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वैश्विक गणेश / 8

म्यांमार के ‘बाप्पा मोरया’…

‘मेरे पियां गए रंगून…..’ वाला रंगून, अब ‘यंगून’ हैं। ये म्यांमार की राजधानी नहीं हैं, किन्तु सबसे बड़ा शहर हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिन्द सेना’ का तीन वर्ष तक का मुख्यालय। अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर जहां दफनाया गया, वो यंगून।

गणेश चतुर्थी के दिन यदि आप यंगून के प्रसिध्द ‘गंदामार बॉल रुम’ में जाएँगे, तो वहां पर परंपरागत भारतीय पोशाख में, लेजिम खेलते हुए, ढ़ोल – नगाड़ों के बीच भारतीय समुदाय गणेश जी की स्थापना करते हुए मिलेगा। ‘टीम मोरया’ यह उत्सव बड़े शान से मनाते हैं। म्यांमार में अनेक स्थानों पर गणेश उत्सव पर्व मनाया जाता हैं।

यंगून के ही ‘३६ स्ट्रीट’ पर एक प्राचीन गणेश मंदिर हैं। इस मंदिर में भगवान गणेश की दस फीट ऊंची मूर्ति रखी गई हैं, जो न केवल यंगून के भारतियों के आस्था का विषय हैं, वरन स्थानिक बर्मी और चीनी लोग भी इसका भक्तिभाव से दर्शन लेते हैं।

अंग्रेजों ने लोकमान्य तिलक जी को छह वर्ष जहां कैद रखा था, उस मंडाले में भी भगवान गणेश का एक भव्य मंदिर हैं। म्यांमार के अन्य शहरों और गावों में भी गणेश मंदिर हैं। अधिकतर हिन्दू मंदिरों में गणेश जी की मूर्ति स्थापित हैं।

म्यांमार, अर्थात पहले का ‘ब्रम्हदेश’, जिसे अंग्रेजों ने ‘बर्मा’ बना दिया। किसी जमाने में यह वैभवशाली हिन्दू राज्य था। उत्तर भारत के ‘वैशाली’ और दक्षिण भारत के ‘पल्लव’ शासकों की प्रेरणा से यहां हिन्दू संस्कृति फली – फुली थी।

तेरहवी शताब्दी में मंगोल आक्रांता कुबलई खान ने यहां के अनेक हिन्दू प्रतीक चिन्ह ध्वस्त किए थे। किन्तु उसके बाद महाराज नौनंग ने एक समृध्द साम्राज्य स्थापित किया।

आज भी हिन्दू संस्कृति के अवशेष, संपूर्ण म्यांमार में बिखरे पड़े हैं। साढ़े पांच करोड़ के इस देश में लगभग २९ लाख हिन्दू रहते हैं। यहां गोरखा समुदाय बड़ी संख्या में हैं।

पूरे म्यांमार में गोरखाओं के ही ढाईसौ से ज्यादा मंदिर हैं। श्री गणेश की आराधना बौध्द धर्मीय भी करते हैं। इसलिए म्यांमार में स्थानीय बर्मी भी बड़ी संख्या में गणेश जी की पूजा करते दिखाई देते हैं।

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