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बी एल एम अर्थात ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’. अमेरिका में जॉर्ज फ़्लोयड की मृत्यु के पश्चात, सारे विश्व में प्रचलित हुआ नाम.

आज से एक महीना पहले, अर्थात २५ मई को, अमेरिका के मिनेसोटा प्रांत के, मिनियापोलिस शहर मे, एक अश्वेत नागरिक, जॉर्ज फ़्लोयड की, श्वेत पुलिस अधिकारी, डेरेक चौविन द्वारा गर्दन दबाने से मौत हुई. भरी सड़क पर, दिन दहाड़े हुई इस घटना की रिकॉर्डिंग रास्ते के लोग कर रहे था. अमरीकी पुलिस से ऐसी बर्बरता नही करने का आग्रह कर रहे थे. जॉर्ज फ़्लोयड, घुटन से भर्राते हुए आवाज में चिल्लाने का प्रयास कर रहा था, “I can’t breath”… बाद में इस घटना के विरोध में हुए प्रदर्शनों में यही घुटन भरी आवाज, जन जन का नारा बन गई. 

अमेरिका में रंगभेद या नस्लभेद नया नहीं हैं. अमेरिका के जो मूल निवासी थे, उन्हे लगभग समाप्त कर, यूरोपियन लोगोंने, और विशेष कर अंग्रेजों ने, अमेरिका यह देश खड़ा किया. सन १६१९ मे, जब भारत में शिवाजी महाराज का जन्म होने में अभी ग्यारह वर्ष थे, जब दिल्ली की तख्त पर जहाँगीर का राज था, उसी वर्ष, अमेरिका के वर्जीनिया में दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटी. एक – वर्जीनिया के जेम्सटाउन में, पहली अँग्रेजी भाषिक असेंब्ली मीटिंग हुई, जिसने अमेरिका में लोकतंत्र की नीव डाली. और दूसरी – वर्जीनिया में ही, अफ्रीका से पहला अश्वेत गुलाम लाया गया ! 

१६४१ तक तो अमेरिका ने गुलामी प्रथा को कानूनी जामा भी पहनाया. गुलामों को अफ्रीका से लाने का यह क्रम निरंतर चलता रहा. ४ जुलाई सन १७७६ को ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका’ की विधिवत घोषणा हुई और १७८७ से गुलामों के बारे में स्थिति बदलने लगी. १८०८ में तो अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय गुलाम व्यापार को औपचारिक रूप से प्रतिबंधित किया. किन्तु उसके बाद भी चोरी छिपे यह चलताही रहा. 

इस पूरी प्रक्रिया ने गोरे अमेरिकन्स के मस्तिष्क में श्रेष्ठता और अहं का भाव भर दिया और गुलामी प्रथा समाप्त होने के पश्चात भी वे अश्वेतों के साथ गुलाम जैसा ही व्यवहार करते रहे. बाद में, जब अश्वेत अफ्रीकन संख्या में बढ़ते गए और राजनीतिक रूप से जागृत होने लगे, तो श्वेत – अश्वेत दंगे प्रारंभ हुए.

१९६५ में लॉस एंजेलिस मे, १९६७ में नेवार्क मे. १९६७ में ही डेट्राइट में बीसवी सदी का अमेरिका का सबसे भयानक दंगा हुआ. १९६८ में अश्वेतों का नेतृत्व करने वाले मार्टिन ल्यूथर किंग की हत्या हुई, और उसके कारण दंगे भड़के. फिर १९८० में लिबर्टी सिटी में दंगे हुए. १९९२ में लॉस एंजेलिस में रॉडनी किंग इस अफ्रीकी अमेरिकन की हत्या भी उसी प्रकार हुई, जैसे जॉर्ज फ़्लोयड को मारा गया. इस घटना के बाद दंगा भड़का. सिनसिनाटी शहर में ९/११ के पहले, २००१ में दंगे हुए. 

 कुल मिलाकर, अमेरिका में हर दस पंद्रह वर्षों में श्वेत – अश्वेतों के बीच दंगे भड़कते रहते हैं. वहां अफ्रीकन अमेरिकन अश्वेत १४% हैं, तो गोरे अमेरिकन ७७%. 

जॉर्ज फ़्लोयड की मृत्यु के बाद जो विरोध प्रदर्शन हुए, वो ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ अर्थात ‘बीएलएम’ के बैनर पर हुए. तो अनेकों को लगा की जॉर्ज फ़्लोयड की मृत्यु के कारण ही बीएलएम की संकल्पना सामने आई हैं. किन्तु ऐसा नहीं हैं. ‘ब्लैक लाइव मैटर’ इस अभियान की शुरुआत सात वर्ष पहले, १३ जुलाई २०१३ को हुई. यह एक विकेंद्रित विश्वव्यापी आंदोलन हैं और ज़्यादातर वामपंथी, इस आंदोलन के सूत्रधार हैं. 

