मण्डला जिले के स्वाधीनता आन्दोलन में जनजातियों का योगदान

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मण्डला जिला जनजातिय बाहुल्य जिला है। यहाँ 60 प्रतिशत से अधिक जनजातिय निवास करते हैं, आज से दो सौ वर्ष पूर्व इनका प्रतिशत इससे भी अधिक था। अनेक गाँवों के जनजातिय ही थे। गौंड राजवंश यहाँ पर लगातार 1400 वर्षों से राज्य कर रहा था।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा अंग्रेज शासन यहाँ की जनता को आतंकित कर अधिक से अधिक लगान वसूल करने में संलग्न था। जनजातिय जनता तथा मालगुजार इससे पीड़ित थे, कि उनसे उनकी आय से अधिक लगान वसूली जा रही है। गरीब किसान इसलिए पीड़ित था कि जंगलों में उत्पन्न लकड़ी और जंगली पैदावार का वह उपयोग नहीं कर सकता था।

यहाँ, का किसान जो धरती माता पर बगैर हल चलाये वेबर काश्त करना अपना धर्म समझता था। उस वेबर काश्त के लिए क्षेत्र को सीमित कर उस पर रोक लगा दी गई थी। गाँव का ठलुआ मजदूर तथा किसान इसलिए भी पीडित था कि जिले के बड़े-से-बड़े अफसर से लेकर गाँव का पटवारी तथा कोटवार भी उनसे बेगार लेना अपना अधिकार समझता था।

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जिले के गोंड राजा तथा जमीन्दार इसलिए प्रस्त थे कि उनके गाँव तथा उनका शासन कोर्ट ऑफ वार्ड के अधीन कर अंग्रेजी शासन उनकी स्वतन्त्रता को बाधित कर रहा था। गौंड राजा शंकरशाह तथा रघुनाथशाह  के राज्य के उत्तराधिकार को निरस्त कर गोद लिए नरबदा बख्श को उत्तराधिकारी बना दिया गया था।

इन सभी कारणों से यहाँ की जनजाति जनता, गौंड राजा तथा जनजातिय मालगुजार सभी पीड़ित थे इसलिए जब देश में स्वाधीनता आन्दोलन का सूत्रपात हुआ तब जिले के इन जनजातियों ने भी उसमें अपने तन मन धन सबका सब अर्पण कर देश की स्वाधीनता के इतिहास में एक स्वर्णिम पृष्ठ की रचना की उसी विस्मृत अध्याय को हमने यहाँ पर एकत्रित करने का प्रयत्न किया है।

भारतीय इतिहास में सन् 1957 की क्रान्ति की एक अमर गाथा है। उत्तर भारत में मेरठ में सैनिक विद्रोह के साथ इसका प्रारम्भ हुआ तथा कुछ ही महीनों में यह आग सम्पूर्ण भारत में फैल गयी। मण्डला जिला भी इससे अछूता नहीं रहा। रानी दुर्गावती के अनुकरण में यहाँ की विधवा रानी ने भी अपने आत्मोत्सर्ग के द्वारा स्वतन्त्रता की इस आग को प्रज्जवलित किया है।

जुलाई 1857 तक मण्डला जिला पूर्णतः शान्त था। जिले में विद्रोह की चिनगारी 18 सितम्बर को जबलपुर में गौंड राजा शंकरशाह तथा उसके पुत्र रघुनाथशाह को तोप के गोले से उड़ाये जाने के साथ प्रारम्भ हुई। शंकरशाह का जन्म मण्डला के किले में हुआ था। वह राजा सुमेरशाह का पुत्र तथा निजामशाह का नाती था। उसने जबलपुर में भोकमसिंह मगरमुंहा वाले, जगतसिंह वरखेड़ा वाले, मीर गौसिया बगरी वाले तथा बंगाल अहाता 52 वीं पल्टन के सिपाहियों से सलाह मशविरा करके क्रान्ति की योजना बनाई थी।

जिसके अपराध में उसे यह दण्ड दिया गया था। जिस समय जबलपुर में अंग्रेज सरकार शंकरशाह तथा रघुनाथशाह को तोप से उड़ाने के पश्चात् खुशी का जश्न मना रहे थे, उस समय शंकरशाह की विधवा पत्नी फूलकुंवरि अपने पति तथा पुत्र के मांस के लोथड़े एकत्रित करने में व्यस्थ थी।

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अन्तिम संस्कार करने के उपरान्त वह भागकर शहपुरा पहुंची और वहीं उसने शहपुरा के ठाकुरों से मन्त्रणा की। विधवा रानी के नेतृत्व में शहपुरा तथा सोहागपुर के ठाकुरों ने शंकरशाह की मृत्यु का बदला लेने के लिए कमर कसली। रामगढ़ की रानी से भी उसने सलाह मशविरा किया और जिले में विद्रोह के लिए एक सुसंगठित नेतृत्व तैयार किया।

