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अलक्ष-लक्ष-किन्नरामरासुरादिपूजितं, सुलक्षनीर-तीर-धीर पक्षीलक्ष कू जितं।
वशिष्ठ शिष्ट पिप्लादकर्दमादिशर्मदे, त्वदीय पादपंकजं नमामि देवि नर्मदे ॥

लाखों करोड़ों देवता और दानव आपकी आराधना करते हैं। पक्षी जिनकी संख्या की गिनती करना संभव नहीं है, वे आपकी गोद में चहचहाते और गाते हैं। वशिष्ठ पिप्लाद जैसे महान संत आपकी अर्चना में निमग्न रहे हैं। हे देवी नर्मदे मैं आपके चरणों में नमन करता हूँ।

नर्मदा अष्टकम् छन्द बहुत की उत्कृष्ठ रूप से नर्मदा सौन्दर्य का वर्णन करता है। अद्वैत दर्शन शास्त्र के संस्थापक आदि शंकराचार्य महाराज ने अपने प्रसिद्ध नर्मदा अष्टकम् में इस पावन पवित्र नदी का वर्णन पाप नाशिनी के रूप में किया है ।

यह एक ऐसी कल्याणी ममतामयी देवी है जिसके जल में महापापियों के पापों को भी प्रक्षालित करने की क्षमता है। यह पुण्य सलिला नर्मदा भारत की सात प्रमुख नदियों में से एक है और यह भारत की एकमात्र अक्षुण्ण नदी है जिसके दर्शन मात्र से पुण्यों की प्राप्ति हो जाती है।

इसकी परिक्रमा करना अनेक लोगों की प्रबल कामनाओं में से एक होती है। इसकी गणना देश की सात पवित्र नदियों में की जाती है। जो कि इस श्लोक से स्पष्ट हो जाता है :

गंगे च यमुने चैव गोदावरी, सरस्वती।
नर्मदे, सिन्धु, कावेरी, जलेऽस्मिन् सन्निधिंकुरू॥

 

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले की मेखला पर्वतमाला में 1057 मीटर की ऊँचाई पर अमरकंटक से निकलने वाली यह नदी, मध्य प्रदेश, और गुजरात राज्यों के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से 1312 किलो मीटर की दूरी तय करती है। यह नदी उत्तर और दक्षिण भारत के बीच भौगोलिक।

सीमा का निर्धारण करती है। यह पावन नदी महाकौशल क्षेत्र (जो कि देश का मध्य भारत है, एवं उसे लगभग दो बराबर हिस्सों में बाँटती है) से गुजरते हुए 1079 किलो मीटर का रास्ता तय करती है उसके पश्चात् नदी मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच 37 किलो मीटर महाराष्ट्र और गुजरात के बीच 39 किलो मीटर की प्राकृतिक सीमा का निर्माण करती है।

अरब सागर में खम्भात की खाड़ी में विलीन होने से पूर्व यह गुजरात के 157 किलो मीटर
हिस्से में बहती है। नदी का कुल बहाव क्षेत्र लगभग 98786 वर्ग किलो मीटर है। इसमें से
87% हिस्सा मध्य प्रदेश में, 1.5 % महाराष्ट्र में और 11.54 हिस्सा गुजरात में है।

सरदार सरोवर परियोजना तक कुल जलग्रहण क्षेत्र करीब 88,000 वर्ग किलो मीटर है। अपने बहाव के लगभग सम्पूर्ण मार्ग के दौरान, दायीं ओर विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी से और बांयी ओर
सतपुड़ा पर्वत श्रेणी के मध्य सुरक्षित रहती है। प्रकृति प्रदत्त इस व्यवस्था से ऐसा आभास
होता है,

कि जैसे देवी नर्मदा धीरे-धीरे और भव्यता से आगे बढ़ रही है। जबकि सतपुड़ा और विन्ध्याचल पर्वत श्रृंखलाएँ उनके अङ्गरक्षक की भांति इस पुण्य पुनीता कन्या के अधिकार को सुरक्षित कर रहे हों। नर्मदा एक विशाल एवं चिर स्थायी नदी है जिसके तट पर कई स्मरणीय घटनाएँ घटी हैं

और इसे भारत की पौराणिक एवं ऐतिहासिक गाथाओं में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। यह मानव सभ्यता के प्रकट होने वाले उन दिनों की मानव गतिविधियों की मूक साक्षी है जिसकी पुष्टि पाषाण संस्कृति की खोजों से होती है।

