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भारत भूमि देवभूमि है ,जहाँ हर युग में परमात्मा ने अवतार लेकर भारत देश को आध्यात्म, दर्शन, कौशल, वैज्ञानिक आविष्कारों,योग और चिकित्सा के रुप में विभिन्न ज्ञान के आकर्षण भंडारों से परिपूर्ण किया है।और कालांतर में भारत के मनीषियों ने भारत को विश्व गुरु के सर्वोच्च सिंहासन पर आरूढ़ कर दिया।

यह सत्य है कि भगवान श्रीराम भारत राष्ट्र की चेतना का आधार है और सदैव रहेगें। मानव जीवन में सनातन धर्म का समावेश होने के कारण भारतीय मानस ने भगवान श्री राम के चिंतन को हृदय की अनंत गहराइयों से स्वीकारा है किंतु श्री राम के जीवन चरित्र को कितने मनुष्यों ने अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया?यह यक्ष प्रश्न है।

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आज कलयुग में मर्यादा जहाँ अपनी सीमाओं के बाँध तोड़ चुकी हैं, अस्मिता,शुचिता,सौम्यता एक बाहरी आवरण मात्र बनकर रह गई है। धन की लोलुपता के सम्मुख चरित्र का कोई मोल नहीं, ऐसे में भारतीय धर्मदंड को चिरकाल तक स्थापित करने के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण के चरित्र का अनुकरण आज की प्रासंगिकता है।

श्रीकृष्ण ने अपने स्वरुप और उसकी प्रकृति में परिवर्तन किया- वृंदावन में ग्वाले का रुप और गोपियों के कान्हा का रुप रखा (मात्र 6 वर्ष की आयु में श्री वृषभान लली राधा जु के साथ उनकी सखियों के संग श्री निधिवन में संकीर्तन का लास्य रचाया) , माखन भी चोरी की, चितचोर भी हुए,धर्म स्थापना हेतु अर्जुन के रथ सारथी भी बने, कुरुक्षेत्र में धर्म उपदेश भी दिया। द्रोपदी के चीरहरण में उसकी रक्षा करके या नरकासुर द्वारा बंधक बनाकर रखी हजारों स्त्रियों को बंधन मुक्त करके श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक राष्ट्र में नारी सम्मान की अधिकारी है।

हमारे पवित्र ग्रंथ गीता में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है:

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानम धर्मस्य तादात्मनम सृजाम्यहम्।।

अर्थात् हे पार्थ !जब जब पृथ्वी पर धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होगी तब तक मैं धर्म की पुनर्स्थापना हेतु अपने विभिन्न अवतारों में अवतरित होता रहूँगा।

भगवान श्री हरि विष्णु ने इस पृथ्वी पर अब तक धर्म की पुनर्स्थापना और जन कल्याण के लिए 23 अवतार लिए जिसमें भगवान श्री कृष्ण का अवतार एक पूर्ण अवतार है। श्रीकृष्ण जी को भगवान आदिदेव महादेव के पश्चात योगेश्वर, नटेश्वर ,नटराज कहा गया। श्री कृष्ण का अवतरण “द्वापर और कलयुग” के संधि काल में हुआ ।भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का प्रारंभ उनके जन्म के साथ ही प्रारंभ हो जाता है और संपूर्ण जीवन श्रीकृष्ण जी ने अपनी भिन्न-भिन्न ने लीलाओं के माध्यम से मनुष्य जीवन को जीवन जीने का मार्गदर्शन दिया है। श्री कृष्ण ने समय काल परिस्थिति अनुसार अपने स्वरूप और व्यवहार में जो परिवर्तन किया वह अद्भुत है।

वृंदावन में बाल स्वरुप में रास रचाकर वह मथुरा आ गए जहाँ से प्रभु का लालित्य रूप कर्मठ रूप में परिलक्षित हुआ।मथुरा में चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध करते हुए कंस मामा के वध के पश्चात आप मथुरा से आगे बढ़ गए पुनः वृंदावन की ओर कभी नहीं आए।मनुष्य जीवन में भी बाल्यकाल व्यतीत होने के पश्चात तरुण अवस्था में आते-आते जीवन के संघर्षों का नया अध्याय जुड़ जाता है सभी अपने प्रारब्ध या अपनी योग्यता, रूचि के अनुसार अपने- अपने कर्म क्षेत्र का चयन करते हुए जीवन में आगे बढ़ते हैं।जिसे अपने पिछले जीवन से मोह होता है वह समाज और जीवन के प्रगतिरूपी प्रभाव से कट जाते हैं, जबकि प्रवाहमान को ही सद्गति मिलती है रुकना मृत्यु के समतुल्य है।

श्री राम राज्य में धर्म परायणता थी। नीर,क्षीर, विवेक की बात प्रभु राम के चरित्र में स्पष्ट परिलक्षित होती है, किंतु श्री कृष्ण ने निष्काम भाव से किए गए कर्म को प्रधानता दी। आपके सम्मोहित रूप में कभी जहाँ प्रेम भाव में अधरों को मुरलिया स्पर्श करती है, तो कर्म भाव में सुदर्शन उंगलियों में सुसज्ज रहता है।

