नागरिकता विधेयक का विरोध क्यों?

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पड़ौसी देशों में धार्मिक हिंसा के शिकार होने वाले गैर मुस्लिम नागरिकों को भारत की नागरिकता देने वाले नागरिकता विधयेक से बाहर करने वाले पर वोट बैंक की स्वार्थी राजनीति करने वाले राजनीतिक दल इसके विरोध में आते जा रहे हैं। कांग्रेस ने खुले रुप में इसका विरोध कर रही है, वहीं दूसरी ओर नागरिकता विधेयक को लेकर बहुत बड़े भ्रम की स्थिति भी निर्मित करने का खेल भी चल रहा है। कांग्रेस और नागरिकता विधेयक का विरोध करने वाले अन्य दल इसे अल्पसंख्यकों के विरोध में मानकर प्रचारित कर रहे हैं, जबकि इस विधेयक का उद्देश्य ऐसा कतई नहीं है। नागरिकता विधेयक का एक ही उद्देश्य है कि विदेशों से आने वाले प्रताडि़त गैर मुस्लिमों को भारत की नागरिकता प्रदान की जाए। यहां बहुत ही उपयुक्त सवाल यह भी आता है कि बाहर के जिन देशों में हिन्दू समुदाय निवास कर रहा है, वह वहां के समाज और सरकार की उपेक्षा का शिकार हो रहा है, इसलिए वह भारत की ओर आशान्वित दृष्टि से देखता है।
यहां उल्लेखनीय बात यह भी है कि हिन्दुओं के लिए पूरे विश्व में एक भारत ही देश है, जहां उसे शरण मिल सकती है, जबकि मुसलमानों के कई देश हैं, वह वहां भी जा सकते हैं, लेकिन विश्व का कोई भी मुस्लिम देश इन्हें अपने यहां रखने को तैयार नहीं है, आखिर क्यों? यह हमारे देश के राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए।
हम यह जानते हैं कि पाकिस्तान में हिन्दुओं को मानसिक और शारीरिक प्रताडऩा दी जाती रही है। इतना ही नहीं पाकिस्तान में हिन्दू महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार भी किया जाता है। अभी कुछ दिनों पूर्व हिन्दू युवतियों से जबरन निकाह किए जाने के समाचार भी मिले थे और हिन्दू युवतियों को योजनाबद्ध रुप से मौत के घाट भी उतार दिया गया था। ऐसी घटनाओं के कारण वहां का हिन्दू समाज स्वाभाविक रुप से भारत में शरण मांगने की स्थिति में आ गया। इसका एक कारण यह भी है कि प्रताडि़त समाज को पाकिस्तान में कहीं से किसी भी प्रकार का सुरक्षा का आश्वासन नहीं मिल रहा है। इसलिए भारत आना उनकी मजबूरी ही है। इन्हीं नागरिकों का भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। विसंगति यह है कि कांग्रेस इस विधेयक का विरोध कर रही है। जो पाकिस्तान में प्रताडि़त हिन्दू समाज के साथ अन्याय ही कहा जाएगा। समझ में यह नहीं आ रहा कि कांग्रेस विदेशी मुसलमानों का पक्ष क्यों ले रही है?
