समुद्री प्रदूषण का विषय अन्य प्रकार के प्रदूषकों वायु, जल, प्रकाश, ध्वनि आदि की तरह हमारे देश के लिये भी चिन्ताजनक हैं। भले ही इस पर गम्भीरता से ध्यान न गया हो। हमारे देश भारत की समुद्र की तटीय सीमा लगभग आठ हजार किलो मीटर की है, जिस पर सघन आबादी निवास करती है। मुम्बई, कोलकाता, गोवा, त्रिवेन्द्रम और विशाखापट्टनम जैसे महत्वपूर्ण शहर बसे हुये हैं।

गत दशकों से विश्व भर से ऐसी खबरें समाचार पत्रों में छपती रही हैं कि बड़े-बड़े देश अपने देश का कचरा जहाजों में भर कर लाते हैं और समुद्रों में बहाते चले जा रहे हैं।

सर्वमान्य तथ्य यह है कि यदि समुद्र में इसी तरह कचरा बहाया जाता रहा, तो वही समुद्री प्रदूषित जल तटीय शहरों को नुकसान दायक सिद्ध होगा, वहीं यही समुद्री प्रदूषित जल बादलों में परिवर्तित होकर दूषित तत्वों युक्त वर्षा के रूप में वापिस आयेगा। इससे न केवल आबादी प्रभावित होगी, वरन् उपज आदि भी प्रभावित होकर मनुष्यों सहित समस्त जीवों और पर्यावरण को भी नुकसान दायक सिद्ध हो सकता है।

जापान ने सन् 2011 की सुनामी के दौरान प्रशान्त महासागर में कचरे का एक बड़ा टापू देखा था। सन् 1998 में ऐसे ही कचरे के इकट्ठे होने के परिणाम स्वरूप भीषण त्रासदी भी झेलना पड़ी थी-इस प्रकार का मंतव्य विशेषज्ञों द्वारा दिया गया था। ऐसा ही एक मामला यह भी था कि कोको बंदरगाह पर इटली की एक कम्पनी 3800 टन कचरा छोड़ गयी थी।समुद्री प्रदूषण: कारण एवं निदान | Hindi Water Portal

कूड़ा-कचरा सिर्फ भूमि के लिये ही नहीं, वरन् समुद्रों के लिये भी बड़ा खतरा बनता चला जा रहा है। विश्व भर में प्रतिवर्ष लगभग 14 हजार करोड़ पाऊण्ड कूड़ा-कचरा सागरों में बहाया जाता है। यह एक बड़ी पर्यावरणीय खतरनाक स्थिति निर्मित होती चली जा रही है, जिस पर आम लोगों का ध्यान कम आकर्षित होता है।

इस कचरे की वजह से समुद्री जीवों की खाद्य- श्रृंखला बुरी तरह से प्रभावित होती जा रही है। समुद्री जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों, झाड़ियों, समुद्र के भीतर ऊगने-पनपने वाली बेल- लताओं के अस्तित्व के लिये विनाशक खतरा पनपता जा रहा है। प्लास्टिक कचरा स्वतः नष्ट नहीं होता, कीड़े एवं अन्य समुद्री जन्तु उसे खा नहीं सकते।

अतः प्रकृति चक्र उससे प्रभावित हुये बिना कैसे रह सकेगा? ग्रीन पीस संस्था द्वारा प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष दस लाख पक्षी और एक लाख स्तनधारी जीव समुद्री कचरे के कारण असमय काल का ग्रास बन रहे हैं।

यदि पर्यावरणीय संकट के बारे में विचार करें तो ज्ञात होता है कि पिछले कई दशकों की तुलना में गत कुछ वर्षों के दौरान ही विश्व ने बड़े-बड़े तूफानों को झेला है। वैज्ञानिकों एवं शोध कर्ताओं का मानना है कि समुद्र तल के तापमान में वृद्धि होना ही इसके प्रमुख कारणों में से एक है।

‘‘जियोलाजी जर्नल’’ में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के लेखक अमरीकी माईकल टूमी के अनुसार आज जिस क्षेत्र को फलारिडा के नाम से जानते हैं, वहाँ 12 हजार साल पहले शीतकाल में वर्तमान समय से अधिक संख्या में तूफान आते थे। इस शोध टीम ने फ्लारिडा के तटों से महत्वपूर्ण वस्तुओं के अवशेष एकत्रित कर गहन अध्ययन किया है। इस अध्ययन के दौरान पता चला था कि उन दिनों वहाँ लम्बा शीतकाल था, जिसे ‘‘यंगर ड्रायज’’ कहा जाता है।

इस यंगर ड्रायज की प्रारम्भिक अवस्था मध्य कनाडा में स्थित एक स्वच्छ पानी की झील के कारण देखने को मिली थी। उसका निर्माण ग्लेशियर टूटने से होना पाया गया था। वही जल स्त्रोत बहकर अटलांटिक महासागर में पहुँचा। समुद्र के पानी के बहाव की गति बिगड़ जाने के परिणाम स्वरूप उत्तरी गोलार्ध में शीतकाल आ गया।

