सुनने के लिए क्लिक करें

रावण वंचितों जनजातियों का मसीहा / पूर्वज नहीं है :

रामायण युद्ध युग परिवर्तन कारी घटना थी , तब पिता की आज्ञा पर राज पाट छोड़कर जंगल में बसने वाले प्रभु राम को वनों में निवासरत समुदायों ने सहज अपने से जुड़ा माना , और वे उनके लिए देवतुल्य होकर , पीढ़ियों तक उनकी कहानियों गीतों में रच बस गए ,

इसका ही उदाहरण है , गोंडी रामायण , जो रामायण को अपने दृष्टिकोण से देखती है , हज़ारों सालों से गोंडी रामायण व पंडवानी वनों में रहने वाले जनजाति समाजों की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा रहे ।

गोंडी भाषा में “ रावेन “ शब्द जिसका अर्थ प्राचीन है , जो पुरखे के लिए भी किया जाता है , आज उसे “ रावण “ का पर्यायवाची माना जाने लगा है , हास्यप्रद है ।

जब 1813 में चार्टर एक्ट बना और शिक्षा के नाम पर धर्मप्रचार को मान्यता मिली , और खनिज वन सम्पदा के दोहन में जनजाति आड़े आने लगे तब , उनकी इस सांस्कृतिक विरासत को तोड़ने के लिए , बड़ी संख्या में बाहरी लोगों और जनजातियों के बीच वर्ग संघर्ष का बीज बोया गया ,

इस वर्ग संघर्ष का आधार जाती व्यवस्था को बनाया गया और वंचित वर्ग के नायकों के रूप में बुराई के प्रतीकों को स्थापित किया गया , ये उसी आर्य आक्रमण सिद्धांत के बीज थे , जिसने अंग्रेजों को 1857 में उत्तर व दक्षिण में बाँटकर मात्र 50000 यूरोपीय सैनिकों की मदद से पहले स्वतंत्रता संग्राम को विफल कर दिया ।

अंग्रेज़ी हुकूमत जब 1947 में गई तब अपनी “ ट्रिनिटी “ राजा , सेना व मिशन में से केवल पहले दो को ही वापस लेकर गई , और तीसरी ताक़त को यहीं पर रहने दिया , इस तीसरी ताक़त ने पूरे प्रयासों के बाद भी वनों में रहने वाले जनजाति समाजों को अपने चंगुल में करने में विफल रहे,

मगर इक्कीसवी सदी के भारत में सूचना क्रांति ने इनके प्रॉपगैंडा को वामपन्थ के साथ मिलकर नयी ताक़त दी है , इसका ही नतीजा है , आज के रावण और महिसासुर जैसे खलनायकों को वंचित वर्ग का मसीहा / पूर्वज स्थापित करने का षड्यंत्र ।

इस षड्यंत्र को समझने के लिए निष्पक्ष जैन रामायण व अन्य अभिलेखों से देखने का प्रयास करते हैं , क्यूँकि उनमें इतिहास बोधक तथ्य महत्वपूर्ण हैं, और कोई भावनात्मक अतिशयोक्ति नहीं है ।

प्रथम सप्त ऋषियों में से एक पुलस्त ऋषि हुए। उनका पुत्र विश्रवा हुआ। विश्रवा की पहली पत्नी भारद्वाज ऋषि की पुत्री देवांगना थी जिसका पुत्र कुबेर था। विश्रवा की दूसरी पत्नी नागवंशी राजा की पुत्री कैकसी थी जिसकी संतानें रावण, कुंभकर्ण और विभीषण थीं। जैन शास्त्रों में रावण को प्रति‍-नारायण (प्रति-वासुदेव) माना गया है। राम को बलदेव और लक्ष्मण को वासुदेव माना गया है। ये तीनों जैन धर्म के 63 शलाका पुरुषों (युग पुरुषों) में रावण की गिनती की जाती है।

जैन शास्त्रों में क्रमशः नो बलदेव, वासुदेव और प्रति वासुदेव हैं। बलदेव और वासुदेव एक पिता की संतान होते हैं परंतु उनकी माताएं अलग होती है। बलराम और श्रीकृष्ण भी क्रमशः बलदेव और वासुदेव हैं। जरासंध प्रति वासुदेव माने जाते हैं। जैन शास्त्रों के अनुसार वासुदेव प्रति वासुदेव का वध करते हैं। प्रति वासुदेव अधर्मी पर पराक्रमी राजा होते हैं।

