हिन्दुत्व के प्रति बढ़ता निम्न स्तरीय दुराग्रह

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अल्पसंख्यकअंग्रेजों द्वारा भारत में अलगाव की भावना पैदा करने की बुरी नीयत को लेकर गढ़ा गया शब्द है। संविधान के अनुच्छेद 29-30 में इस शब्द का उल्लेख तो आया है, लेकिन इसे परिभाषित नहीं किया गया। संविधान में दो शब्द मिले जुले हैं सम और विधान जिनका स्पष्ट अर्थ यही है कि समान विधान जबकि अंग्रेजी शब्द (ब्वदेजपजनजपवद) कांस्टिट्यूशनका अर्थ है ‘‘विधान’’ इसी प्रकार अंग्रेजी भाषा में धर्मका कोई समान अर्थ व्यक्त करने वाला शब्द उनके शब्दकोष में नही मिलता।

‘धर्म’ की बराबरी के लिये (त्मसपहपवद) रिलीजन शब्द का उपयोग किया जाता है।  संविधान का समानार्थी शब्द ‘कांस्टिट्यूशन’ और ‘धर्म’ का वास्तविक आशय् ‘रिलीजन’ से न होने के कारण अलग-अलग मनचाहा अर्थ लगाकर दुरूपयोग किया जाता है, इतना ही नहीं आम लोगों को भ्रमित भी किया गया है।

संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 14,15,16 में सुस्पष्ट कर दिया है कि भारतीय एक समान हैं और सबको कानून का समान संरक्षण प्राप्त है। उनके साथ जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और जन्म स्थान के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जायेगा। इसी प्रकार अनुच्छेद 16 नौकरियों में समान अवसर की गारंटी देता है।

अब समय आ गया है कि इन दोनों शब्दों को शब्दकोषों से हटा दिया जाना चाहिये। अनुच्छेद 30 (1) में अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थान का निर्माण करने और संचालित करने का अधिकार दिया गया है। अनुच्छेद 30 (2) में एक कदम आगे बढ़कर कहा गया है कि केन्द्र और राज्य सरकार शिक्षण संस्थानों को मदद देने में इस आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं बरतेंगी कि वह किसी भाषायी या धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित है। यह अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की भावना पैदा करने के उद्देश्य से प्रावधान किया गया था, न कि अल्पसंख्यकों को हिन्दुओं से अधिक अधिकार देने की मंशा से।

आजादी के 75 वर्ष बीत जाने को है, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि अल्पसंख्यक कौन है? क्या कश्मीर में मुसलमानों को अल्पसंख्यक माना जाना उचित है? उन्हें अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सारी सुविधायें उपलब्ध करायी जाती रही है, लेकिन वास्तविक अल्पसंख्यक हिन्दुओं को उन सुविधाओं से दूर रखा गया है। यही स्थिति देश के अन्य भागों लद्दाख, लक्षद्वीप, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में भी बनी हुयी है। उसमें जनगणना के आँकड़े और आबादी के आँकड़ों में आ रहे भारी अंतर को देखते हुये भारतीय सभ्यता के अस्तित्व पर मंडराता खतरा जन सांख्यकी से ही संबंधित है। 

इतने तमाम स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद मुसलमान और ईसाई सभी तरह के हथकंडे अपना कर हिन्दुओं का मतान्तरण कर रहे हैं। हिन्दुत्व धर्म नहीं जीवन पद्धति है। प्रख्यात लेखक एल्डोस हक्सली ने भी ‘हिन्दुत्व’ को ‘‘शाश्वत’’ माना है। प्रख्यात क्रांतिकारी वीर सावरकर ने भी माना है कि ‘हिन्दुत्व’ शब्द मात्र न होकर इस जमीन और उसके लोगों का इतिहास है। तथाकथित सेकुलरों ने हिन्दू को सम्प्रदाय बना दिया।

सन् 2014 में प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले डाॅ. भालचन्द्र नेमाडे ने कहा कि ‘‘हिन्दू संस्कृति’’ ही पूरे विश्व को  एक रख सकने की क्षमता रखती है। गीता के उपदेशों को जिसने पढ़ा नहीं और जो न ही उसका पालन करता है, वह भी हिन्दू है और रामायणको न मानने वाला भी हिन्दू है। यह जीवन पद्धति है।

अमरीकी विद्वान हस्टन स्मिथ (1911-2016) ने भी यही कहा था कि सारी दुनिया एक दिन हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगी और पश्चिम भी एक दिन हिन्दुत्व स्वीकार कर लेगा। हिन्दुत्व ही दुनिया में पढ़े-लिखे लोगों का होगा। प्रख्यात ब्रिटिश नाटककार एवं साहित्यकार जार्ज बर्नाड ने भी इसी आशय के विचार व्यक्त किये हैं। 

