँव को छोड़कर आमुभानु गाँव में अपना घर बनाया ।बचपन से ही बिरसा की प्रतिभाएँ लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने लगी।

अपने मित्रों के साथ भेड़ बकरियाँ चराते समय जब भी जंगल जाते कभी दिन भर जंगल में अपनी बांसुरी की मधुर धुन से सभी का मन मोह लेते तो कभी अपने अंतःकरण के भावों को भूमि पर सुंदर चित्रकारी करके अंकित करते। इस तरह संगीत और चित्रकला में वह प्रवीण होते गए।

शरीर से दुबले पतले, साँवले रंग के बिरसा मुंडा की मधुर बांसुरी को सुन मुंडाओं की भविष्यवाणी हो गई कि काले रंग के जिस भगवान को जन्म होना था ,वह यही बालक है।

आमूभानु गाँव के जयपाल नागजी के विद्यालय में बिरसा की प्रारंभिक शिक्षा संपन्न हुई।बहुमूल्य प्रतिभा के धनी बिरसा की पढ़ाई के लिए जयपाल नागजी ने जर्मनी मिशनरी स्कूल में पढ़ाने की सलाह दी , किंतु उस विद्यालय में मात्र ईसाई बच्चे ही प्रवेश ले सकते थे अतः बिरसा के परिवार ने चाईबासा गाँव जाकर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। अब यह बिरसा मुंडा के स्थान पर बिरसा डेविस के नाम से पहचाने जाने लगे।

प्रारंभिक रुप से संस्कारों की जड़े मजबूत थी अतः चाईबासा गाँव के वैष्णव भक्त श्री आनंद पांडे जी के संपर्क में आकर बिरसा की रुचि धीरे-धीरे भारतीय अध्यात्म और दर्शन में बढ़ने लगी। उनमें हिंदुत्व के रहस्य और तथ्यों को जानने की उत्सुकता जागृत हुई। इस आकर्षण के चलते बिरसा ने भारतीय ग्रंथों में वेद, रामायण, महाभारत हितोपदेश गीता आदि का अध्ययन किया।

बिरसा बचपन से ही निर्भीक और साहसी प्रकृति के थे ।एक बार की बात है रविवार के दिन चाईबासा मिशन में लोग प्रार्थना के लिए एकत्रित हुए। फादर नोट्रेट ईश्वर के राज्य के विषय पर व्याख्यान दे रहे थे उन्होंने भूतखेत और पहनाई आदि मुंडाओं के गाँवों के पास के जंगल को मिशन के हाथों सौंपने की बात कही ।

इसका विरोध जब मुंडा समुदाय के लोगों ने किया तब फादर ने मुंडाओं को ठग, बेईमान ,चोर कहा ।अपनी जाति के प्रति अपमानजनक शब्द सुनकर 14 वर्षीय बिरसा के विरोध के शब्द फूट पड़े और उन्होंने क्रोधित होकर फादर से पूछा आप किसे ठग ,चोर ,बेईमान कह रहे हैं? हम वनवासियों ने आज तक किससी को भी नहीं ठगा । बिरसा की प्रतिक्रिया के पश्चात मिशनरी स्कूल से उन्हें निकाल दिया गया।

मुंडा भारत देश का वह वनवासी समाज है जो वर्षों से वनों में निवास करते आ रहे हैं ।देश में कितने ही विदेशी आक्रमणकारी आए और उन्होंने देश की संस्कृति, सुरक्षा , स्वतंत्रता से खिलवाड़ किया परंतु सच्चे भारत माँ के सपूतों की तरह मुंडाओं ने अपने देश की संस्कृति की रक्षा के लिए अपनी विचारधारा के अन्य राजाओं का साथ दिया।

विदेशी आक्रमणकारियों से युद्ध लड़ा ।विपरीत परिस्थितियों में वन वन भटके किंतु सतत आक्रमणों के कारण कई राजाओं को अपना राज्य छोड़ना पड़ा, अतः वनों में उचित स्थान देखकर ये वही बस गये और वही खेती योग्य भूमि तैयार करके रहने लगे।

यहाँ गाँव के मुखिया को मुंडा और कुछ गांव की समूह के मुखिया को ‘मानकी’ कहते हैं। मुंडा अपने गाँव के जमींदार कहलाते थे ,जिनकी स्वीकृति के बिना गाँव का कोई भी कार्य नहीं होता था ।इनके अनेक किल्ली अर्थात गोत्र भी थे।

सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात अंग्रेजों ने ‘फूट डालो शासन करो’ की नीति अपनाई और इसी नीति के अंतर्गत आसाम के बागानों में मुंडाओं से बलपूर्वक उनके परंपरागत अधिकार छीन कर कुली का काम करने के लिए उन्हें विवश कर दिया ।