चंद्रमा की सोलह कलाओं के साथ जीवन के उत्थान और पतन के समय अंतरात्मा के अंधकार को ईष्ट के प्रति विश्वास और समर्पण से जीने योग्य बनाया जा सकता है। अंधकार मिटाया नहीं जा सकता स्वयं को उसमें कैसे परिस्थिति अनुकूल ढालना है यह श्रीकृष्ण का चरित्र हमें सिखाता है।

आज साम- दाम-दंड -भेद की नीति हर व्यक्ति के मन में ज्वार-भाटे की तरह हिलोरें लेती है। छल दंभ से आगे बढ़ने के लिए चाटुकारिता करते हुए व्यक्ति अपनी अंतरात्मा के सुदृढ़ स्तंभों को सदैव के लिए धराशाई करके भी मुस्कुराता रहता है ऐसे में श्रीकृष्ण जी ने जीवन रूपी समर भूमि में खड़े प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्तव्यों का बोध करा कर आगे बढ़ने का संदेश दिया है । श्रीकृष्ण ने कलयुग की कलुषित चालों से अपने भक्तों को पूर्व में ही सावधान करते हुए गीता रूपी प्रकाशस्तंभ से भवसागर पार करने का मार्गप्रशस्थ किया है।

आप अपने प्रतिद्वंदी को पहले अवसर देकर मार्ग में लाने का प्रयास करते हैं (शिशुपाल,दुर्योधन) अन्यथा युद्ध का मार्ग सदैव सभी के लिए सहज रूप से खुला है। युद्ध में धर्म परायणता के साथ नीतिगत होकर कैसे विजयी होना है ? छल को छल से (कालयवन और राजा मुंचकुंद ), बल को बल से (मथुरा में मल्हयुद्ध)और धूर्त को धूर्तता से (शकुनि) कैसे परास्त करने का गूढ़ ज्ञान श्रीकृष्ण जी ने ही हमें दिया है।

संतो कर्मन की गति न्यारी……

अर्थात कोई भी जीवात्मा यही का यही किए गए कर्मों का भोग करके अपनी अगली यात्रा के लिए प्रस्थान करती हैं किंतु जब सज्जन और भद्र मनुष्य कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं,तब समझ लेना चाहिए कि उसका प्रारब्ध उसके पुण्य का क्षय कर रहा है।न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम तो अभी अभी स्पष्ट हुआ किंतु सनातनी संस्कृति में युगों-युगों से गीता यही कहा रही है “जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान” अर्थात व्यक्ति के कर्म जैसे होंगे उसकी फलश्रुति उन कर्मों के अनुसार ही उसे प्राप्त होगी। सरल शब्दों में हम अपने कर्मों की गेंद को जिस ओर उछालेंगे वह उसी वेग से आप तक वापस आएगी।

आज धर्म अपने वर्चस्व का विषय बन गया है। लोभ,ईर्ष्या,छल,बल के माध्यम से व्यक्ति की मानसिकता में परिवर्तन करके व्यक्ति को किसी धर्म विशेष की ओर समर्पित कराया जा रहा है।इस संदर्भ में भगवान श्री कृष्ण ने हमें मार्गदर्शन दिया है कि यदि धर्म आपके राष्ट्र से संबंधित हो ,आपके जन्म से संबंधित हो, आपके कर्म से संबंधित हो और आप इसकी रक्षा करोगे तो यह स्वयं आपकी रक्षा करेगा। कहा भी गया है- धर्मो रक्षति रक्षित:…

अर्थात् धर्म का लोप कर देने से धर्म का लोप कर देने वालों का, धर्म नाश कर देता है और धर्म की जो रक्षा करता है ,धर्म उसकी रक्षा करता है।

श्री कृष्णा सोलह कला में प्रवीण थे जिसमें कला (नृत्य कला-डांडिया रास या लास्य,बांसुरी वादन) वाकपटुता हो या युद्ध कला ( कालारिपयट्टू विद्या के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण को ही माना जाता है।इस विद्या के कारण ही ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर संहारक सेना बन गई थी।यह युद्धकला बाद में बौद्धधर्म के प्रचार के समय भारत से बाहर होते हुए चीन, जापान व अन्य देशों में आधुनिक मार्शल आर्ट के रुप में विकसित हुई। आज भी यह विद्या केरल और कर्नाटक में प्रचलित है जिसका प्रसार अगस्त्य मुनि द्वारा किया गया था)।

श्रीकृष्ण की “कूटनीति” सर्वश्रेष्ठ कूटनीति रही।दूरदर्शी,अनुशासनप्रिय जनप्रिय, नटेश्वर के ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता को एक सर्वश्रेष्ठ प्रबंध ग्रंथ के रुप में विश्व पटल पर स्वीकार किया गया है।

आज के बदलते परिवेश में कर्म प्रधान जीवन की प्रधानता है क्योंकि धर्म के प्रति उसकी आसक्ति, उसका समर्पण ,उसका विश्वास शैने-शैने कम होता जा रहा है।

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