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हिंदुत्व की रक्षा के लिए पूर्णाहुति : गुरु तेग बहादुर

– डॉ. आनंद सिंह राणा
“हार जीत और आपकी सोच पर प्रतिबंध है..
मन लो तो हार है, तन लो तो जीत है”
                                                                                – गुरु तेग बहादुर

ये तिलक और जनेऊ के सदस्य हैं, रहमते कादर का सदका। अरे ये दिल्ली जो अब तक बोल रही है, गुरु तेग वीरता का सदका”

“सिखों (सिखों) के नौवें गुरु तेग बहादुर सिंह का आज शहीदी दिवस है, गुरु तेगबहादुर सिंह के पिता का नाम गुरु हरगोविंद सिंह था। उनके बचपन का नाम त्यागमल था। गुरु तेग बहादुर बचपन से ही संत, विचारवान, उदार प्रकृति, निर्भीक स्वभाव के थे। वह 24 नवंबर, 1675 को शहीद हो गए थे। आइए जानते हैं देश की अस्मिता के लिए उनके बलिदान के बारे में- “झुके नहीं, बलिदान किए गए।”

गुरु तेग बहादुर औरंगजेब के सामने झुके नहीं, इसका नतीजा यह हुआ कि उनका सिर कलम करवा दिया गया। औरंगजेब ने सार्वजनिक तौर पर मुस्लिम धर्म के विरोध की बात कही थी, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से लेकर पूरी सभा में साफ मना कर दिया। गुरु तेग वीरता के बलिदान के बारे में उन्हें ‘हिंदी दीया चंद्रा’ के नाम से भी जाना जाता है। बता दें कि दिल्ली का ‘शीशंगज गुरु’ वह स्थान है जहां औरंगजेब ने लालकिले के प्राचीर पर अपना सिर कलम गांव रखा था।

गुरु तेग बहादुर की अंगजेब से जंग तब हुई जब वह शास्त्री पंडितों को मुस्लिम बनाने पर तुला हुआ था। इसका विरोध कर रहे थे, इसके लिए उन्होंने गुरु तेग ब्रेवरी की मदद ली, इसके बाद गुरु तेग ब्रेवरी ने अपनी सुरक्षा का उत्तरदायित्व अपने सिर से लिया। शिष्यों के साथ मिलकर आनंदपुर से दिल्ली के लिए चल पड़े। इतिहासकारों का मानना ​​है कि मुगल बादशाहों ने उन्हें गिरफ़्तार करवाकर तीन-चार तक कैद करके रखा और पिंजरे में बंद करके उन्हें एक महीने में सल्तनत की राजधानी दिल्ली ले आए। औरंगजेब के आगे नहीं झुके गुरु तेग बहादुर।

औरंगजेब की सभा में गुरु तेग बहादुर और उनके शिष्यों का परिचय दिया गया। जहां उन्होंने अपने शिष्यों के सिर कलम रख रखे थे लेकिन उनकी आंखों में डर का तिनका तक नहीं था। जहां उनके भाई मति दास के शव के दो टुकड़े दिए गए थे, भाई मति दास और तीसरे भाई सती दास की भी श्रद्धांजलि दी गई थी, लेकिन साकिया ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए इस्लाम धर्म को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। ज्ञातव्य है कि उनकी मृत्यु से पहले ही गुरु तेग बहादुर ने 8 जुलाई, 1675 को गुरु गोविंद सिंह को सिखों का 10वां गुरु घोषित कर दिया था।

विदित हो कि अप्रैल 1621 में मुगल सेना के विरुद्ध लोहा लेने के बाद सोलो तेग के वीरतापूर्ण साहस का नाम रखा गया। वहीं 16 अप्रैल 1664 को उन्हें सिखों के नौवें गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके जीवन का प्रथम और अंतिम उपदेश यही था कि धर्म सत्य का मार्ग और विजय का मार्ग है।

विश्व इतिहास में धर्म और मानवता के सिद्धांत, आदर्श और सिद्धांतों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है। इस दस्तावेज़ और नामकरण में कहा गया है कि हिंदू धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए महान सिख गुरुओं के त्याग और बलिदान की विरासत को सिख समाज के कतिपय भटके सिख जन धूम कर रहे हैं और धर्म परिवर्तन कर महान सिख गुरुओं की विरूपित कर सकते हैं रे, ईश्वरॲश्य सद्बुद्धि दे।

शहीदी दिवस पर शत शत नमन है।

लेखिका श्रीजानकीरमण एवं इतिहास संकलन समिति के विभागाध्यक्ष हैं।