धैर्य, क्षमा, संयम, सहिष्णुता, ईमानदारी इन्द्रिय निग्रह, सत्य, दया आदि गुणों को ही धर्म का लक्षण माना गया है। सदाचरण की शिक्षा देने वाली रामायण और निष्काम कर्म की श्रेष्ठता प्रदर्शित करने वाली भगवद्गीता से सम्पूर्ण विश्व अभिभूत है। पश्चिम में जूलिया  राॅबटर्स जैसी लीडिंग एक्ट्रेस का ईसाईयत छोड़कर स्वेच्छा से हिन्दू धर्म अपना लेना एक बहुत बड़ी घटना है। जब आध्यात्मिक और धार्मिक प्रश्नों का उत्तर बाईबिल से नहीं मिल पाता, तब उसका उत्तर  उपनिषदों और हिन्दू धर्म-दर्शनमें ढूंढने वाले लोग प्रायः हिन्दूधर्म की ओर आकर्षित होते हैं।

धर्म व्यक्ति को संतोष दे, सुख दे, स्थायी समाधान दे, समानता दे-शांति दे-तभी तो वह ग्रहणीय होता है, अपनी ओर खींचता है। यही द्वंद की स्थिति ईसाईयों और मुसलमानों के बीच उत्पन्न होती जा रही है। 

इस्लाम का प्रचार करने वाले भारत सहित पूरी दुनिया को इस्लाम के अंतर्गत लाना चाहते हैं, यही उनका अंतिम मजहबी मकसद है। क्या विश्व को मुस्लिम बर्ड बनाने का ध्येय-लक्ष्य किसी भी आध्यात्मिक कर्तव्य में रखे जाने की प्रमाणिकता दे सकने में समर्थ है? क्या ऐसा किया जाना, अतीत के इतिहास के परिपेक्ष्य में मानवीय माना जा सकता है?

अब तक वेद, पुराण, रामायण आदि हिन्दुओं के पावन ग्रंथों ने अपनी मूल्यबता बिना कोई धमकी दिये बनाये रखी तब कुरान और हदीस, सुन्ना आदि को अपना महत्व बनाये रखने के लिये भीषण रक्तपात की आवश्यकता क्यों पड़ती है? इसके प्रचार-प्रसार के लिये इस्लामवादियों को जबरदस्ती छल और हिंसक वारदातें करते रहना पड़ती है। ऐसी कोशिशें दुनिया भारत के मुसलमान और इस्लाम को दायरे से बाहर रखती है। यह उल्टे इस्लाम की कमजोरी स्वतः साबित करती है। आमतौर पर जो अनुभव में आता है कि मुसलमान इस्लाम एवं कौम से मुहब्बत तो करता है, मुल्क से नहीं।

वहीं हिन्दूधारा, भारत की संस्कृति की मुख्यधारा आदिकाल से अबतक शाश्वत है। इसके अनुयायी हिन्दू की प्रकृति भी सहिष्णुता की है। भारत के हिन्दूधर्म और उसकी संस्कृति के कारण ही इस देश की पहचान विश्व में बनी हुयी है। इस जीवन पद्धति का अपना अलग महत्व है, जिसमें जीवन जीने की स्वतंत्रता है। अन्य किसी सम्प्रदाय या पंथ का वैसा प्रभाव उतना नहीं चल पाया जैसा विदेशों की भूमि पर देखा जाता है। भारत के हिन्दुओं का उसी कारण  अत्यधिक चिन्तित होना स्वाभाविक है। 

बंगलादेश और म्याँमार से आने वाले घुसपैठियों के कारण सन् 2047 तक असम सहित देश के कई भागों में भारतीयों के अल्पसंख्यक हो जाने की सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। कश्मीर के विगत हालातों का परिणाम देखने-समझने से इस समस्या की गंभीरता को आसानी से समझा जा सकता है। आज राजस्थान और केरल में, कश्मीर में हिन्दुओं की हत्यायें क्यों हो रहीं हैं?

हिन्दुत्व के प्रति नफरत फैलाने वाला दुराग्रह और  इसके साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं एवं हिन्दुओं को निशाने पर लेकर बढ़ते हमले और हिंसक घटनायें चिंता का कारण तो बनेंगी ही। इस्लामी आतंकी संगठन और उनके जिहादी प्रचारकों द्वारा लव-जिहाद, हिन्दू त्यौहारों के खिलाफ जिहाद, आदि अनेक प्रकार के जिहादों को क्रियान्वित कराने फंड उपलब्ध कराना भी शामिल है, जिसके माध्यम से अशान्ति फैलायी जाती है।