महान महाकाव्य, पुराण और आरंभिक संस्कृति पाठ इस सम्मान्य नदी की जीवनदायी शक्ति की व्याख्या करते हैं। पुरातन संस्कृत रचनाओं में से एक भवानी तन्त्र’ में नर्मदा की जीवनदायिनी शक्ति की सम्पूर्ण व्याख्या की गई है जो इस प्रकार है:

समृद्धि की दाता,
लोगों के दुःखों की विनाशक,
पापों का विनाश करने वाली।
लोगों द्वारा सच्चे दिल से पूजनीय ॥

के घने जंगलों के बीच स्थित है और अभी भी अस्पष्ट है और काफी हद तक औद्योगीकरण तथा आधुनिक सभ्यता के प्रभाव से प्रदूषित नहीं हो पाया है। नर्मदा अपनी प्रारंभिक अवस्था में यहाँ से एक छोटी, सकरी धारा के रूप में बहती है,

और दर्शनार्थी के मस्तिष्क में इस बात का भ्रम पैदा करती है कि क्या यह वह नदी
है जो कि भरूच के निकट अपनी यात्रा के अन्तिम दौर में एक विशाल नदी के रूप में
परिणित हो जाती है । यहाँ जल बिलकुल स्वच्छ है तथा तटों पर वृक्षों की हरियाली है।

अमरकंटक में न सिर्फ दिन सुहावने होते हैं बल्कि संध्या भी सुहावनी और शान्त होती
है वैसे ही नर्मदा का पानी अस्त होते सूर्य की रोशनी से चमकने लगता है। अस्त होते सूर्य
द्वारा बादलों में छोड़े गए चमकदार रंग परावर्तित होकर स्पष्ट रूप से धीरे-धीरे बहती हुई
नदी के उथले स्थल में नजर आते हैं

और भ्रम पैदा करते हैं जैसे कि चमकदार बादल भी नदी के जल के साथ आगे बढ़ रहे हों। उसे नर्मदा महामदा, रेवा, रजनी, कामदा, विमत्सा, मान संवर्धिनी, मेखलासुता, पश्चिम वाहिनी, पापनाशिनी आदि अनेक नामों से सम्बोधित किया गया है। भारत के कोने-कोने से श्रद्धालुगण अपनी वृद्धा व्यक्त करने समय-समय पर पूजा आराधना के लिए उपस्थित होते रहते हैं।

नर्मदा तट पर स्थित जबलपुर से लगभग 22 किलोमीटर दूर भेड़ाघाट नामक स्थान है जो संगमरमरी प्रकृति की छटा के लिये विश्वविख्यात है। यों कहा जाय कि यहाँ प्रकृति स्वयं अपने सौन्दर्य पर मुग्ध है। प्रख्यात कवि श्रीधर पाठक के शब्दों में “प्रकृति यहाँ एकान्त बैठी, निज रूप सँवारि ।”

पुराणों में उल्लेख है गंगा ऋग्वेद की मूर्ति है यमुना यजुर्वेद की, सरस्वती अथर्ववेद की तथा नर्मदा सामवेद की मूर्ति है।

ऋग्वेद मूर्ति गंगा स्याद् यमुना व यजुर्भुवम् ।
नर्मदा साममूर्ति स्यादथर्वो सरस्वती ॥

सामवेद की प्रतिमूर्ति इस नर्मदा का भरपूर आशीर्वाद जबलपुर संस्कारधानी को मिला है। अमरकंटक की निनाद और मन्द स्वर वाली नर्मदा यहाँ तीव्र और तुमुलध्वनि करती हुई धुंआधार नामक जलप्रपात में दुग्ध धवल धारा में परिवर्तित होकर गिरती है । वशिष्ठ ऋषि ने इसे दिव्यारूपा नदी कहा था।

“नर्मदा का एक नाम है रेवा जिसका संस्कृत में अर्थ होता है उछलना-कूदना। यहाँ धुंआधार में चिर-कुमारी नर्मदा की यह अल्हड़ उछलकूद-मिलेगी तो भेड़ाघाट में तपस्विनी की भाँति गहन गंभीर भाव गरिमा। इस नदी ने देश-विदेश के साधुओं, विद्वतजनों और पर्यावरण विदों को अपने स्वच्छ जल, अपने आसपास की हरीतिमा की ओर आकर्षित किया है। नर्मदा मध्य प्रदेश की जीवन रेखा तथा पवित्र नदियों में से एक है।”

मध्य प्रदेश के महत्वपूर्ण नगर और तीर्थ स्थान इसके तट पर स्थित हैं। इसको दक्षिण की गंगा भी कहा गया है।

इसने लेखक है डॉ. किशन काछवाह 

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