विगत एक माह से अमेरिका में चल रहे बीएलएम आंदोलन की विशेषता हैं, की इसमे मुस्लिम्स बढ़ चढ कर हिस्सा ले रहे हैं. ‘मुस्लिम अमेरिकन सोसाइटी’ यह अमेरिकन मुसलमानों का अपेक्स संगठन हैं. इस संगठन ने सभी मुस्लिमों से, इस आंदोलन में पूरी ताकत के साथ शामिल होने की अपील की थी. 

सबसे मजेदार बात न्यूयार्क के ब्रुकलिन में हुई. वहां प्रदर्शन करते समय, नमाज का वक्त होने के कारण, सभी मुस्लिम प्रदर्शनकारी भरी सड़क पर, बीचोंबीच नमाज पढ़ने लगे. बाकी सारे नॉन-मुस्लिम प्रदर्शनकारियोंने उनके इर्दगिर्द घेरा बनाकर, उनको नमाज पढ़ने में मदद की. 

यह इसलिए महत्वपूर्ण हैं, कारण सन २००१ मे, ९/११ होने के पश्चात, न्यूयॉर्क की सड़कों पर ‘कुछ भी करने की’ किसी भी मुस्लिम संगठन की हिम्मत नहीं थी. अमेरिकी मुसलमानों के लिए, मुख्य प्रवाह में वापिस आने का यह एक अवसर था, जो उन्होने ने जमकर भुनाया. 

ऐसा ही, आंदोलन को हथियाने का प्रयास किया, अमेरिकन वामपंथियों ने. वहां उन्हे ‘व्हाइट लिबरल्स’ कहा जाता हैं. अमेरिका के अटर्नी जनरल बार (Barr) ने प्रकट रूप से कहा, “Peaceful protests over George Floyd ‘hijacked’ by far left extremist groups.” यह वक्तव्य, US Today इस समाचार पत्र की हेडलाइन बना.

वामपंथियों द्वारा इस आंदोलन को वैश्विक बनाने के प्रयास किए गए. इंग्लंड, फ्रांस, ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इटली, निदरलैंड आदि देशों में रंगभेद – नस्लभेद के विरोध में बीएलएम के बैनर पर बड़े बड़े प्रदर्शन अभी भी हो रहे हैं. अनेक स्थानों पर, नस्लवाद के प्रतीक के रूप चिह्नित प्रतिमाओं को विद्रुप किया गया. लंदन में जब बीएलएम ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा की, तो लंदन के महापौर सादिक़ खान ने, पार्लियामेंट सर्कल के पास बने सर विंस्टन चर्चिल और महात्मा गांधी की प्रतिमाओं को कार्ड बोर्ड से ढांक दिया. इसका जबरदस्त विरोध हुआ. इंग्लंड के गांधी प्रतिष्ठान के अध्यक्ष लॉर्ड मेघनाथ देसाई और विंस्टन चर्चिल के पोते ने इस प्रतिमा ढांकने वाली डरपोक कृति की तीव्र भर्त्सना की.

पूरी दुनिया के साथ, भारत में भी इस बीएलएम आंदोलन के माध्यम से भारत के मुसलमानों और दलितों को उकसाने का पूरा प्रयास हुआ. वामपंथियों की टोली ने इसे, उनके ‘इको सिस्टम’ के अंतर्गत, एक बड़ा उबलता विषय बनाने का प्रयत्न किया. 

इसकी शुरुआत हुई, जॉर्ज फ़्लोयड की मृत्यु के एक सप्ताह के अंदर. १ जून को The Wire में एक बड़ा आलेख छपा – ‘Why Indians don’t come out on the streets against regular police brutality ?’ 

३ जून को Scroll.in में रुचिका जोशी का एक बड़ा सा लेख छपा – In US Protests, lessons for Indians, who believe in the possibilities of collective resistance.’ इस आलेख में रुचिका जी ने CAA के विरोध में रास्ते पर उतरे प्रदर्शनकारियों की याद दिलाई हैं. वे आगे लिखती हैं – ‘There is a notable semblance in the repression facing Muslims in a Hindu majority India, with that experience by Black people in predominantly white US.’ (जैसे गोरों के बाहुल्य वाले अमेरिका में अश्वेत लोगों की अवस्था हैं, उसी प्रकार हिन्दू बहुल भारत मे, मुसलमानों की हैं.)

फिर ५ जून को फ़ॉरेन पॉलिसी डॉट कॉम में प्रकाश कुमार का लेख छपता हैं – 

‘Indians are supporting George Floyd and ignoring Police brutality in their own country.’

इसमे ये क्या लिखते हैं, यह देखना आवश्यक हैं –  

– “US protests also raise an uncomfortable question in world’s largest democracy : Why are there no mass demonstrations over the frequent cases of police brutality in India?”