जैन रामायण व प्राचीन गोंडी रामायण में एक विशिष्ट समानता है, जैन आगम व गोंडी रामायण सभी पुराणिक घटनाओं को अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं, चूँकि ये जिन चरित अथवा जनश्रुति हैं इसीलिए इनमें इतिहासिक तथ्य वास्तविकता के नज़दीक हैं, और ये किसी भी प्रकार का महिमामंडन नहीं करते और आम जन के क़रीब नज़र आते हैं, इसी प्रकार गोंडी रामायण (रामायनी) जो मौखिक इतिहास की अद्भुत व महान रचनाएँ हैं, इन्हें केवल मौखिक परम्परा से जीवित रखा गया है।

जैन रामायण, प्रचलित रामायण के अलग बाली, सुग्रीव व श्री हनुमान को वन्य प्रदेश के राजा व सेना पति के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो की मानव रूप में हैं ना की वानर रूप में, स्पष्ट रूप से जैन आगम रावण को बुद्धिमान ब्राह्मण प्रस्तुत करते हैं, तो यह प्रश्न खड़ा होता है जब रावण एक ब्राह्मण था तो वंचित वर्ग का मसीहा या पूर्वज कैसे हो सकता है ?

उसी प्रकार गोंडी रामायण भी रावण को पुलत्स वंशी ब्राह्मण मानती है, ना की आदिवासियों का पूर्वज, कुछ ग़ोंड़ पुजारी रावण को गुरु भाई मानते हैं, चुकी पुलत्स ऋषि ने उनके पूर्वजों को भी दीक्षा दी थी, मगर ये पूर्वज मानने से भिन्न है।

विभिन्न प्राचीन लिखित साक्ष्यों में रावण के योगदान का वर्णन इस प्रकार मिलता है :

आयुर्वेद, तंत्र और ज्योतिष का ज्ञाता : रावण अपने युग का प्रकांड पंडित ही नहीं, वैज्ञानिक भी था। आयुर्वेद, तंत्र और ज्योतिष के क्षेत्र में उसका योगदान महत्वपूर्ण है। इंद्रजाल जैसी अथर्ववेदमूलक विद्या का रावण ने ही अनुसंधान किया। उसके पास सुषेण जैसे वैद्य थे, जो देश-विदेश में पाई जाने वाली जीवनरक्षक औषधियों की जानकारी स्थान, गुण-धर्म आदि के अनुसार जानते थे। रावण की आज्ञा से ही सुषेण वैद्य ने मूर्छित लक्ष्मण की जान बचाई थी।

रावण के बारे में वाल्मीकि रामायण के अलावा पद्मपुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, कूर्मपुराण, महाभारत, आनंद रामायण, दशावतारचरित आदि हिन्दू ग्रंथों के अलावा जैन ग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है।

शिव का परम भक्त, यम और सूर्य तक को अपना प्रताप झेलने के लिए विवश कर देने वाला, प्रकांड विद्वान रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ बहु-विद्याओं का जानकार था। उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। यह भी उल्लेख मिलता और कहा जाता है कि रावण ने कई शास्त्रों की रचना की थी। आओ जानते हैं कि वे कौन कौन से शास्त्र थे।

शिव तांडव स्तोत्र : रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की। रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले जाने लगा, तो भगवान शिव ने अपने अंगूठे से तनिक-सा जो दबाया तो कैलाश पर्वत फिर जहां था,

वहीं अवस्थित हो गया। इससे रावण का हाथ दब गया और वह क्षमा करते हुए कहने लगा- ‘शंकर-शंकर’- अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया। यह क्षमा याचना और स्तुति ही कालांतर में ‘शिव तांडव स्तोत्र’ कहलाया।

अरुण संहिता : संस्कृत के इस मूल ग्रंथ का अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है। मान्यता है कि इस का ज्ञान सूर्य के सार्थी अरुण ने लंकाधिपति रावण को दिया था। यह ग्रंथ जन्म कुण्डली, हस्त रेखा तथा सामुद्रिक शास्त्र का मिश्रण है।

रावण संहिता: रावण संहित जहां रावण के संपूर्ण जीवन के बारे में बताती है वहीं इसमें ज्योतिष की बेहतर जानकारियों का भंडार है।

