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विश्वव्यापी हिंदू संस्कृति- 24

हिंद-चीन ‘वियतनाम’ क्षेत्र को
भारत के अनुदान

भारतीय पुराण- साहित्य में सात पातालों की चर्चा मिलती है। प्राच्य विद्या- विशारदों ने इसकी संगति दक्षिण पूर्व -एशिया के सात देशों से मिलाई है, जहां समुद्र पार करके जाना पड़ता है। इन शोधकर्ताओं के अनुसार- 1- अतल- सुमात्रा, 2- वितल- बोर्नियो, 3 सुतल- जावा,  4- रसातल- सेलीविज, 5 महातल- ऑस्ट्रेलिया, 6 तालातल- न्यूगिनी, 07 पाताल -न्यूजीलैंड है। कहीं-कहीं नौ दीपों की भी चर्चा मिलती है। वर्मा और मलय को शामिल कर लेने से यह संख्या 9 हो जाती है। सिंगापुर का सिंहलद्वीप के नाम से वर्णन हुआ है। वर्मा को नाग द्वीप कहते हैं। सिंहल द्वीप की राजकुमारी ‘पद्मिनी’ की सुंदरता और उसे पाने की चेष्टा में अनेकों राजकुमारों की दौड़-धूप की किवदंतीयाँ अभी भी बहुचर्चित लोक -कथाओं में सम्मिलित हैं।

‘कौडिन्य’ का नाम सुदूर पूर्व के शासकों का एक प्रतीक ही बन गया है। भारत से जाने वाले अधिक प्रतापी राजाओं को उस क्षेत्र में कौडिन्य नाम से संबोधित किया जाने लगा। इतिहास बतलाता है कि समय-समय पर कई कौडिन्यो ने उस क्षेत्र की शासन सत्ता के सूत्र अपने हाथ में संभाले हैं। प्रथम कोडिंन्य ईसा की प्रथम शताब्दी में पहुंचा था। चौथी शताब्दी में दूसरे कौडिन्य का विवरण उपलब्ध होता है, जिसने वहां पूर्व- परंपराओं का प्रचलन रद्द करके नए स्तर पर भारतीय आचार- पद्धति की स्थापना की। इसके तीन सौ वर्ष बाद एक तीसरा कोडिंन्य भारत से पहुंचा। उसने शासन व्यवस्था को और भी अधिक परिष्कृत किया। पांचवी सदी के शासक जयवर्मा को भी ‘कौडिंय’ शब्द के साथ संबोधित किया जाता है।

तानकिन, अनाम, कोचीन -चाइना, लाओस, कंबोडिया। यह चाइना प्रायद्वीप के प्रधान देश हैं। इस प्रायद्वीप की आबादी प्राय: 4 करोड़ है। भारत माता और हिंद चीन की धरती को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार पर बड़ी और छोटी बहन कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी।

अब हिंद -चीन का नाम प्रयोग पुराना पड़ गया है। उसके स्थान पर नया नाम प्रचलित है- ‘वियतनाम’ । कम्युनिस्ट और गैर-कम्युनिस्टों के संघर्ष में इन दिनों इस देश में गृह- युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी है और उत्तरी -दक्षिणी बनाकर भारत-पाकिस्तान के जैसा विभक्त करके रख दिया है। उत्तरी साम्यवादी को रूस-चीन का समर्थन प्राप्त है और दक्षिणी गैर साम्यवादियों को अमेरिका का।

 

पहली ईस्वी में भारतीयों का शासन कंबोडिया, दक्षिण लाओस, स्याम, मलाया द्वीप समूह में स्थिर हो चुका था। इस क्षेत्र में कौडीन्य ब्राह्मण ने पदार्पण किया। उसने स्थानीय नाग-कन्या ‘सोमा’ से विवाह किया और उसके वंशजों का नाम सोमवंशी हुआ। इन लोगों ने इस सुविस्तृत क्षेत्र की शासन- व्यवस्था संभाली। दक्षिण भारत के उस क्षेत्र में भारतीय लोग बराबर जाते और बसते रहे। भारत के पल्लव- वंशी राजा अपने नाम के आगे ‘वर्मा’ उपाधि लिखा करते थे। अस्तु वही परंपरा सुदूर पुर्व के शासकों में भी चली। उस क्षेत्र के प्राचीन राजाओं में से अधिकांश वर्मा उपाधि अपने नाम के साथ लगाते रहे थे। भारत के गोपुरौं की शैली पर कंबोडिया के ‘अंकोरवाट’ और ‘वेयन’ मंदिरों का निर्माण हुआ। उस क्षेत्र में नटराज की मूर्तियों का बाहुल्य बताता है कि दक्षिण के शैवों का वहां किसी समय वर्चस्व रहा है।

सुदूर पूर्व में भारत का प्रभाव- विस्तार किस क्रम और किस आधार पर विकसित हुआ इसकी अच्छी जानकारी इन ग्रंथों में मिलती है –
1. बी. सी. छाबड़ा – “एक्सपेंशन आफ इंडोचाइना कल्चर”, 2. “हिस्ट्री आफ साउथईस्ट एशिया” , 3. वेल्स – “दी मेकिंग ऑफ इंडिया”,4 . के. ए. एन. शास्त्री- ” इंडियन इनफ्लुएंस इन फॉर ईस्ट”,  5 . जिम्पर – “दी आर्ट ऑफ इंडियन एशिया” , 6. स्टूटेरहम- “इंडियन इनफ्लुएंस इन ओल्ड वालीनीज आर्ट” , 7 . मजूमदार – “हिंदू कॉलोनीज इन फॉर ईस्ट” , 8 बैजनाथ पुरी – “दक्षिण पूर्व एशिया का सांस्कृतिक इतिहास”, 9. घोषाल – “प्रोग्रेस आफ ग्रेटर इंडियन रिसर्च” आदि ग्रंथ उपयोगी जानकारी प्रस्तुत करते हैं ।