डाॅ. टूमी ने समुद्री किनारे की तलछट के एक हिस्से ‘‘टर्बी डाईट’’ का भी अध्ययन किया, जो देखने में एक सामान्य चट्टान का हिस्सा जैसा प्रतीत होता है, लेकिन उसका निर्माण सर्दियों में एकत्रित गाद से होता है, किनारों से बहकर उसका कुछ भाग समुद्र में चला जाता है और आगे जाकर (तल में जमा हो जाता है।) ‘‘टर्वीडाईट’’ का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि उसका निर्माण भूगर्भीय हलचल या भूकम्प से होता है। जिन ‘‘टर्वी डाईट’’ पर अध्ययन किया गया है, वे ठीक वैसे ही हैं, जैसे हाल ही में आये तूफान के परिणााम स्वरूप तटों पर दृष्टिगोचर होने लगे हैं।

यह विषय आज भी रहस्य बना हुआ है, कि ‘‘यंगर ड्रायज’’ का दौर अधिक तूफान वाला क्यों रहा? क्यों शीतकाल में फ्लारिडा के तट यपर अधिक तूफान आये?

समुद्र का जल स्तर लगातार बढ़ते जाने से विश्वभर में समुद्र स्थित कई द्वीपों के अस्तित्व को ही खतरा उत्पन्न हो गया है। मारीशस, लक्षद्वीप और अंडमानद्वीप समूह ही नहीं, श्रीलंका और बाँग्लादेश जैसे छोटे-छोटे देशों के लिये भी ऐसा ही संभावित खतरा दस्तक दे चुका है। मालद्वीप में भी इसी प्रकार की आशंका बढ़ गयी है।

अनुसंधान व विश्लेषकों के माध्यम से जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे बेहद चैंका देने वाले हैं। हिन्द महासागर स्थित एक महाद्वीप के जलमग्न हो जाना भी उसी के अंतर्गत है। यह भारत और मेडागास्कर के बीच स्थित है। इस जलमग्न महाद्वीप की खोज दक्षिण आफ्रिका के विट्स वाट्सरैंड विश्वविद्यालय के लुईस आश्वाल और उनके सहयोगियों ने की है।

ऐसे महाद्वीप की उपस्थिति का पहला संकेत इस तथ्य से प्राप्त हुआ था कि हिन्द महासागर के कुछ हिस्सों में गुरूत्वाकर्षण असामान्य रूप से अधिक महसूस हो रहा था। तात्पर्य यह कि इस क्षेत्र में भूपर्पटी कुछ ज्यादा ही मोटी है। इसकी व्याख्या के लिये एक परिकल्पना की गयी थी कि इस स्थल पर कोई विशाल भूखंड समुद के अंदर स्थित है।

इस कल्पना को आधार बनाकर मि. आश्वाल ने सन् 2013 में इस अनुमान को प्रत्यक्ष किया था कि संभवतः मारिशस एक जलमग्न महाद्वीप के ऊपर स्थित माना जाता है, किन्तु इसके तटों पर उपलब्ध जिरकान क्रिस्टल की आयु दो अरब साल माना गयी है। ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि यहाँ ज्वाला मुखियों के विस्फोट के कारण प्राचीन महाद्वीप के टुकड़े इस भूमि तक पहुँच गये होंगे। यहाँ जिरकान क्रिस्टाल के प्राचीन नमूने मिलने का यही कारण मान लिया गया प्रतीत होता है।

इस जलमग्न महाद्वीप को शोधकर्ता आश्वाल की टीम ने मारिशिया नाम दिया है। इनका मानना है कि करीब साढ़े आठ करोड़ वर्ष पूर्व तक मारिशिया एक छोटा सा महाद्वीप रहा होगा। ऐसी संभावना व्यक्त की जाती है कि उस समय भारत और मैडागास्कर एक दूसरे के ज्यादा समीप रहे होंगे।

कालान्तर में इनकी दूरी बढ़ती चली गयी और मारिशिया भूखंड पर तनाव पैदा हुआ, जिसकी वजह से वह बिखरने लगा। यही टुकड़े हिन्दमहासागर की गहराई में स्थित हैं, वे ही असामान्य गुरूत्वाकर्षण पैदा कर रहे हैं। इस क्षेत्र में जलमग्न महाद्वीप के और भी अवशेष प्राप्त हुये हैं।

यही तथ्य इसके प्रमाण हैं कि हिन्द महासागर के कई अन्य द्वीप भी मारिशिया के अवशेषों पर टिके हुये हैं। इनमें कार्गाडेस, केगजोश, लक्षद्वीप और चागोस द्वीप शामिल हैं। इसके अलावा और कई अन्य स्थानों पर अन्य महाद्वीपों के होने की संभावना बढ़ गयी है।

