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सुरेश जी – अक्षय उर्जा का पर्यायवाची शब्द !

सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्ष थे. मैं बाल स्वयंसेवक के रुप मे नया – नया संघ की शाखा मे जाने लगा था. स्व. रामभाऊ जी साठे हमारे विभाग प्रचारक थे. शाखा केशव कुटी (संघ कार्यालय) मे लगती थी. फिर भी प्रवास के कारण रामभाऊ जी का हमारे शाखा मे कभी-कभार ही आना होता था. उन दिनों नगर प्रचारक थे, सुरेश जी. जबलपुर, संघ की दृष्टी मे, महानगर नही था. नगर था. शाखाएं भी तुलना मे कम थी. इसलिए, सुरेश जी का हमारे ‘केशव सायं’ पर आना अनेक बार होता था. जिस दिन सुरेश जी हमारे शाखा पर रहते थे, वो दिन उर्जा से भरा होता था. कबड्डी मे ऐसा मजा आता था, जैसे जीवन मे पहली बार तबियत से कोई खेल, खेल रहे हैं. सुरेश जी यह अक्षय उर्जा के पर्यायवाची शब्द हैं.

मैने संघ जाना – समझा वो सुरेश जी से.

अत्यंत आदर्शजीवी. संघ को व्यक्तिगत जीवन मे ‘इन टोटो’ जीने वाले प्रचारक. किसी भी प्रतिकूल परिस्थिती मे भी उसी उत्साह से कार्य करने की जीवटता सुरेश जी मे हैं. सन १९७५ मे संघ पर प्रतिबंध लगा. रामभाऊ जी, सुरेश जी, मिठाईलाल जी… ये सब प्रचारक भूमिगत हो गए थे. वे बडे कठिन दिन थे. पहचान वाले भी नजरे चुराते ते. कई बार तो भोजन भी नसीब नही होता था. किंतू ऐसी विषम परिस्थिती मे सुरेश जी का कार्य, उनका बुलेटिन लिखना, उसे साईक्लोस्टाइलिंग मशीन से मुद्रित करना, उन्हे बांटने की योजना बनाना, तिलवारा घाट के संक्रांती मेले मे सत्याग्रहकी योजना करना… सब कुछ अविरल चल रहा था.

संघ बंदी के बाद प.पू. सरसंघचालक, बाळासाहेब देवरस जी का जबलपुर प्रवास, अंजूमन इस्लामिया मे लगा वह शिबीर और इन इन सब मे दिन रात लगे हुए सुरेश जी.. ऐसे प्रसंग आगे भी खूब आए. संघ शिक्षा वर्ग हो या टनटनिया पहाडी पर लगा वह शिबीर..! ‘सुरेश जी को थकान क्यूं नही आती’ यह हम लोगों को पडने वाला प्रश्न था.

सुरेश जी अभियंता हैं. इंजिनिअरिंग मे उन्होने डिप्लोमा किया हैं. बचपन से ही संघ के संपर्क मे आए और शिक्षा पूर्ण करने के बाद प्रचारक निकले. मैने एक बार उन्हे पूछा, “आप प्रचारक कैसे निकले?”
उन्होने बताया, “केशव कुटी नई – नई बनी थी. प. पू. सरसंघचालक श्री गुरुजी का प्रवास जबलपुर मे था. जाते समय, उनका सामान एंबेसेडर गाडी की डिकी मे रखते समय, डिकी मेरे सर पर लगी. श्री गुरुजी वही थे. सब देख रहे थे. तुरंत मेरे पास आएं, और मेरे सर पर, जहां लगा था, वहां हाथ रखा. कुछ अद्भुत और दैवी था उनका स्पर्श. उस स्पर्श ने मेरा जीवन बदल दिया. उसी क्षण, आजीवन संघ कार्य करने का निश्चय हो गया.”

सुरेश जी विभाग प्रचारक बने. इंजिनिअरिंग के बाद मेरा जबलपुर छूट गया था. उनसे मिलना भी कम हुआ. बाद मे वे प्रांत प्रचारक बने. मैं जबलपुर लौटा, तो वे सेवा विभाग के विभिन्न दायित्वों के कारण बाहर – बाहर ही रहते थे. उत्तर क्षेत्र के सेवा प्रमुख भी रहे. अब सुरेश जी जबलपुर मे हैं. कभी-कभार मिलना हो ही जाता हैं. उनके कार्य करनेकी जीवटता को देखते हुए मन आज भी स्तिमित होता हैं.

आज सुरेश जी पचहत्तर वर्ष के हो रहे हैं. यह पचहत्तर वर्ष, देश कार्य के लिए तिल-तिल जलने वाले आदर्श प्रचारक की जीवनगाथा हैं.

सच मे, हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमे सुरेश जी जैसे प्रचारक मिले, जिन्होने हमे बनाया..!

सुरेश जी को जन्मदिवस की अनेकानेक मंगलमय शुभकामनाएं. राष्ट्रकार्य के लिए यह दीप सतत जलता रहे, यही कामना.

लेखक – प्रशांत पोळ