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चीनी सेना के पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।  भारत-तिब्बत सीमा पर चीन की धींगामुश्ती ना तो एक दिन का मुद्दा है, ना एक दिन में सुलझने वाला है इसलिए ड्रैगन के पीछे हटने को उसकी हार की बजाय डोकलाम-गलवान के बाद उत्तरोत्तर बढ़ती तिलमिलाहट (और आगे फिर मौके की ताक) का आकलन करते हुए देखना चाहिए।किन्तु चीन की हार न होने पर भी इस घटनाक्रम में भारत की तात्कालिक बढ़त तथा दीर्घकालिक वैश्विक उभार के स्पष्ट संकेत हैं। विश्व के तेजी से बदलते भू राजनैतिक  समीकरणों के साथ-साथ भारत के राजनीतिक नेतृत्व, सामाजिक व्यवहार, राजनीतिक रस्साकशी आदि को देखने पर यह छोटी सी घटना सूक्ष्मदर्शी, यानी ऐसे शीशे का काम कर सकती है जिसमें छोटी चीजें बड़ी और साफ दिखाई देती हैं।

भारतीय नेतृत्व की दृढ़ता, समाज की एकता

इस परिघटना में किसी की ताकत और फैलाव से प्रभावित हुए बिना न्यायसंगत बात के लिए अपने दम पर डटने वाले भारत का सांस्कृतिक स्वभाव झलकता है। लोकतांत्रिक विश्व में प्रभुसत्ता, न्यायप्रियता के लिए नेतृत्व की प्रतिबद्धता कैसी  होनी चाहिए,  यह गलवान के घटनाक्रम में भारत ने विश्वपटल पर रेखांकित कर दिया है।चीन को मिले भारतीय जवाब में देश के एकत्व तथा उसकी सामाजिक चेतना, सामूहिक शक्ति की गूंज है। भारतीय सेना द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर हैफा तक शौर्य की मिसाल रही है, आज भी उसने इसे फिर एक बार स्थापित किया है। बदलते विश्व समीकरणों के बीच भारत ने बड़े साफ तरीके से बता दिया है कि अब स्थिति वैसी नहीं है, जैसा कि चीन को भ्रम था। खासकर भारत की स्थिति न तो 1962 वाली है और न ही इसका राजनीतिक नेतृत्व वैसा है। भारत ने भी बता दिया कि अगर पीठ में छुरो भोंकोगे तो सीने पर घाव खाओगे। चीन को भी समझ में आ गया कि न तो यह 1962 है और न ही वह दुनिया का सिरमौर है।

लोकतंत्र बनाम विस्तारवाद की लंबी लड़ाई

लद्दाख की चोटियां दुर्गम हैं, किंतु प्रभुसत्ता के संरक्षण और विस्तारवाद के विरुद्ध लड़ाई सिर्फ यहां नहीं लड़ी जा रही बल्कि भारत के अतिरिक्त विश्व के भूराजनीतिक समीकरण कुछ और बीहड़ों की ओर इशारा कर रहे हैं जहां ड्रैगन का बर्ताव दस्यु सरीखा ही है।हांगकांग में सुरक्षा कानून की आड़ में लोकतंत्र और मानवाधिकारों को फौजी जूतों से कुचलना, तिब्बत  के मठों से उभरती आध्यात्मिक चेतना को रौंदते हुए एक पूरे देश को निगलना और स्वायत्त ताइवान को हड़पने के लिए बार-बार उसकी प्रभुसत्ता का अपमान और आकाशीय सीमाओं का अतिक्रमण, ये कोई छोटी घटनाएं नहीं हैं।आत्मकेंद्र्र्रित, निरंकुश, विस्तारवादी चीन एक न्यायसंगत विश्व व्यवस्था के लिए कितना खतरनाक हो सकता है, इसका अनुमान दुनिया को अब होने लगा है।

कांग्रेस को आत्मचिंतन की आवश्यकता

जब चीन की बात होती है तो हमारे सामने 1962 की सबसे बड़ी नाकामी उभरकर आती है। इस तथ्य पर किसी की लानत-मलानत नहीं, बल्कि देश के संदर्भ में बात होनी चाहिए। यह तथ्य है कि 1962 की नाकामी के जो ‘शिखर पुरुष’ हैं, उन्हें देश के शिखर पुरुष की तरह पूजने की जिद कांग्रेस की है। जब इस पर सवाल उठता है तो बजाय आत्मविश्लेषण करने के, वह देश पर नाराज होने लगती है। इसलिए देश कांग्रेस को बहुत अचरज और कभी कभी आक्रोश से देखता है। दूसरी बात, अगर इसे गहराई से समझें तो कांग्रेस अब उस उद्देश्य वाली कांग्रेस है ही नहीं जिसके लिए वह बनी थी। संदर्भ वह नहीं कि कांग्रेस की स्थापना एक अंग्रेज ए. ओ. ह्यूम ने इसलिए की ताकि इसका इस्तेमाल ब्रिटिश राज को उथल-पुथल से बचाने वाले सेफ्टी वॉल्व की तरह किया जा सके। बात उससे बाद की है, जब तिलक, गांधी जैसे नेता कांग्रेस की दशा-दिशा तय करते थे। स्वदेशी और स्वराज की बात पहले-पहल कांग्रेस ने की और तब पूरे देश में विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई थी। लेकिन वक्त के साथ-साथ कांग्रेस देश की बुनियादी चेतना से दूर होती चली गई, इसलिए वह इन मुद्दों से भी हट गई।

भारत के शत्रु किसके मित्र! लोकतंत्र के दुश्मनों से राजनीतिक दोस्ती क्यों?