चिकित्सा और तंत्र के क्षेत्र में रावण के ये ग्रंथ चर्चित हैं-
1. दस शतकात्मक अर्कप्रकाश,
2. दस पटलात्मक उड्डीशतंत्र,
3. कुमारतंत्र और
4. नाड़ी परीक्षा।

रावण के ये चारों ग्रंथ अद्भुत जानकारी से भरे हैं। रावण ने अंगूठे के मूल में चलने वाली धमनी को जीवन नाड़ी बताया है, जो सर्वांग-स्थिति व सुख-दु:ख को बताती है। रावण के अनुसार औरतों में वाम हाथ एवं पांव तथा पुरुषों में दक्षिण हाथ एवं पांव की नाड़ियों का परीक्षण करना चाहिए।

अन्य ग्रंथ: ऐसा कहते हैं कि रावण ने ही अंक प्रकाश, इंद्रजाल, कुमारतंत्र, प्राकृत कामधेनु, प्राकृत लंकेश्वर, ऋग्वेद भाष्य, रावणीयम, नाड़ी परीक्षा आदि पुस्तकों की रचना की थी।इसी प्रकार शिशु-स्वास्थ्य योजना का विचारक ‘अर्कप्रकाश’ को रावण ने मंदोदरी के प्रश्नों के उत्तर के रूप में लिखा है।

इसमें गर्भस्थ शिशु को कष्ट, रोग, काल, राक्षस आदि व्याधियों से मुक्त रखने के उपाय बताए गए हैं। ‘कुमारतंत्र’ में मातृकाओं को पूजा आदि देकर घर-परिवार को स्वस्थ रखने का वर्णन है। इसमें चेचक, छोटी माता, बड़ी माता जैसी मातृ व्याधियों के लक्षण व बचाव के उपाय बताए गए हैं।

केवल रावण दहन का विरोध करने वालों को उसके लिखित शास्त्रों का भी अध्ययन करना चाहिए, ना की केवल वामपंथी षड्यंत्र की भेड़चाल का अनुसरण करना, उपरोक्त वर्णित रावण कृत ग्रंथ पिसनहारी जैन आध्यात्मिक पुस्तकालय जबलपुर में उपलब्ध भी हैं ।

आज जैन रामायण की 1500 वर्ष पुरानी लिखित प्रतियाँ सुरक्षित हैं मगर दुर्भाग्य से गोंडी रामायण अब लुप्त होती जा रही है, इसे को सहेजने का प्रयास दिल्ली स्थित इंद्रिरा गांधी कला केंद्र द्वारा किया गया, जिन्होंने पूरी गोंडी रामायण को चित्रों में प्रस्तुत किया है ।

रावण के ज्ञान का अनुकरण करने की सिख स्वयं श्री राम ने लक्ष्मण को दी और रावण से प्रशासन व प्रबंधन के गुण सिखने भेजा, यही हमारी सनातन परम्परा है, जो ज्ञान का सम्मान तो करती है परंतु कर्म अनुसार परिणाम का भी संदेश देती है …

असंख्य लिखित साक्ष्य उपलब्ध हैं , रावण के एक ज्ञानी ब्राह्मण के साथ एक परस्त्री माँ सीता के अपहरण कर्ता होने के । इसके उलट एक भी एतिहासिक लिखित साक्ष्य नहीं है , रावण के वंचित जनजाति समुदाय के मसीहा या पूर्वज होने के , हाँ कुछ नयी कहानियाँ मिशन या वामपन्थ की प्रयोगशाला से निकल रहीं हैं ।

मेरे लेख का शीर्षक इसीलिए स्पष्ट है , जो षड्यंत्रकारी ताक़तें रावण को वंचित समुदायों के पूर्वज सिद्ध करने पर आमादा हैं , उन्हें इन षड्यंत्रों के राजनीतिक लाभ स्पष्ट दिख रहे हैं , कई जनजाति वर्गों ने रावण के पुतले दहन का विरोध करने के लिए FIR तक करने की धमकियों हास्यास्पद हैं , और हज़ारों वर्षों से इस सांस्कृतिक रिवाज को भय से भूलने वाले अनभिज्ञ हैं , आज ये रावण दहन का विरोध कल राम व मूर्ति पूजा में बदल जाएगा , क्या तब भी हम , इस षड्यंत्र पर चुप रहेंगे ?