पामतिये कि- “खामेर वास्तुकला का इतिहास” तथा वोवासलिए की- “खमेर मूर्तियां और उनका विकास” ग्रंथ भी स्वर्णद्वीप की भूतकालीन सभ्यता संस्कृति पर अच्छा प्रभाव डालते हैं और बताते हैं कि उस क्षेत्र पर भारत का कितना अधिक प्रभाव रहा। रघुनाथ सिंह की – “दक्षिण- पूर्व एशिया”और मजूमदार की “स्वर्णद्वीप” पुस्तकें भी इस संदर्भ में अच्छी जानकारी प्रस्तुत करती हैं।

हिंदी चीन क्षेत्र पर डालने वाले ‘फिनो’ के तीन निबंध बहुत ही सारगर्भित हैं – 1 . हिंद चीन में भारतीय संस्कृति का प्रादुर्भाव 2. हिंद चीन में लोकेश्वर एशियाटिक अध्ययन 3. हिंद- चीन में बौद्ध मत।
“सुदूर पूर्व पत्रिका” भाग 1 – 2 और सन 1926 की “भारतीय इतिहास पत्रिका” में इस प्रकार के और भी कई विवरण उपलब्ध हैं।
बाकोफर का “फ़ुनान पर भारतीय कला का प्रभाव” निबंध – “वृत्तर भारत” पत्रिका के भाग 2 में छपा है। उसी के भाग 10 में विश्वनाथ का – “हिंद- चीन के सामाजिक जीवन में द्रविण प्रभाव” लेख छपा है। मद्रास की “प्राच्य सभा पत्रिका” के भाग 2 में “फ़ुनान और कंबोज में भारतीय संस्कृति” पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। इसी प्रकार ‘मॉडन रिव्यू’ 1930 में श्री चटर्जी का- “कंबुज में तंत्रवाद” लेख के अंतर्गत पठनीय तथ्य प्रस्तुत किए गए थे।

तुर्की टोपी पहने हुए सैगोन के बाजार में इधर-उधर आने-जाने वालों में से बहुत से मुसलमान मालाबारी कहलाते हैं। इनके पूर्वज भारत के मालाबार प्रदेश से वहां पहुंचे थे। बाद में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेने पर भी उन्होंने अपने पूर्वजों की मातृभूमि को विस्मित नहीं किया और ‘मलावारी’ कहलाने पर अपने को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। यहां रिक्शे अधिक हैं, जिन्हें फ्रांसीसी भाषा के शब्द पुश- पुश से जाना जाता है। तांगे कम है, उनको ‘मलवार’ कहते हैं। इससे प्रतीत होता है कि किसी समय मलावारी यहां अधिक संपन्न रहे होंगे इसी आधार पर उस वाहन का नाम ‘मलाबारी’ पड़ गया। इसका निर्माण और प्रचलन भी आरंभ में इन्हीं लोगों ने किया होगा।

सैगोन में तमिल चेटिटयर संख्या में तो बहुत नहीं है, पर हैं श्रीमंती। सुब्रमण्यम भगवान को पूजते हैं। हिंदू मंदिर यहां टुटपून्जिए नहीं, वरन निर्माताओं के वैवभ की साक्षी देते हैं। सैगोन पूर्वी एशिया का पेरिस है,उसका सौंदर्य और वैभव देखते ही बनता है।
अनामी और कंबोजी नागरिकों के चेहरे भारतीयों से मिलते हैं, उनकी नस्ल आर्य हैं। वे हिंदुओं की संतान हैं।

फ्रांसीसी साम्राज्यवाद के पतन के साथ पूर्व एशिया में वियतनाम के अतिरिक्त कंबोडिया और लाओस भी स्वतंत्र हुआ। फ्रांस ने इस सारे क्षेत्र पर अपना आधिपत्य जमाया था और इसे ‘इंडोचाइना’ हिंद-चीन का नाम दिया था। पर जब फ्रांसीसी वहां से सन 1554 मे उखड़े तो उन्होंने चलते-चलते उस क्षेत्र में गृह युद्ध की आग लगा दी और उस क्षेत्र की एकता नष्ट हो गई। वहां के देश कई टुकड़ों में बट गए या छोटे-छोटे राजा तो फ्रांस के शासनकाल में थे, पर वे सभी सत्ता रहित थे। फ्रांसिसियो के हटते ही बे उभर पड़े और अलग-अलग स्वतंत्र राष्ट्र हो गए। अब वियतनाम दो हिस्सों में बट गया है। लाओस का भी बहुत बड़ा भाग कम्युनिस्ट हथियाये बैठे हैं। लाओस और वियतनाम के बीच में कंबोडिया पड़ता है। उसकी राजनैतिक स्थिति कुछ ठीक है। वहां पर मनोनीत प्रधानमंत्री हैं – राजकुमार सिंहनुक और राज्य प्रमुख हैं ,उसकी वृद्धा माता। इस प्रकार राजसत्ता का सर्वेसर्वा ‘सिन्ह्नुक’ ही है।

– डॉ नितिन सहारिया