‘पेरू’ शब्द का अर्थ संस्कृत में “सूर्य का देश” होता है। सूर्य-पुत्रों का देश पेरू कहा जाए यह स्वाभाविक ही है। भारतीयों का दिया हुआ यही नामकरण ‘पेरू’ में अब भी प्रचलित है।

अमेरिका से 2400 मील दूर “हवाई दीप समूह” पर आज अमेरिका का शासन है। किसी समय वहां भारतीयों का आधिपत्य था। वहां की चट्टानों पर जो आकृतियां खुदी हुई हैं, मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में पाई गई मोहरो पर खुदी आकृतियों से हूबहू मिलती हैं।

शिलालेखों और उपलब्ध प्रतिमाओं में सूर्य देवता तथा त्रिशूल, चक्र ,पाद्द्ं, शंख आदि देव आयुधों की आकृतियां हैं। इसी दीप समूह के एक दीप ‘कोऊ आई’ के संग्रहालय में ऐसे अनेक प्रमाण सुरक्षित हैं और भारतीय पुरातत्ववेता डॉ. छाबड़ा ने उस देश में भ्रमण करके ऐसे 40 प्रमाण संग्रह किए थे, जिनसे भारत के साथ उन देशों के प्रगाढ संबंधों का परिचय मिलता है।

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हवाई द्वीप निवासी लोगों की आम धारणा है कि उनके पूर्वज भारतीय थे। उनकी मुखाकृतियाँ स्पष्टत: भारतीयों से ही मिलती हैं। यूरोपियनो तथा अमेरिकनो से उनका रक्त संबंध तनिक भी नहीं दिखता, यों अब वहां पाश्चात्य सभ्यता का ही बोलबाला है। इस प्रदेश की भाषा में संस्कृत शब्दों की भरमार पाई जाती है।

अमेरिका में इंग्लैंड के लोग अधिक पहुंचे। जन -बल, धन-बल और शस्त्र-बल की शक्तियां भी उन्हीं के पास अधिक थी ,तदनुसार उन्हीं का शासन उस देश पर स्थापित हो गया। पहले इंग्लैंड की सरकार ही वहां पर शासन करती थी। पीछे वह देश स्वतंत्र हो गया। फिर भी वहां की संस्कृति ,भाषा और विशिस्टता अभी भी इंग्लैंड मूल के लोगों की ही है। इस विशाल भू-भाग पर एक खंड कनाडा है। कनाडा 40 लाख वर्ग मील में बसा है। बहुत -सा क्षेत्र अंग्रेजों का है। 30 प्रतीशत फ्रांसीसी रहते हैं। बड़ी संख्या में यूरोपियन भी रहते हैं। आबादी पच्चीस करोड़ के करीब है।

कनाडा में भी आदिवासी बसे हुए हैं। उन्हें भारतीय मूल का माना जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में उन्हें ‘रेड इंडियन’ कहा जाता है किंतु कनाडा के मूल निवासी ‘इंडियन’ शब्द से ही संबोधित किए जाते हैं। उनके साथ ‘रैड’ का विश्लेषण नहीं लगाया जाता। इतिहास विशेषज्ञों का मत है कि प्राचीन काल में एशिया और अमेरिका के बीच थल- मार्ग था।

मध्य एशिया के आर्य वंश के लोग वहां पहुंचे तो उन्होंने इन ‘इंडियन’ को वहां बसा पाया। अब से ढाई सौ वर्ष पूर्व उनकी संख्या कनाडा में 2 लाख थी। उजाड़ने की हट ने उन्हें बर्बाद कर दिया। पीछे वहां भी समझ आई और तब से उन्हें कुछ विशेष सुविधाएं दीं और उनकी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए एक विशेष विभाग बनाया। वंश- विनाश से बचे लोगों की संख्या अब पुनः बढ़ने लगी है और दो लाख के करीब पहुंची है। अब उनकी व्यवस्थित बस्तियाँ भी वुडलैंड, आनेटोरिया ,मैकेंजी ,प्रेरीज, कोलंबिया, युकोन आदि क्षेत्र में स्थापित हो गई हैं।

अमेरिका निवासियों को भारतीय दर्शन और संस्कृति में गहरी दिलचस्पी है। यो उस देश में पूरी तरह ईसाई धर्म ही फैला हुआ है अन्य धर्मावलंबी नगण्य संख्या में है। फिर भी वहां के विज्ञ वर्ग का विश्वास है कि भारतीय और मानवता एक ही तत्व के दो नाम हैं।

भारतीय संस्कृति कभी विश्व संस्कृति रही है और भविष्य में यदि समस्त विश्व में सांस्कृतिक एकता स्थापित करने की आवश्यकता पड़े तो उस प्रयोजन की पूर्ति में भारतीय तत्व दर्शन की प्रमुख भूमिका रहेगी। उसमें वे सभी बीज मौजूद हैं, जिनके आधार पर मानवीय एकता और महानता का परिपोषण हो सके।

