मंदिर – अर्थतंत्र : एक ऐतिहासिक विश्लेषण

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सामान्यतः मंदिरों को देवस्थान माना जाता है। अर्थात् वो पूजा एवं आराधना के स्थल हैं। आज के राजनीतिक व्याख्याकार तो मंदिर रूप संस्था की आलोचना मुखर रूप में करते हैं। उनके लिए मंदिर तो अंध विश्वासजनक है। एक वर्ग विशेष के लिए आजीविका का साधन है, साथ ही वर्ग-भेद के सिद्धान्त पर आधारित प्रतिष्ठान है।

इतिहासकारों के एक वर्ग विशेष ने तो मंदिरों को दानस्वरूप दिये गये ग्रामों को आधार बनाकर मंदिर सामंतवाद’ का एक सिद्धांत भी। बना दिया। अर्थात् मंदिर सामान्य कृषक व शिल्पी वर्ग के लोगों को। आर्थिक दोहन कर वर्ग-विशेष को। आर्थिक लाभ पहुँचाने का साधन मात्र था।

उपर्युक्त विषयों के परिप्रेक्ष्य में एक वैज्ञानिक एवं यथार्थपरक अध्ययन अपरिहार्य है। विशेषकर ऐतिहासिक अनुशीलन द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदिर की कल्याणकारी भूमिका को जनमानस तक पहुँचाना एक नैतिक उत्तरदायित्व भी है।

हिन्दू मन्दिर वास्तुकला - विकिपीडिया

प्रथमतः यहाँ निम्नांकित
तथ्यों का उल्लेख नितांत आवश्यक है –

1. मंदिर केवल आस्था का केन्द्र न होकर भारतीय ज्ञान-विज्ञान के प्रतिष्ठान थे।
2. मंदिर अंधविश्वास के कारक न होकर सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति के नियामक थे।
3. मंदिर श्रमिक का शोषण न कर, शिल्प व वास्तुविद्या के संरक्षक थे।
4. ब्रह्मदेय, देवदेय आदि गाँवों की उत्पादित कृषि सम्पदा का उपभोग न कर, मंदिर कृषि विकास को सुनिश्चित करते थे।

इन तथ्यों के आलोक में कि यदि मंदिरों का मूल्यांकन किया जाए तो मंदिरों की लोक कल्याणकारी आर्थिक पद्धति का स्वयमेव प्रकाशन हो जाता है। उदाहरणार्थ, तंजौर में स्थित वृहदीश्वर मंदिर को पैंतीस गाँवों को अनुदान प्राप्त था। इस मंदिर को दिए गये इन गाँवों की उत्पादित एवं राजस्व के रूप में प्राप्त सम्पदा का प्रयोग सिंचाई विकास जैसे कार्य में किया गया। मंदिर के पार्श्वभाग में बना शिवगंगा तड़ाग जल प्रबंधन एवं जलवितरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है। कावेरी नदी व उसकी सहायक नदियों की जलधारा को मोड़कर वृहदीश्वर मंदिर तक लाने की योजना का अंग था।

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वृहदीश्वर मंदिर ने भूमिमाप की अधिकृत पद्धति को रील मंडलम में प्रचलित कर स्वामित्व अधिग्रहण से संबंधित विवादों को भी समाप्त किया। अभिलेखों में इस मंदिर द्वारा किसानों एवं पशुपालकों को ऋण प्रदान किये जाने का उल्लेख भी प्राप्त होता है। आपदाकाल में मंदिर द्वार अन्न उपलब्ध करवाये जाने का विवरण भी महत्वपूर्ण है। वृहदीश्वर मंदिर में से अधिक कर्मचारी कार्यरत थे। जिन्हें मंदिर द्वारा वेतन प्रदान किया जाता है। मंदिर का मुख्य अधिकारी कार्यक्रम अधिकारी कहलाता था। यह अधिकारी मंदिर की सम्पूर्ण आर्थिक गतिविधियों का लेखा-जोखा सुव्यवस्थित रखने हेतु 5 उत्तरदायी था।

मंदिर से 444 नृत्यांगनायें संबद्ध थी, जिनको विशेष रूप से संरक्षण प्रदान किया गया था। वृहदीश्वर मंदिर ने गोलकीमठ’ जहाँ विद्यार्थी पढ़ते थे और जो आगम शिक्षा का प्रधान केन्द्र था, उसे निरंतर दे आर्थिक अनुदान प्रदान किया। इसी प्रकार मंदिर ने शिल्पकारों एवं बुनकरों को मंदिर संचालित गतिविधियों से जोड़कर रोजगार प्रदान किया।