उदाहरण के तौर पर हाल ही में आस्ट्रेलिया के पश्चिम की ओर समुद्र में और आईसलैण्ड के नीचे भी ऐसे अवशेष मिले हैं। वास्तव में यह माना जा सकता है कि पृथ्वी की हलचल कभी रूकी ही नहीं बल्कि सतत् परिवर्तनशील और उथल-पुथल पूर्ण रही है।

ग्लेशियर हिमखंड- ग्रीन हाऊस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से तापमान में जो क्रमशः वृद्धि होती जा रही है, उसी का यह परिणाम है मौजूद बर्फ का पिघलकर जल के रूप में परिवर्तित होना, जिसके कारण समुद्रों के जल स्तर में वृद्धि हो रही है। अंटार्कटिका में भी बड़ा आईसवर्ग टूटकर अलग हो चुका है। इस हिमखंड के पिघलने से विश्व के कई समुद्रतटीय क्षेत्रों में स्थित आशंकायें बढ़ रहीं हैं। उक्त टूटकर अलग हुये अंटार्कटिका के हिमखंड का वजन खरबों टन से अधिक होना आँका गया है तथा उसका आकार 5080 वर्ग किलोमीटर है। यह भारत की राजधानी दिल्ली के आकार से भी चार गुना बड़ा है तथा न्यूयार्क शहर से सात गुना बड़ा है। इस हिमखंड से भारत के ही 7500 किलोमीटर समुद्री तट को भारी क्षति पहुँचने का अंदेशा है।

भारत के ही उत्तराखंड में सन् 2013 में प्राकृतिक आपदाओं ने जिस प्रकार की दस्तक दी थी, तथा बादल फटने जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनायें घटीं थीं, उससे तो आशंकाओं का दौर और भी सघन हुआ है। हिमालय क्षेत्र के लगभग 50 हिमनद, झीलें आगामी कुछ वर्षों में अपने किनारों की सीमा लाँघकर अनेकानेक मैदानी क्षेत्रों को जलमग्न कर करोड़ों लोगों के जीवन को खतरे में डाल सकते हैं। गत सन् 2016 में भी बड़ी तादाद में बादल फटने की घटनायें सामने आ चुकी हैं। टिहरी जिले में भी खतलिंग हिमखंड की दरारें चैड़ी हो चुकी हैं। इन दरारों का दायरा थोड़ा बहुत नहीं चार किलोमीटर तक विस्तार ले चुका है।

समुद्री जंगलों को खतरा- ग्लोबल वार्मिंग, तापमान के बढ़ने से महासागर गर्म हो रहे हैं। समुद्रों में स्थित केल्प के जंगल क्रमशः समाप्त होते जा रहे हैं। इस परिवर्तन के परिणाम स्वरूप भूमध्यसागरीय पौध-प्रजातियों में लगभग 60 प्रतिशत की कमी आ गयी है। जापान जैसे देशों की फिशरी को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

मेसा चुसेट्रस बोस्टन के जेरेट विश्वविद्यालय द्वारा किये गये एक अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण क्रमशः वनस्पतियों के नष्ट हो जाने व विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया बढ़ी है, जलीय जीवों को उनका भोजन मिलना निरन्तर कम होता चला जा रहा है। इसके साथ-साथ ऐसी कतिपय चीजों को भी हम खोते चले जा रहे हैं, जो कि समुद्री किनारों की सुरक्षा के लिये आवश्यक तत्व बने हुये थे। इन सबका संबंध किसी न किसी रूप में मानव जीवन से भी है।

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उल्लेखनीय है कि केल्प उष्णकटिबंध वातावरण में पनपने वाली मछलियों को अच्छा भोजन प्रदान करने का काम करते हैं। जिस प्रकार की खरपतवार की प्रजातियाँ तेजी से बढ़ रहीं हैं, उनसे केल्प वनों की छोटी, नरम, संकुचित और झाड़ीदार पौध को, यह खरपतवार विनष्ट कर रही है। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि मछलियों को उनका भोजन मिलना बंद हो जायेगा।

क्लाईमेट चेंज का दुष्प्रभाव दुनिया के हर हिस्से को प्रभावित कर रहा है, वह समुद्र के अन्दर स्थित केल्प जैसे कई विशाल जंगल हैं, जिन्हें ‘‘केल्पफारेस्ट’’ की संज्ञा दी गयी है। इनका क्षेत्रफल 580 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है। इनमें असंख्य मछलियाँ और अन्य जलीय प्राणियों को आश्रय व भोजन उपलब्ध होता है। ये तटीय आबादी की अर्थव्यवस्था के लिये पोषक एवं आवश्यक हैं। इनसे पर्यटन और मत्स्य उद्योग को करोड़ों डालर का व्यापार मिलता है।

केलीफोर्निया विश्व विद्यालय, डेबिस की बोदेगा मदीन प्रयोगशाला के एक अनुसंधान के मुताबिक उत्तरी केलिफोर्निया से ओरेगन सीमा तक के पैसिफिक तट पर केल्प वनों को सबसे ज्यादा क्षति पहुँची है।

लेखक:- डाॅ. किशन कछवाहा
सम्पर्क सुत्र:- 9424744170