मेरी एक रचना इस पूरे रावण को वंचित वर्ग का मसीहा स्थापित करने के विमर्श पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष करती है :

“ भारतीय सभ्यता के केवल दो मूल हैं , आगम व वेद …
आगम का अर्थ है , जो उपादान से प्राप्त हुए , अर्थात आदि शिव के द्वारा बताए हुए …
आगम , सिद्धांत हैं , गूढ़ सिद्धांत , जो शाश्वत सत्य हैं , जो गूढ़ प्रश्नों का उत्तर देते हैं , सरलतम हैं , सुंदर हैं …
शिव जैसे हैं …

दुर्भाग्य से , आगम , आडंबर नहीं करते , जैसे ” सब कुछ शिव से प्राप्त है , सभी उसके अंश से जुड़े हैं ” , जब सभी , शिव से जुड़े हैं , तो कोई वर्ण नहीं है , सब समान है , सभी को आत्मतत्व के ज्ञान का अधिकार है ,
आगम , केवल प्रक्रिया में विश्वास दिलाते हैं , ऐसा करो , क्यूँ करो मत पूछो , क्यूँकि , सवाल ही विवाद उत्पन्न करते हैं , शिव अविवादित हैं …

जब वेदों का सामना , आगम से हुआ , तो उपनिषद जन्मे … जो वेदों की काट थे … मूँड़ोकउपनिषद , कहता है , सिर्फ़ ब्राह्मणों को स्वर्ग का अधिकार नहीं , सभी को है … वो वर्ण व्यवस्था को नकार देते हैं , आयोजनों , आडंबरों को उखाड़ फेंकते हैं … इनसे सी प्रेरित होकर , बुद्ध निकलते हैं , महावीर निकलते हैं , चार्वाक निकलते हैं , पूरन कश्यप निकलते हैं ,

अजित केश कम्बलिन निकलते हैं , जो केवल वेदों और आगमों के गूढ़ सत्यों को उजागर करते हैं , सत्य को सरल कर देते हैं , ये कहते हैं , जन्म से मृत्यु जन्म लेती है , ठीक वैसे जैसे सुख से दुःख जन्म लेता है , इसीलिए , सब नश्वर है , जो बचेगा वो केवल सत्य है , तुम सत्य को खोजो , आडंबरों से बचो ….

मगर उनकी सरल बातों को हम नकार देते हैं , क्यूँकि इसमें रोचकता नहीं है , ऋषि मुनि थक गए , कड़वी बातों से सच बताते बताते , कोई नहीं सुनता .. फिर ऋषि मुनि , सत्य को रोचक बनाते हैं , आदर्श पुरूषों के द्वारा सत्य को समय समय पर , आचरण द्वारा दिखाया जाता है , उनकी कहानियों में , गूढ़ सत्यों को , मिला जुला कर , आपको सत्य का दर्शन कराया जाता है , कुछ सदियों तक तो ठीक रहता है , फिर सत्य फीका लगने लगता है …

तब ऋषि मुनि कहते हैं , अब बस , अब नहीं , जो खोजेगा , सिर्फ़ उसको मिलेगा सत्य , मुफ़्त में सिर्फ़ , कहानियाँ मिलेंगी ..

समाज में सत्य की कमी हो जाती है , अराजकता फैल जाती है , इस अराजकता का लाभ , कुछ निक्कम्मे लोग उठा लेते हैं , वो कर्म काण्ड बना देते हैं , जो रोचक हों , आडंबरों से भरपूर , हमें वो अच्छे लगने लगते हैं , कमाई होने लगती है , फिर निकम्मे लोग सोचते हैं , सत्य को छुपा दो , वेदों , आगमों , उपनिषदों को छुपा दो , इन्हें पढ़ लिया तो सत्य जान लेंगे ..

हमारी कमाई कैसे होगी , नियम बनाओ , की बस फ़लाँ ही बांचेगा वेद , फ़लाँ ही गाएगा आगम … कई पीढ़ियाँ निकम्मों की बिना वेद , आगम उपनिषद पढ़े निकल जाती हैं , सिर्फ़ पोथियाँ बाँच लो .. काम चल जाएगा ….