– (किसी एक Common Cause नाम के NGO के सर्वे का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं -) “50% Police in India feel that Muslims are prone to community crime.”  

अब ८ जून को अरुंधति रॉय भी इस नरेटिव तयार करने के अभियान में कूद पड़ती हैं. ‘दलित कैमरा’ नाम के, विदेशों के वामपंथी सर्कल में लोकप्रिय पोर्टल को दिये हुए साक्षात्कार में वे कहती हैं –

“Indian racism towards black people is almost worst than white people’s racism.” इस पूरे साक्षात्कार में ये मोहतरमा, ‘दलित और मुस्लिमों के प्रति, हिन्दू कैसा घृणा का भाव रखते हैं’, यह बताती हैं. भारत में #DalitLivesMatter की आवश्यकता के बारे में भी बात करती हैं. मूर्तियों को विद्रुप करने के बारे में वे कहती हैं, “गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में ब्लैक अफ्रीकन के विरोध में नस्लवादी टिप्पणी की थी, इसलिए उनकी प्रतिमा (मूर्ति) को विद्रुप किया गया.” 

तुरंत ९ जून को, The Wire में दिव्या चेरियन का लंबा सा आलेख आता हैं – ‘Seeing India through Black Lives Matter Protests’. इसमे वे लिखती हैं – “There are parallels with India : The Police failure to respect constitutional and legal rights (of minorities) and ‘a national leader’, who is hostile to minorities and dissidents.’

१७ जून को The Diplomat में सुरभि सिंह के आलेख का शीर्षक हैं – ‘Black Lives Matter should be a wake-up call for India’. इसमे वे ज़ोर देकर कहती हैं, की भारत में मुस्लिमों के साथ भेदभाव हो रहा हैं. वे लिखती हैं – “Religious minorities, and Muslims in particular, became the target of slurs like ‘terrorists’, ‘jihadi’ and ‘Pakistani’. And those, who came out in support of minorities were branded as ‘anti nationals’. Attack on them, some even leading to killings, started to become a regular item in the news.”

अभी २१ जून को, The Print के हिन्दी संस्करण में, कांचा इलैया शेफर्ड का आलेख आता हैं, जो बड़े स्पष्ट शब्दों में वामपंथियों की मंशा बयान करता हैं. इस लेख का शीर्षक हैं, “भारत में जाती विरोधी आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए ‘ब्लैक लाइव मैटर’ जैसी आग चाहिए, तभी वह मुख्य विलेन से लड़ पाएगा.“

इन सब को क्रोनोलोजीकल ऑर्डर से (कालानुक्रम के अनुसार) पढ़ने पर क्या चित्र सामने आता हैं..? Wire, Scroll, Print जैसे तमाम वामपंथी प्रसार माध्यम इस देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं. भारतीय पुलिस के तथाकथित बर्बरता का विकृत चित्र सारे विश्व के सामने रखते हैं. इस कोरोना के तीन महीने की कालावधी में, भारतीय पुलिस का जो मानवीय, दयालु, और सकारात्मक चेहरा सामने आया हैं, उसे ये लोग तार तार करना चाहते हैं. बार बार, अमेरिका के अश्वेतों से, भारतीय मुसलमानों की तुलना करके, हिंदुओं को उनसे ‘ब्लैक लाइव मैटर’ की तर्ज पर घुटने टेक कर क्षमा मांगने आग्रह कर रहे हैं….

भारतीय मुसलमानों की अमेरिका के अश्वेतों से तुलना हो ही नहीं सकती. वहाँ अमेरिका में अश्वेतों ने गुलामी का जीवन जिया हैं. भारत में मुस्लिम तो सैंकड़ों वर्ष शासक थे. राजा थे. उन्होने हिंदुओं को गुलाम बना कर रखा था. हिंदुओं के धर्मस्थल ध्वस्त किए थे. उनकी माँ – बहनों को उठा लिया था. उनको बर्बरता पूर्वक मारा था. अनगिनत हत्याएँ की थी. दूरकी बात क्यों, १९७१ मे, पूर्व पाकिस्तान (आज के बंगला देश) में इन्होने ही हिंदुओं का ‘वंश संहार’ (genocide) किया था. अभी नब्बे के दशक के प्रारंभ मे, काश्मीर में इन्होने यही किया था… फिर कौन किसकी माफी मांगेगा…?

लेकिन, प्रगति के पथ पर बढ़ते हुए भारत मे, ये तमाम वामपंथी, बड़े पैमाने पर अराजकता फैलाना चाहते हैं, दंगे भड़काना चाहते हैं, अपने देश की प्यारी सी हवा में जहर घोलना चाहते हैं… 

फिर अगर कोई इन्हे देशद्रोही कहे तो…?

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