उसके नेतृत्व में 26 सितम्बर को शहपुरा के ठाकुर विजयसिंह ने शहपुरा के थाने पर हमला कर वहाँ से पुलिस को भगा दिया। जबलपुर से भागकर आयी ६४ वीं पल्टन के सैनिकों ने सोहागपुर के थाने पर भी कब्हा कर लिया। विजयसिंह ने रामगढ़ जाकर वहाँ की रानी तथा नारायणगंज के ठाकुर की मदद से मण्डला पर हमले की योजना बनाई।

5 अक्टूबर को विजयसिंह की योजना की खबर मण्डला के डिप्टी कमिश्नर वाडिंगटन को लगी। उसने 26 अक्टूबर को अपने कुछ सैनिकों को रामनगर भेजा जिसमें दो विद्रोही मारे गये। एक घायल हुआ। एक पकड़ा गया, जिसे 27 अक्टूबर को मण्डला में फांसी दी गई। 28 अक्टूबर को वाडिंगटन ने दो सैनिक टुकड़ियाँ घुघरी भेजी। इसी बीच विद्रोहियों ने 27 अक्टूबर को बिछिया थाने पर तथा 28 अक्टूबर को नारायणगंज थाने पर कब्जा कर अंग्रेजों को वहाँ से मार भगा दिया।

5 नवम्बर को वाडिंगटन ने अपनी सेना एकत्रित कर मण्डला में ही आक्रमणकारियों से मुकाबला करने का निश्चय किया। 23 नवम्बर को रात्रि में मण्डला से एक मील दूर खैरी ग्राम में विद्रोहियों ने हमला किया। वाडिंगटन ने 33 बन्दूकधारी तथा 17 तोपचियों के साथ उसका मुकाबला किया।

इसी समय जबलपुर की ओर से विद्रोहियों के आ जाने से वाडिंगटन के लिए मुसीबत का समय आ गया वह मण्डला को विद्रोहियों के कब्जे में छोड़कर भाग गया। उपरोक्त सभी आक्रमणों में एक बहुत बड़ी संख्या में आदिवासी विद्रोहियों के साथ में मौजूद है थे । सम्पूर्ण मण्डला जिला विद्रोहियों के कब्जे में आ गया। इस प्रकार नवम्बर 1857 से लेकर मार्च 1858 तक मण्डला रानी फूलकुंवरि के की नेतृत्व में उसके साथियों के कब्जे में रहा।

जबलपुर की ओर से आने वाली टुकड़ी में मुकास तथा माड़ोगढ़ का जमींदार खुमानसिंह गोंड भी था जो मण्डला की कचहरी को लूटना चाहता था। उसे बाद में मण्डला क बड़ चौराहा के पास एक बड़े वृक्ष से लटकाकर फांसी दे दी गई थी। पुन: 09 नवम्बर से 16 नवम्बर के बीच में पाँच गोंड विद्रोहियों को सबक सामने मण्डला में फांसी दी गई। दो विद्रोही सैनिकों को इस सन्देश के साथ छोड़ दिया कि वे जाकर अपने गोंड भाईयों को विद्रोह से अलग कर लें। इसके फलस्वरूप दो सौ बैगा जनजातियों ने रामगढ़ की रानी की सेना से अपने को अलग कर लिया। 24 नवम्बर को पुन: 21 विद्रोही सैनिकों को फांसी पर लटकाया गया।

मार्च 1858 में जबलपुर से 20 अंग्रेज सैनिकों की टुकड़ी आ जाने से मण्डला में पुनः सरगर्मी फैल गई। श्रीमती ओ. एस. क्राम्पटन लिखती हैं कि जब गोंड राजा शंकरशाह को 18 सितम्बर को जबलपुर में अंग्रेज जनता के विरूद्ध विद्रोह फैलाने के आरोप में तोप से उड़ा दिया गया तब उसकी विधवा रानी ने मण्डला में विद्रोह फैलाया तथा रामगढ़ पर भी अधिकार कर लिया उस रानी को दबाने के लिए सैनिकों की एक टुकड़ी मण्डला भेजी गई।

अन्ततः रानी ने परास्त होकर मण्डला के निकट लालीपुर में आत्महत्या कर ली। उधर रघुनाथशाह की विधवा रानी मानकुंवरि ने अपने भाई अमानसिंह तथा पुत्र लालजी के साथ दमोह के बटियागढ़ थाने को लूटने का प्रयत्न किया। स्मरणीय है कि झांसी का युद्ध 23 मार्च 1858 से प्रारम्भ हुआ और 16 जून 1858 को झांसी की रानी शहीद हुई। फूलकुंवरि उसके पहले शहीद हो चुकी थी। लेखिका आगे लिखती हैं कि उसके पति जान हर्ट विद्रोह के समय सन् 1857 में मण्डला डिप्टी सुप्रिन्टेन्डेन्ट पुलिस थे तथा 2 अगस्त 1895 को 55 वर्ष की आयु में मण्डला में ही उनकी मृत्यु हुई।