जंगलों को नष्ट करके अंग्रेजों की छावनियाँ बनाई गई ।मुंडाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई और उनके मन में अंग्रेजी प्रशासन के प्रति आक्रोश की भावना प्रबल हो गई इसी समय यूरोप से रोमन के कैथोलिक मिशन और जर्मन के लूथरन चर्च के मिशनरियों का एक दल छोटा नागपुर आया,

जहाँ इन्होंने समाज में भोजन ,शिक्षा और स्वास्थ्य की सेवाएँ उपलब्ध कराने के नाम पर धर्म परिवर्तन करने का कार्य तेजी से किया। जो इनकी नीतियों का विरोध करते उन्हें झूठे आरोप लगाकर कारागार में डाल दिया जाता और उन्हें कठोर यातनाएँ दी जाती।

अपने स्वाभिमान ,अपने जन्म और जीवन का उद्देश्य जानने के लिए बिरसा ने 4 वर्ष तक कठोर साधना की और उसके बाद जब वे अपने लोगों के सामने आए तब उनका व्यक्तित्व पूरा बदल गया था। एक हिंदू योगी की तरह पीली धोती, खड़ाऊं, माथे पर तिलक, यज्ञोपवीत धारण किए हुए उनका प्राकट्य हुआ।

अपने साथियों को भी उन्होंने ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। बिरसा ने अपने साथियों के साथ ईसाई बने लोगों को अपने हिंदू धर्म की समृद्धता बता कर पुनः उन्हें अपने मूल धर्म से जोड़ा। उनका हिंदू धर्म में धर्मांतरण किया। अध्ययन अध्यापन के लिए अपनी मातृभाषा को महत्व दिया ।सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा दी । “तुलसी पूजा” और “गौ पूजा” पर जोर दिया।

एक बार की बात है बिरसा अपने साथियों के साथ जंगल से जा रहे थे तभी उनके ऊपर बिजली गिरी परंतु बिरसा को कुछ भी नहीं हुआ यह उनके साथियों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था इस चमत्कार को देखकर सभी ने बिरसा को आबुआ अर्थात भगवान मानकर उनका अनुकरण करने लगे।

अंग्रेज शासक बिरसा के प्रयास और लोगों की उनके प्रति समर्पित श्रद्धा देखकर भयभीत हो गए ।बिरसा अपने अनुयायियों को कहते “अबुआ राज हारे जना ओरो महारानी राज टन्डू जना’ अर्थात अपना शासन आएगा, यदि अंग्रेज सरकार गोली चलाएगी तो वह पानी में बदल जाएगी ।

उन्होंने अंग्रेजों को लगान देने से भी मना कर दिया अब बिरसा आप “अबुआ” यानि भगवान हो गए और उनके अनुयायियों को “बिरसाइत” कहा जाने लगा ।अंग्रेज सरकार ने षड्यंत्र रचा कर दो वर्षो के लिए बिरसा को जेल में डाल दिया जिससे उनके अनुयायियों में रोष फैल गया वे संगठित हो गए लोगों ने लगान देना बंद कर दिया।

चाय के बागानों में काम करना बंद कर दिया। मिशनरी धर्मांतर लोग वेबसाइट होते गये ।दो वर्षों का कारावास पूर्ण करके बिरसा बाहर आ गए और पुनः अपने कार्य में लग गए। अब अंग्रेज शासक ने पुनः जमींदारों के साथ मिलकर उन्हें पागल घोषित कर वनवासियों से अलग-थलग करने का षड्यंत्र रचा।

बिरसा को बंदी बनाने के लिए एक पुलिस अधिकारी मीअर्स चालकंद गाँव पहुँचा ।इसकी सूचना बिरसा को पूर्व में ही मिल गई थी अतः बिरसाइतों ने बिरसा मुंडा को चारों ओर से घेर कर पुलिस को बिरसा तक पहुँचने ही नहीं दिया। उल्टा पुलिस अधिकारियों को एक कक्ष में बंदी बनाकर उन्हें अतिथि की तरह रखा।

भगवान बिरसा मुंडा

अंग्रेजों की योजना असफल रही। पुनः मीअर्स ने रात्रि में छल से बिरसा को बंदी बनाया , इस कारण तमाड़ ,खुण्टी, बनगाँव सहित सारे प्रदेश में असंतोष फैल गया। सभी वनवासी बड़ी संख्या में बनगांव पहुंच गये। यहीं से बिरसा को बंदी बनाकर रखा गया था ।सभी वनवासियों ने अपने भगवान बिरसा के दर्शन करने की बात रखी किंतु पुलिस अधिकारियों ने उन पर लाठीचार्ज किया,