मदुरै एवं कांचीपुरम् के मंदिरों ने तो वस्त्र उद्योग को पूर्णतः संरक्षण प्रदान किया। वस्त्र उत्पादक निगमों को मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर, कांची से पूर्ण सहयोग प्राप्त था। सूती एवं रेशम उद्योग को मंदिर का संरक्षण उन्हें विश्वसनीयता प्रदान करता था एवं तीर्थयात्रियों को उचित मूल्य पर कलात्मक व धार्मिक अभिप्रायों एवं प्रतीकों से युक्तवस्त्र उपयुक्त मूल्य पर प्राप्त हो जाते थे।

इसमें वरदाराज मंदिर को ग्राम दान प्राप्त था और वह ब्रह्मदेय ग्रामों की धुरी भी था। इस मंदिर का ‘पोषभण्डारम्’ स्वर्ण निधि एवं अक्षयनिधि योजना को संचालित करता था, जो एक प्रकार की बैंकिंग प्रणाली थी। इसी प्रकार ‘श्रीभंडारम्’ मंदिर का एक अन्य प्रतिष्ठान था।

श्रीभण्डारम् में दान, मूर्तियों, आभूषणों आदि को संरक्षित। किया जाता था। पद्मनाभ स्वामी मंदिर, विरूअनन्तपुरम् का ‘श्रीभण्डारम्’ विगत कुछ वर्षों में परिचर्चा का विषय था, इसी प्रकार ‘अवन्नकलम्’ एक प्रकार के संग्रहालय थे, जिसमें दुर्लभ वस्तुओं को संग्रह किया जाता था। मंदिरों द्वारा निःशुल्क न्याय एवं आयुर्वेदिक उपचार का वर्णन भी अभिलेखों द्वारा प्राप्त होता है।

वैद्यिश्वरम्, कोविल, तमिलनाडु चिकित्सा क्षेत्र में कार्य करने वाला विराट मंदिर था। स्थानीय स्वशासन के साथ-साथ नागरिक व सार्वजनिक सम्पदा संरक्षण में मंदिरों की भूमिका की उल्लेखनीय थी। उदाहरणार्थ, तोट्टवरियम्, एदिवदियम्, उद्यानवदियम आदिलोक शासन समितिओं के माध्यम से तड़ाग, कूप, नहर, उद्यान आदि का विकास एवं संरक्षा।

मंदिरों की भोजशालाओं द्वारा भोजन का तीर्थयात्रियों हेतु प्रबंध एक अन्य रोचक विषय है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर, लिंगराज मंदिर के भोगशाला के पुरावेष, विरूपति मंदिर का भोग-प्रसाद प्रबंध सर्वथा वंदनीय है। मंदिर अर्थव्यवस्था का जन-प्रभाव अत्यन्त महत्वपूर्ण था। श्रीरंगनाथ मंदिर, त्रिचिन्नापल्ली कृषकों के उत्पाद की जो राशि प्राप्त करता था, उससे अन्नागार संचालित होता था।

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मंदिर अपनी समिति के माध यम से यायावर संतों, साधुओं भिक्षुकों आदि को भोजन प्रदान कर जनसेवा का कार्य करता था। वर्धिक, बुनकर, शिल्पी, पशुपालक, स्वर्णकार, कंशकार, लौहकार आदि के निगर्मों व श्रेणियों का मंदिर से जुड़ा होना सम्पूर्ण तीर्थ-अर्थतंत्र का प्रभावशाली लक्षण था। चर्मशिल्पी भी मंदिर हेतु वाद्ययंत्र का निर्माण करते थे, अपितु उसे मंदिर के मंगल ध्वनि के रूप में बजाते थे। मंदिर में मंगल-ध्वनि, गायन-वादन उनकी आजीविका का साध था। तीर्थों के देवपथ या देवमार्ग का निर्माण भी मंदिर करते थे।

मंदिर की उद्यान समिति फल एवं फूलों के उत्पादन हेतु मालाकारों के वर्ग को भी आर्थिक सहायता पहुंचाती थी। व्यवसाय – वितरण, क्रय-विक्रय आदि कर्मों में मंदिर द्वारा निर्धारित दर माप-तौल की विधि का आधि के कारिक स्वरूप भी एक रोचक तथ्य है।

धारानगरी में राजाभोज द्वारा स्थापित विद्या केन्द्रों हो या मोजेश्वर मंदिर द्वारा बेतवा नदी के अधिशेष जल का सिंचाई हेतु संरक्षण, मंदिर की आर्थिक भूमिका अद्वितीय है।

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