मण्डला विजय के उपरान्त अंग्रेजी सेना ने रामनगर तथा घुघरी थाने पर विजय प्राप्त की। उसके बाद 2 अप्रैल 1858 को जब बाडिंगटन अपनी सेना के साथ रामगढ़ की ओर जा रहा था पुन: छह मील आगे चलने पर वह उस संकीर्ण मोड़ पर पहुंचा जहाँ पर 50 से अधिक सशस्त्र विद्रोही बन्दूकों तथा हथगोलों से सज्जित थे। यहाँ पर दोनों ओरसे सैनिकों की मुठभेड़ हुई जिसमें तीन विद्रोही मारे गये तथा बहुत घायल हुए। जनश्रुति के अनुसार जो विद्रोही सैनिक तथा गाँव की जनजाति जनता पकड़ी गईउन सबके हाथ काट डाले गये और तब से सम्पूर्ण जनता जनजाति थी।

रानी फूलकुंवरि के आत्मसमर्पण तथा रामगढ़ सोहागपुर और शहपुरा के पतन के पश्चात् धीरे-धीरे मण्डला में क्रान्ति शान्त हो गई। इस क्रान्ति में अनेकों जनजाति गोंड सैनिकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है।

सन् 1857 की क्रान्ति की यह आग बुझी नहीं तथा सन् 1947 पूर्ण स्वतन्त्रता तक यह आग प्रज्जवलित होती रही। मंडला जिले के अनेकों जनजातियों  ने इसमें समय-समय पर अपना सम्पूर्ण सहयोग प्रदान किया। जब महात्मा गाँधी ने नमक सत्याग्रह प्रारम्भ किया।

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तब मण्डला जिले में इसके लिए कोई स्थान नहीं था। फलत: डिण्डौरी में जंगल सत्याग्रह प्रारम्भ हुआ। अगस्त 1930 में कोई 5000 से7 000 तक जनजातियों ने गन्धूभोई के नेतृत्व में महात्मा गाँधी के अहिंसक आन्दोलन के प्रतीक रूप में कुल्हाड़ी तथा फरसा लेकर जंगलों या प्रवेश किया। उनमें से कुछ नेताओं को थाने में बन्द कर दिया गया। जनता उत्तेजित हो उठी। थाने को लूटने का निश्चय किया गया परन्तु बाद में कुछ नागरिकों के समझाने पर जनजातिय  शान्तिपूर्वक अपने घरों में वापिस चले गये। गन्धू भोई तथा अन्य कुछ लोगों को गिरफ्तार टी कर जेल की यातनाएँ दी गईं।

इसी समय मण्डला में जिले के प्रसिद्ध वकील पण्डित उमेशदत्त जी पाठक ने मण्डला जिले के गरीब जनजातीय किसान भाईयों से ली जा रही बेगार प्रथा के लिए मण्डला के न्यायालयों में 23 मुकदमें शासन के विरूद्ध दर्ज कराये । मण्डला से मुकदमों में सफलता न मिलने के कारण जबलपुर उच्च न्यायालय में अपील की। उसमें उन्हें सफलता मिली। आदिवासियों से ली जाने वाली बेगार को कानूनन बन्द कराया गया। बाद में लन्दन में प्रिवी कौंसिल से भी उसकी पुष्टि हुई। इस प्रकार जनजातियों से ली जाने वाली बेगार प्रथा पर रोक लगी।

सन् 1842 में बुन्देला विद्रोह में डालनसिंह गौड़ राजाओं और जमींदारों का नेता था उसे फांसी दी गई। सन् 1930 के नमक सत्याग्रह के समय भुआ बिछिया की सोना दाई भोयन खादी की साड़ी पहिनकर, सिर में गाँधी टोपी लगाकर हाथ में तिरंगा झण्डा लेकर गाँव में शराब की दुकानों के सामने धरना देती, महिलाओं को स्वतन्त्रता आन्दोलन में सहयोग के लिए प्रेरित करती थी। सन् 1905 ई. को इसका जन्म बिछिया में हुआ था। 1932 के लगान आन्दोलन के अन्तर्गत पांच माह की जेल की सजा हुई। पुन: 1942 में भी उसे जेल की सजा हुई।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के साठ वर्ष पश्चात् स्वराज संस्थान संचालनालय भोपाल के सहयोग से पहली बार जनजातिय जिला मण्डला में आयोजित म. प्र. में स्वाधीनता आन्दोलन में मण्डला जिले के जनजातियों के योगदान के सम्बन्ध में यह संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत है। उन सब जाने अनजाने स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका का निर्वाह करने वाले मण्डला जिले के जनजाति भाईयों के त्याग और बलिदान के प्रति हम श्रद्धानत हैं।

लेख़क :- गिरिजाशंकर अग्रवाल  

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