भारत का विखंडन करने जैसी दिलचस्पी रखने वाली अन्य विदेशी एजेंसियाँ और ईसाई मिशनरियों द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपनी पैठ बनाते हुये सुविधायें देकर और धन के प्रलोभन के माध्यम से मतांतरण का कृत्य भी जोरों पर है। 

ज्यों-ज्यों आबादी का असन्तुलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे उन क्षेत्रों में जहां मुस्लिम आबादी बढ़ी है वहां-वहां हिन्दू समाज असहजता महसूस कर रहा है, उन क्षेत्रों में उनका जीवन सुरक्षित नहीं रह गया है। प. बंगाल के 49 जिले इसी प्रकार के हैं।

भारत का मध्यमवर्ग अभी भी इस संभावित खतरे से अवगत नहीं है। एक सामाजिक विश्लेषक नियल फरगूशन ने सन् 2004 में ही इस बात के संकेत दे दिये थे कि यूरोप आने वाले 50 वर्षों में मुस्लिम बहुल महाद्वीप बन जायेगा। उसकी यह चेतावनी ‘‘सण्डे टाइम्स’’ में भी प्रकाशित की थी। 

भारत में विरोधी मानसिकता के लोगों को हिन्दुओं पर हो रहे हमले दिखाई नहीं देते जबकि भारत के बाहर रह रहे भारतीय मूल के लोगों ने अपने व्यवहार से संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, यूनाईटेड किंगडम और कनाडा आदि देशों में वहां के लोगों के साथ गहराई के साथ संबंध बनाते हुये भारत की अच्छी छवि बनाने में सराहनीय योगदान दिया है।

अमरीकी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों से भी पता चलता है कि वहाँ हिन्दूधर्म के मानने वालों की संख्या तुलनात्मक दृष्टि से कम हो, लेकिन आंकड़े स्वयं बयान कर रहे हैं कि हिन्दुत्व की विचारधारा पारम्परिक ईसाईयों पर भी अपना प्रभाव छोड़ रही है। वोस्टन विश्वविद्यालय के धर्म विभाग के प्राध्यापक स्टीफन ने अपने अध्ययन में पाया कि अमेरिकियों का हिन्दूधर्म के प्रति झुकाव बढ़ता जा रहा है। उन्हें 11 नवम्बर की तिथि स्मरण दिलाती रहती है, जिस तिथि को  सन् 1893 में स्वामी विवेकानंद ने हिन्दूधर्म से संपूर्ण विश्व का परिचय कराया था। 

एक ओर जब तालिबानी जिहादी कट्टरता जैसी सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है ऐसे समय में विश्वमंच पर हिन्दूधर्म के प्रति घृणा के भाव पैदा करना सिवाय हताशा के प्रदर्शन के क्या समझा जा सकता है?

ईसाई समाज में भी व्याकुलता और भय की आशंका गहराई से प्रवेश कर रही है कि उनके लिऐ भी इस्लाम एक खतरा है। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि ईसाई समाज की लड़कियों  को लवजिहादएवं नारकोटिक जिहादके माध्यम से फंसाकर मतांतरित करने और उनका जीवन बर्बाद करने का प्रयास किया जा रहा है। इस संबंध में बिशप जोसेुफ कल्लादंगत ने सार्वजनिक बयान भी जारी किया था।

सदियों से दमित हिन्दू मुगल आक्रान्ताओं द्वारा ध्वस्त किये गये हिन्दू-मान बिन्दुओं के संजोने का मार्ग प्रशस्त करने में जुट गया है। यह हिन्दू गौरव काल है। अब हिन्दूधर्म का यशोगान होना सुनिश्चित है। भले ही षड़यंत्र रचकर अराजकता फैलाने की कोशिशें हो रहीं हो, देश को साम्प्रदायिकता की आग में झौंकने वाली तमाम देश विरोधी ताकतों को अब मुंह की खाना पड़ेगी। उनके हौसले पस्त होंगे। अतीतकाल में जो कुछ भी मुगल आक्रांताओं द्वारा गलत किया गया है, उन विषमताओं को दूर किया जायेगा, जो गलत हुआ है, उसे सुधारा जायेगा। 

हमारी सनातन धर्मनिष्ठ दैनिक जीवनचर्या से लेकर तीज- त्यौहार सभी एक स्वर से यह संदेश देते हैं कि हमें नास्तिकता से ऊपर आस्तिकता की, अधर्म के ऊपर धर्म की, बुराई के ऊपर भलाई की, दुराग्रह के ऊपर सत्य के आग्रह की, दानवत्व के ऊपर देवत्व की, असत्य के ऊपर सत्य की और हिंसा के ऊपर अहिंसा पर विजय  प्राप्त करने की आकाँक्षा होना है।

लेखक:- डॉ. किशन कछवाहा
सम्पर्क सूत्र:- 9424744170