उन्हें कारावास में बंदी बनाया तरह-तरह की यातनाएँ देकर उन्हें प्रताड़ित किया अंत में मुकदमा कालीकृष्ण मुखर्जी के न्यायालय में चला जहाँ उन्हें निर्दोष घोषित कर मुक्त कर दिया गया किंतु मुंडाओं को शासन के विरुद्ध भड़काने के अपराध में बिरसा को पुनः 19 नवंबर 1895 को बंदी बनाकर दो वर्ष के सश्रम कारावास में हजारीबाग जेल में डाल दिया गया ।

इस जेल से मुक्त होने के पश्चात अंग्रेजी प्रशासन के विरुद्ध बिरसा ने अपने लोगों को संगठित किया ,जागृत किया शस्त्र का संग्रह किया, छोटे-छोटे समूह बनाकर उनके नायकों की नियुक्ति की और अपनी बिरसाइत विचारधारा का प्रचार किया।

यह सारा कार्य गुप्त और योजनापूर्ण ढंग से चलने लगा।डोंबारी पहाड़ को मुख्यालय बनाया गया जहाँ के दुर्गम घने जंगल में बाघ, भेड़िए, चीता जैसे खूँखार जानवरों के कारण कोई भी उस जंगलों में प्रवेश नहीं करता था। पर्याप्त भोजन सामग्री एकत्रित की गई उलगुआन का मुहूर्त निश्चित किया गया 24 दिसंबर 1899 के दिन अंग्रेजों को आतंकित करने हेतु पहला आक्रमण किया।

इस दिन रात्रि के समय राँची से चाईबासा तक के 400 वर्ग मीटर के बड़े क्षेत्र में अंग्रेजों की प्रत्येक ठिकानों पर लगातार तीनों की वर्षा हुई। बहुत ही सुनियोजित तीव्र और अचानक हुए इस आक्रमण का कोई विरोध नहीं हो सका। तीन-चार दिन तक कर्फ्यू की स्थिति रही, राँची के आसपास के जंगलों में विद्रोह भड़क गया था।

लगातार मिशनरी स्कूलों और अंग्रेजी छावनियों को निशाना बनाया गया ,थाने जला दिए गए।अंग्रेज इतने भयभीत हो गए कि उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए कोलकाता से सेनाएँ बुला ली गई और युद्ध प्रारंभ हो गया।

8 जनवरी 1899 के दिन बिरसा के आवाहन पर 300 फुट ऊँचे सपाट डोंबारी पहाड़ के आसपास हजारों मुंडा अपने पारंपरिक शस्त्र से सुसज्जित होकर तैनात हो गए।बिरसा ने उन सभी पर पवित्र जल छिड़क कर उनसे कहा- अब हम शत्रुओं की गोलियों से नहीं डरेंगे मरना है तो सीना तान कर मरेंगे सिर झुका कर नहीं एक ओर मुंडा जाति की महिलाएँ,

बच्चे और पुरुष अपने पारंपरिक अस्त्र शस्त्रों के साथ अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए एकत्र हुए थे। वही दूसरी ओर भारत की संस्कृति ,विज्ञान , स्वतंत्रता का शोषण करने के लिए अंग्रेज आधुनिक हथियारों से परिपूर्ण इन स्वाभिमानी मुंडाओं के सामर्थ्य का दमन करने के लिए खड़े थे।

बिरसा मुंडा के आवाहन पर भयंकर गोलीबारी से लोग मरने लगे किंतु कोई भी वहाँ से हटा नहीं ,भागा नहीं, घंटों गोलियाँ चली, हजारों लोग आहत हुए परंतु अभियान नहीं रुका। यहाँ तक कि उस समय बिरसा को पकड़ कर लाने वाले को ₹500 का इनाम रखा इस लालच ने भी मुंडाओं के आत्मसम्मान को डिगने नहीं दिया।

अंततः अंग्रेजी सैनिकों ने बिरसा को पकड़कर राँची के जेल में डाल दिया और 4 माह तक उन्हें घोर यातनाएँ दी 9 जून 1900 की सुबह बिरसा को उल्टियाँ हुई और उनकी मृत्यु हो गई ।मृत्यु का कारण एशियाटिक हैजा बताया गया किंतु बंदी गृह में उन्हें विष देकर मारा गया था ।

बिरसा जिन्होंने भारतीय धर्म, विधि विधान, पूजा पद्धति को आत्मसात करते हुए तुलसी पूजा, गौ पूजा, तिलक लगाना, स्वच्छता , शुद्धता पर जोर दिया था। लगभग सवा सौ वर्षों के बाद भी उनके बताए मार्ग आज भी सार्थक हैं ।जब तक हम स्वदेशी स्वाभिमानी नहीं बनेंगे हमारा उत्कर्ष संभव नहीं ।

हमें धर्म विरोधी विदेशियों लोगों के प्रलोभनों से बचकर राष्ट्र सेवा करनी चाहिए यही स्वतंत्र सेनानी बिरसा मुंडा के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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