भूतकाल में विश्व को अनुपम अनुदान देने वाली और मानवीय उत्कर्ष में असाधारण योगदान देने वाली भारतीय संस्कृति को अमेरिका में बहुत श्रद्धा और गंभीरता से समझने का प्रयत्न किया जाता है, ताकि प्रगति और शांति के लिए भविष्य में भी उन तथ्यों का उपयोग किया जा सके।

अमेरिका के तत्वदर्शी ‘बिल ड्यूरेस’ ने भारत भूमि को अनेक दृष्टिकोण से अमेरिका की भी माता माना है। वह कहते हैं- “भारत भूमि में उत्पन्न वौद्ध धर्म ने ईसाई धर्म की नींव रखी – उनकी संस्कृति ने हमारी ईसाइयत को जन्म दिया – वहां की प्राचीन गणतंत्र प्रणाली ने अर्वाचीन प्रजातंत्र को जन्म दिया है। दर्शन और संस्कृति की दृष्टि से वह समस्त मानव जाति को बहुमूल्य प्रेरणाये प्रदान करती रही है। भारत भूमि उस देशवासियों की ही नहीं अमेरिकनो की भी माता है।”

अमेरिका के प्रख्यात दार्शनिक ‘एमर्सन’ और ‘थोरों’ पर भारतीय विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा है और उनने जो कुछ लिखा है ,उसमे भारतीय चिंतन का आभार पग-पग पर परिलक्षित होता है। एमर्सन के काव्य ‘ब्रह्मा’ को गीता और उपनिषदों का सार ही कहना चाहिए। उनका ‘दी ओवर सोल’ निबंध भारतीय चिंतन का प्रमाणिक परिचय माना जाता है।

अमेरिकी कवि ‘हिवटमैन’ के कविता ‘लीव्स ऑफ ग्रास’ को वेदांत का भाव अनुवाद कहा गया है। उस देश के महान लेखक मार्कटवेन सन 1895 में भारत- भ्रमण के लिए आए थे। लौटने पर उन्होंने अपना भ्रमण वृतांत ‘फ्लाइंग द ईक्वेयर’ नामक पुस्तक के रूप में छपाया। इसमें उन्होंने भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन की गरिमा पर गहरा प्रकाश डाला है।

अमेरिका के अर्वाचीन लेखक और कवि ‘टी. एस. इलियट ‘ की रचनाओं और कविताओं में उपनिषदों के संदर्भ भरे पड़े रहते हैं। कैलिफ़ोर्निया में ‘क्रिस्तकर इशरबुड’ ने गीता के समस्त श्लोकों का अंग्रेजी पद्दो में अनुवाद किया है। इतना ही नहीं वे भारतीय योग पद्धति से साधारण जीवन भी बिताते रहे हैं।

अंग्रेजी का एक लोकप्रिय उपन्यास ‘रेजर्स एज’ है। ‘कठोपनिषद’ के “क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्य्या” श्लोक के प्रथम शब्द ‘क्षुरश्य धारा’ पर इसका नामकरण किया गया है’ क्षुरस्य’ का अर्थ ‘रेजर’ स्पष्ट है। यह उपन्यास अमेरिका में इतना लोकप्रिय हुआ कि इसकी 30 लाख प्रतियां हाथों-हाथ बिक गई।

इसी परंपरा में ‘हर्मन मैलाविन’ और ‘एमोस ब्रॉन्सन अल्कोट’ के नाम आते हैं, जिन्होंने भारतीय दर्शन को गहराई तक समझने में अपने जीवन का अधिकांश भाग समर्पित कर दिया। महाकवि ‘वाल्ट हिवटमैन’ की ‘दी काटिलस’ पढ़ने से वे अमेरिकी नहीं वरन भक्ति भावनाओं से ओतप्रोत कोई संत प्रतीत होते हैं।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय से अब तक ”प्राच्य ग्रंथमाला” के अंतर्गत 40 से अधिक ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। इसकी पाठ्य -सामग्री में विशेषतया भारतीय धर्म -अध्यात्म तथा दर्शन का ही प्रमुख रूप से उल्लेख है। ‘येल’ की पुस्तक – “हिंदू पैथिज्म” सामान्य पाठक को संक्षेप में हिंदू धर्म की अच्छी जानकारी करा देती है।