वैचारिक और कार्मिक दृष्टि से फिसलती-गिरती कांग्रेस वहां जा पहुंची जहां उसकी दिलचस्पी चीन और पाकिस्तान के हितों से मेल खाने लगी। इस दिलचस्पी को भारत में बहुत जिज्ञासा से देखा गया, मगर कांग्रेस का उन देशों (पाकिस्तान-चीन) को देखने के भाव और इस देश को देखने के भाव, दोनों में बड़ा भारी अंतर है। मणिशंकर अय्यर जब पाकिस्तान जाते हैं तो भारत में तब सत्ता में रही भाजपा सरकार के बारे में पाकिस्तान से आग्रह करते हैं कि ‘इन्हें हटा दो और हमें ले आओ।’ एक देश जहां हमेशा सैन्य शासन ही प्रबल रहा, जहां लोक के तंत्र को विकसित होने से हमेशा रोका गया ताकि कुछ कुनबों के हित सधते रहें, उससे इतना अपनापन!

इनसे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का आग्रह प्रभुसत्ता को दांव पर लगाने जैसा है। यह निहायत हल्की बात है जो कोई सड़कछाप व्यक्ति भी नहीं करना चाहेगा, लेकिन कांग्रेस का विदेश मंत्री रह चुका व्यक्ति ऐसी बात करते हुए कैमरे में कैद होता है। भला हो संचार क्रांति का वर्ना तो वे परिवार की ‘कुर्बानियों’ का हवाला देकर सहानुभूति की चादर में जा छिपे होते। इसी तरह, कांग्रेस ने 7 अगस्त, 2008 को कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ चाइना से एक समझौता किया था। कांग्रेस के चरित्र को देश के शत्रुओं के साथ  मीठे बर्ताव और मिलीभगत का संकेत करते ‘समझौतों’ के आईने में भी देखना होगा। देश निश्चित ही यह जानना चाहेगा कि कहीं उसके सुर किसी खास कारण से तो नहीं बदले!

 लद्दाख या कश्मीर, देश जिस-जिस नाकामी की बात कर रहा है, कांग्रेस उसी पर नरम पड़ गई और  राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे दबाने लगी। खेल तो कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। रही चीनी सामान के बहिष्कार पर सवाल उठाने की बात तो वह उसकी बात ही नहीं कर रही। भले गांधीजी के आचार-विचार की कसमें खाने का ढोंग करने वाली कुनबा पार्टी ने बड़ी सफाई से बापू के प्रतिकार के तरीके से किनारा कर लिया हो। बापू की प्रेरणा से दुनिया पर राज करने वाले अंग्रेजी शासन के विरोध में कांग्रेस विदेशी सामान की होली जलाने के अभियान का नेतृत्व करती है लेकिन आज जब चीन के खिलाफ वैसा ही प्रतिकार होता है तो कांग्रेस किनारा कर लेती है। गलवान घाटी में भारत-चीन के बीच 15 जून को झड़प शुरू हुई और 16 जून की सुबह तक इसकी खबर नहीं आई थी। 16 से 23 जून के बीच राहुल गांधी ने 17 ट्वीट किए, कुछ को छोड़कर उनके सारे ट्वीट चीन को लेकर थे। उनकी चिंताओं के केंद्र में चीन तो था, लेकिन भारत की चिंता गौण थी।

आज दुनिया चीन की ‘वुल्फ वॉरियर डिप्लोमेसी’ की बात कर रही है। चीन, आॅस्ट्रेलिया को आंखें दिखा रहा है, ब्रिटेन पर आंखें तरेर रहा है कि पश्चिमी देशों में हांगकांग की आजादी के बारे में मत बोलो। चीन का राजदूत नेपाल में प्रोटोकॉल को दरकिनार कर राष्ट्रपति से मिल रहा है, बैठक कर रहा है। यही तो हेकड़ी दिखाने वाली नई ‘डिप्लोमेसी’ है। अब अगर कांग्रेस को देखें तो ‘वुल्फ’ की तरफ तो वह अकड़ रही थी, मगर गुर्राते समय मुंह इस ओर घुमा ले रही है। देश में कांग्रेस किसके ऊपर गुर्रा रही है? वह इस देश पर गुर्रा रही है। उसकी दोस्ती दुश्मन देशों के साथ है। दुश्मन देशों के साथ इनकी मित्रता हैरानी में डालती है, अचंभित करती है और दुख पहुंचाने के साथ सवाल भी खड़े करती है।