अराजकता फैल जाती है , समाज में कुछ लोग कहने लगते , हमपे अत्याचार हुआ , हमें वेद पुराण , आगम , उपनिषद नहीं पढ़ने दिया … इसीलिए सब व्यर्थ है , हम कुछ नया पढ़ेंगे , बुद्ध को पढ़ेंगे … मगर कोई नहीं पढ़ता , क्यूँकि किसी का उद्देश्य पढ़ना नहीं है , आलोचना करना है , निंदा करना है , निंदा में रस है , और पराए ज्ञान में रस है , इसीलिए हमें बाहर का आडंबर और भाने लगता है …

क्यूँकि उनकी पोथियाँ नयी थी , नयी जिल्द चढ़ी थी उसमें … अब लोग बुद्ध को भी भूल गए , महावीर को भी भूल गए , जिन आदर्श पुरूषों ने सत्य को आचरण बनाकर , दिखाया , उनको भूल गए … अब जो बुरा था , वो आकर्षित करने लगा , राम क्रूर , लगने लगे , रावण प्रिय हो गए , दुर्गा बुरी हो गई , महिषासुर , पूर्वज हो गए , भले लोगों को अपनी चार पीढ़ी के पहले किसी का नाम याद ना हो ,

मगर महिसासुर , रावण पूर्वज है , याद रहा , याद रहा … सारे धुँधलके में , हमारी सभ्यता के गूढ़ सत्य खो गए , सारे ऋषि मुनि जो सत्य को खोजने की कुंजी , वेदों , आगमों , उपनिषदों , शिव के सूत्रों में दे गए थे , ग़ायब हो गई …. बच गई बस निंदा , कर्मकांडों , परवर्ती , आपद धर्म के बहाने , सत्य को छुपाने वाले लोगों की निंदा … मगर निंदा से क्या होगा , सत्य तुम फिर भी ना खोजोगे , तुम्हें तो नए कर्म काण्ड चाहिए , तुम्हें नए रावण , नए महिसासुर चाहिए …

तुम इसी लायक हो …

लक्ष्मण राज सिंह मरकाम ‘ लक्ष्य ‘ …

इस रचना को पढ़ने के बाद , उन मूढ़ मति धारी और वंचित जनजातियों के नक़ली शुभ चिंतकों से मेरा सवाल है कि उनके इस षड्यंत्र से भोले भाले जनजातियों की हज़ारों वर्षों की साझा सनातन विरासत नष्ट हो रही है , शक्ति चाहे सत्ता की हो या धन की , अलगाव के रास्ते से नहीं पायी जा सकती । आज वे सहज राम राम बोलते हैं , कल रावण रावण भी करने लगेंगे , मगर क्या एक अपहरण कर्ता रावण को हम किसी भी समाज का नक़ली आदर्श या पूर्वज बना सकते हैं ?

आने वाले दशहरे के दिन अपनी क्षमता व गुण रूपी शक्तियों की आराधना करें , व अवगुन रूपी रावण का दहन करें , रावण दहन का विरोध करने वाले लोग , भारत के सामविधान व क़ानूनों से अनभिज्ञ हैं , कोई भी क़ानून किसी भी वर्ग को लिखित ग्रंथों व पारम्परिक मान्यताओं को मनाए जाने से नहीं रोक सकता , अगर वे रावण रूपी दैत्य को अपना मसीहा या पूर्वज मानते हैं तो वे स्वतंत्र हैं , लेकिन उनकी ये स्वतंत्रता उन्हें दूसरे की परम्पराओं को मानने से नहीं रोक सकती ।

सूर्यकांत त्रिपाठी “ निराला “ ने राम की शक्ति पूजा में, रावण वध उपरांत श्री राम के मन में उत्पन्न भाव को मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है :

राम का विषण्णानन देखते हुए कुछ क्षण

“हे सखा” विभीषण बोले “आज प्रसन्न वदन
वह नहीं देखकर जिसे समग्र वीर वानर
भल्लुक विगत-श्रम हो पाते जीवन निर्जर,
रघुवीर, तीर सब वही तूण में हैं रक्षित,

है वही वक्ष, रणकुशल हस्त, बल वही अमित,
हैं वही सुमित्रानन्दन मेघनादजित् रण,
हैं वही भल्लपति, वानरेन्द्र सुग्रीव प्रमन,
ताराकुमार भी वही महाबल श्वेत धीर,

अप्रतिभट वही एक अर्बुद सम महावीर
हैं वही दक्ष सेनानायक है वही समर,
फिर कैसे असमय हुआ उदय यह भाव प्रहर।
रघुकुलगौरव लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण,
तुम फेर रहे हो पीठ, हो रहा हो जब जय रण।

लक्ष्मण राज सिंह मरकाम “ लक्ष्य ”                                                                                           (लेखक सामाजिक चिंतित एवं विचारक)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here