‘राल्फ वॉल्डो एमर्शन’, ‘हेनरी डेविड थोरो’ जैसे विद्वानों ने ना केवल जनता को भारतीय दर्शन से परिचित कराया वरन स्वयं अपनी आचार -व्यवहार को भी उसी ढांचे में ढालने का सफल प्रयत्न किया। अमेरिका के संस्कृत उद्भभट विद्वान ‘मॉरिस ब्लूमफील्ड’ एवं ‘वाल्टीमोर’ ने ‘वेद चेतना’ पर एक शोधपूर्ण ग्रंथ लिखा है ,जो “हार्वर्ड ओरिएंटल सीरीज” के अंतर्गत छपा है। इसके लेखन -संपादन और प्रकाशन में 14 वर्ष लगे हैं और प्रचुर धन खर्च हुआ है। इस ग्रंथ में वेदों के महत्वपूर्ण और जटिल प्रमाणों का सरलता एवं प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुतीकरण किया गया है। यों इस विषय पर इससे पूर्व ‘वान थियोडोर वर्ग’, ‘जॉर्ज बुडलर’ आदि विद्वान कलम उठाते रहे हैं पर ”वैदिक कोंकोडंस” ने बिखरी जानकारियों को एक सूत्र में पिरो देने और जनसाधारण को वेदों की पृष्ठभूमि बता देने में अनोखी सफलता प्राप्त की है।

जर्मन विद्वान ‘मैक्स मूलर’ ने अपनी पुस्तक “द सीक्रेट बुक ऑफ ईस्ट” प्रकाशित कराई तो पश्चात जगत को भारत की महान संस्कृति एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि का पता चला। इसके बाद दूसरी पुस्तक “इंट्रोडक्शन टू द साइंस ऑफ रिलीजन” छपी उन्हीं दिनों ‘जेम्स फ्रीमैन क्लार्क’ की “टैन ग्रेट रिलीजंस” छपी इन पुस्तकों का समस्त यूरोप विशेषतया अमेरिका में जोरो का स्वागत हुआ। तब तक भारतीय दर्शन को रूढ़िवादी ,पुरातन पंथी मात्र समझा जाता था। इन पुस्तकों ने लोगों की आंखें खोल दी। क्लार्क अमेरिकी थे। उनकी पुस्तक इतनी लोकप्रीय हुई कि थोडे समय में उसके 23 संस्करण बिक गए। एडवर्ड हैल की “द एज ऑफ फेबल” एवं “ओरिएंटल रिलीजन एंड देयर रिलेशंस टू यूनिवर्सल रिलिजन” नाम की पुस्तकें छपी।

हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के संबंध में जानकारी देने वाली पुस्तक ‘दी एज ऑफ फेबल’ उस देश के ज्ञान पिपासुओ में बहुत लोकप्रिय हुई। ‘एडविन ऑनरोल्ड’ के “लाइट ऑफ एशिया” में भारत के स्वर्णिम अतीत का अच्छा वर्णन है। इस संदर्भ में अधिक अध्ययन ,अन्वेषण करने के लिए ‘अमेरिकन ओरिएंटल सोसाइटी’ एवं ‘यूनिटेरीयल सोसाइटी’ ने महत्वपूर्ण कार्य किया।

अमेरिका और भारत के प्राचीन एवं अर्वाचीन संबंधों पर प्रकाश डालने वाले ग्रंथों में से कुछ निम्नलिखित हैं –

(01) भिक्षु चमन लाल- “हिंदू अमेरिका”, (02) चेसली बैटी- ‘अमेरिका बिफोर कोलंबस’ (03) प्रो. हेमबेरटो – ‘टेन थाउजेंड ईयर्स ओल्ड सिविलाइजेशंस इन अमेरिका’ (04) स्वांटन- ‘इंडियन ट्राइब्स ऑफ नॉर्थ अमेरिका’ (05) कंपाजेट- ‘द हेरिटेज ऑफ अमेरिका’ (06) रॉव्लिंसन- ‘इंटर पीस बिटवीन इंडिया एंड दि वेस्ट’ (07) हेरिसन – ‘इंडिया एंड द यूनाइटेड स्टेट्स’ (08) ज़ी. टी. रीड -‘टू कल्चर्स मीट ऐट तारा देवी’ (09) थैकर- ‘लास्ट वर्ड ऑफ ए अमेरिकन लेडी अबाउट इंडिया’ (10) पी. एस. वर्मा — ‘हांडेड्र फिप्टीन इयर्स ऑफ इंडो अमेरिकन कोऑपरेशन इन कल्चरल फील्ड्स’ (11) “टीचिंग आफ सिक्स गुरुज इन अमेरिका” (12) “influence of Indian philosophy in western culture” (13) Emerson – “A western spiritual leader impressed was Indian philosophy” (14) जान रीड- ‘इंडियन इनफ्लुएंस ऑन यू. एस. ए.’ (15) पी .एस. बारी- “वेदांत इन यू. एस. ए.” (16) टी जवेज -‘इंडिया अमेरिका एंड वर्ल्ड ब्रदर हुड’ (17) फीचर- ‘बुक्स ऑन इंडिया’।

लेख़क – डॉ. नितिन सहारिया (भारद्वाज)
संपर्क सूत्र – 8720857296