ये दोनों पड़ोसी देश आपस में मित्र हो सकते हैं, परंतु दोनों लोकतंत्र के शत्रु हैं। कांग्रेस इस बात को नहीं समझ रही है, लेकिन देश के लोग इसे बखूबी समझ रहे हैं। कांग्रेस लोकतंत्र से ऊपर नहीं है। भारत के पड़ोस में ये दो शत्रु देश हैं जो आतंकवाद के पोषक हैं और कांग्रेस इनके सुर में सुर मिलाती दिखाई देती है। हाल ही में प्रधानमंत्री इमरान खान ने सदन में ओसामा बिन लादेन को ‘शहीद’ कहा, जिस पर पाकिस्तान में ही बहस खड़ी हो गई।

कांग्रेस के दिग्विजय सिंह भी ओसामा बिन लादेन को ‘जी’ कहते हैं। मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को ‘हाफिज सईद साहब’ कहते हैं! वह आतंकी जिसे पाकिस्तान भी बचा रहा है और चीन भी। फिर अंतर कहां है? इसी तरह, बांग्लादेश में जो नरसंहार हुआ था, उसका प्रेरक-प्रायोजक जाकिर नाईक था, जिसने राजीव गांधी फाउंडेशन को पैसे दिए। आप इससे कैसे इनकार कर सकते हैं? आतंकवाद के मामले में लोकतंत्र को ठिकाने लगाने के काम में बुजुर्ग पार्टी के लोग कतार में खड़े नजर आते हैं। आर्थिक भ्रष्टाचार का मुद्दा देखें तो इसमें से भी कांग्रेस और चीन की कलुष कथाएं बाहर नहीं जातीं। कांग्रेस ने भी भ्रष्टाचार की कहानियां लिखीं, जो भ्रष्टाचार की राजनीति के तौर पर वहां भी दिखाई देती हैं और यहां भी।

ये कुछ बातें हैं जो बताती हैं कि जो खुद को ‘राष्ट्रीय कांग्रेस’ कहती है, उसका राष्ट्र से तो सरोकार ही नहीं। ‘राष्ट्रीय’ बोलने-लिखने भर से कुछ नहीं होता। राष्ट्र के प्रति निष्ठा, राष्ट्र के प्रति भाव की कांग्रेस में छीजन ही नहीं है, बल्कि यह उसमें से तिरोहित हो गया है। ऐसे में नेहरू का एक वाक्य याद आता है,जो उन्होंने संसद में बोला था, ‘हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए। हम एक बनावटी माहौल में रह रहे थे, जिसे हमने ही तैयार किया था।’ आज के बदले समय में कांग्रेस को नेहरू के ही कहे हुए वाक्य को दोहराने, कुछ और विस्तारित करने और समझने की जरूरत है।कांग्रेस वास्तव में जमीनी सच्चाई से दूर हो गई है। लोगों से तो दूर हो ही गई है। दुनिया में जो समीकरण बन रहे हैं, उनसे दूर हो गई है। कांग्रेस की चिंता में भारत कहीं नहीं है। वह देश की वास्तविकता और अपेक्षाओं से दूर हो गई है। दरअसल, कांग्रेस बनावटी माहौल में जी रही है, जिसे कांग्रेस ने खुद तैयार किया है।

कांग्रेस की स्थिति रेशम के उस कीड़े की तरह है, जिसे जाल बुनते समय सुरक्षा का अहसास होता है लेकिन वह उसी में फंसकर रह जाता है। कांग्रेस का पराभव होगा तो उसका कारण कोई और नहीं, खुद कांग्रेस ही होगी, क्योंकि किसी सार्वजनिक संगठन की प्राणवायु जनहित होती है, कुनबा-हित नहीं। वैसे ही, चीन में भी अगर व्यक्तिवादी आत्मकेंद्रित व्यवस्था अस्त होगी तो उसका कारण भी वह खुद ही होगी। कितना अजब किंतु कितना त्रासद साम्य है दोनों में! बहरहाल, कांग्रेस का खूंटा एक परिवार और एक नाम हो सकता है परंतु यह देश किसी कुनबे कोटरी, क्षेत्र या भाषा से नहीं बना बंधा। एकात्मकता की धुरी यहां विविधता की परिधि को और फैलने का मौका देती है। कोरोना काल में दुनिया के लिए देखने वाली बात यह है कि इस दौरान भारत सिर्फ वुहान वायरस से नहीं लड़ रहा था बल्कि क्षुद्र्र राजनीति को उसकी जगह पर सीमित करते हुए दुनिया को लोकतंत्र, मानवीयता  और संप्रभुता के संरक्षण के लिए दृढ़ रहने का पाठ पढ़ा रहा था।  हर गलत बात के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने वाले देश-समाज का उदाहरण भी प्रस्तुत कर रहा था।

 

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