यह एक बड़ा सच है कि विश्व के किसी भी देश में निवास करने वाला हिन्दू अपनी उपेक्षा के चलते भारत ही आना पसंद करेगा। इसलिए उसे शरण देने में कोई बुराई नहीं होना चाहिए, लेकिन जो घुसपैठिए भारत में अशांति फैलाने के उद्देश्य से आ रहे हैं, उनके विरोध में निश्चित रुप से कार्यवाही होना ही चाहिए। हम यह भी जानते हैं कि विदेशी घुसपैठियों के कारण भारत को बहुत बड़ा खामियाजा भी भुगतना पड़ा है। आज बहुत बड़ी संख्या में पाकिस्तानी और बांग्लादेशी नागरिक अपनी अधिकारिक भारत यात्रा पर आने के बाद अपने देश वापस ही नहीं गए। आज उनके बारे में यह भी पता नहीं है कि वे भारत में कहां पर हैं? यह सुरक्षा के हिसाब से ठीक नहीं है। सवाल यह भी आता है कि क्या भारत कोई धर्मशाला है कि कोई आकर यहां बस जाए। हर देश के अपने नियम होते हैं, वैसे ही नियम भारत में भी होने चाहिए। यही नागरिकता विधेयक का एक मात्र उद्देश्य है।
हम यह भी भली भांति जानते ही हैं कि भारत के जिन राज्यों में आतंकी सक्रिय हैं, उसका एक मुख्य कारण विदेशी घुसपैठ ही है। इसी कारण पूर्वांचल में इस विधेयक का विरोध हो रहा है। इसका विरोध भारत का मूल नागरिक नहीं कर रहा, बल्कि विदेशी नागरिक ही कर रहे हैं या फिर उनको संरक्षित करने वाले राजनीतिक दल कर रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस इस विधेयक का विरोध क्यों कर रही है? इसके पीछे कहीं वोट बैंक की मानसिकता तो नहीं? अगर ऐसा है तो कांग्रेस की यह सोच देश के भविष्य के लिए बहुत ही घातक मानी जाएगी। हम यह भी जानते हैं कि कांग्रेस ने तीन तलाक और धारा 370 को लेकर भी इसी प्रकार का विरोध किया था और आज नागरिकता विधेयक को लेकर कर रही है। कांग्रेस का तर्क यह है कि यह विधेयक भारत के मूल स्वभाव के विरुद्ध है। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने इस विधेयक पर अपने नाम के अनुसार अधीर होते हुए कहा है कि हम संसद में नागरिकता विधेयक का विरोध करेंगे, क्योंकि यह हमारे संविधान, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और संस्कृति के विरूद्ध है। अधीर रंजन जी को शायद यह नहीं पता कि भारत की संस्कृति करोड़ों वर्ष पुरानी है।
जहां तक धर्मनिरपेक्षता की बात है तो यह मात्र सत्तर वर्ष पहले उपजी एक ऐसी अवधारणा है, जिसे विदेशी आक्रांताओं ने भारत में रोपित किया। बाद में कांग्रेस ने उसे अपना लिया। संस्कृति की बात करें तो संस्कृति मात्र कुछ वर्षों में निर्मित नहीं होती, उसके लिए वर्षों की तपस्या करनी होती है, तब कहीं जाकर संस्कृति का निर्माण होता है। धर्मनिरपेक्षता हमारी संस्कृति नहीं है और न ही हो सकती है। क्योंकि हमारा देश सनातन काल से धर्म के सापेक्ष रहा है।
अभी संसद में लाए जा रहे नागरिकता संशोधन विधेयक के माध्यम से नागरिकता कानून में यह बदलाव किया जा रहा है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीडऩ के शिकार सिर्फ गैर मुस्लिम शरणार्थियों को ही भारतीय नागरिकता देने का विचार है। विधेयक के अनुसार पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीडऩ के कारण 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को अवैध शरणार्थी नहीं माना जाएगा, बल्कि उन्हें भारतीय नागरिकता दी जाएगी। इसमें गलत क्या है? कांग्रेस का कहना है कि इसमें मुसलमानों को भी शामिल किया जाए। इस विरोध के चलते कांग्रेस भारत के मुसलमानों के बारे में भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है, जबकि ऐसा नहीं है। हम जानते ही हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं को प्रताडि़त किया जा रहा है, इसलिए वे भारत आ रहे हैं, जबकि जो मुस्लिम इन देशों से आ रहे हैं, वे प्रताडि़त होकर नहीं आ रहे।
इसलिए इन विदेशी मुसलमानों को शरणार्थी कहना न्याय संगत नहीं कहा जा सकता। जबकि कांग्रेस इन्हें शरणार्थी मानकर उनका हौसला बढ़ा रही है। कांग्रेस को घुसपैठियों और शरणार्थियों का भेद पता करना चाहिए। हम जरा इस बात का अध्ययन करें कि जो विदेशी मुसलमान भारत में अवैध रुप से आए हैं, वे एक योजना के तहत ही आए हैं, जबकि हिन्दू और अन्य समुदाय मजबूरी में आए हैं और मजबूर हमेशा शरणार्थी होता है। इसलिए इन्हें शरण देने में किसी को कोई परेशानी नहीं होना चाहिए।

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