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छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों से मुठभेड़ में 22 जवान शहीद हो गए और 31 घायल हैं। ये जवान एसटीएफ और जिला आरक्षित गार्ड (डीआरजी) के सैनिक थे। डीआरजी के एक साथ इतने जवान पहली बार हताहत हुए हैं। नक्सली जवानों से हथियार भी लूटकर ले गए।

यह बलिदान इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि एक पखवाड़े के भीतर दूसरी बार सुरक्षाबलों को निशाने पर लिया गया है। इसके पहले नारायणपुर में नक्सलियों ने सुरक्षाबलों की एक बस को बारूदी सुरंग में विस्फोट कर उड़ा दिया था। इस हमले में पांच जवान शहीद हुए थे।

लगातार हुई इन दो घटनाओं से पता चलता है कि नक्सलियों के हौसले बुलंद हैं। जबकि शांति का पैगाम देकर नक्सली अपने संगठन की ताकत बढ़ाने और हथियार इकट्ठा करने में लगे रहे। इस तथ्य की पुष्टि इन हमलों से हुई है। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि नक्सलियों की शक्ति व हमले कम हुए हैं।

नक्सली समस्या से निपटने के लिए राज्य व केंद्र सरकार दावा कर रही हैं कि विकास इस समस्या का निदान है। यदि छतीसगढ़ सरकार  के विकास संबंधी विज्ञापनों में दिए जा रहे आंकड़ों पर भरोसा करें तो छत्तीसगढ़ की तस्वीर विकास के मानदण्डों को छूती दिख रही हैं, लेकिन इस अनुपात में यह दावा बेमानी है कि समस्या पर अंकुश लग रहा है?

बल्कि अब छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य  बन गया है। बावजूद कांग्रेस के इन्हीं नक्सली क्षेत्रों से ज्यादा विधायक जीतकर आए हैं। हालांकि नक्सलियों ने कांग्रेस पर 2013 में बड़ा हमला बोलकर लगभग उसका सफाया कर दिया था। कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा ने नक्सलियों के विरुद्ध सलवा जुडूम को 2005 में खड़ा किया था।

सबसे पहले बीजापुर जिले के ही कुर्तु विकासखण्ड के आदिवासी ग्राम अंबेली के लोग नक्सलियों के खिलाफ खड़े होने लगे थे। नतीजतन नक्सलियों की महेन्द्र कर्मा से दुशमनी ठन गई। इस हमले में महेंद्र कर्मा के साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और हरिप्रसाद समेत एक दर्जन नेता मारे गए थे।

लेकिन कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में अपनी खोई शक्ति फिर से हासिल कर ली। लेकिन नक्सलियों पर पूरी तरह लगाम नहीं लग पाई। व्यवस्था बदलने के बहाने 1967 में पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर नक्सलवाड़ी ग्राम से यह खूनी आंदोलन शुरू हुआ था। तब इसे नए विचार और राजनीति का वाहक कुछ साम्यवादी नेता, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और मानवाधिकारवादियों ने माना था।

लेकिन अंततः माओवादी नक्सलवाद में बदला यह तथाकथित आंदोलन खून से इबारत लिखने का ही पर्याय बना हुआ है। जबकि इसके मूल उद्देश्यों में नौजवानों की बेकारी, बिहार में जाति तथा भूमि के सवाल पर कमजोर व निर्बलों का उत्थान, आंध्रप्रदेश और अविभाजित मध्य-प्रदेश के आदिवासियों का कल्याण तथा राजस्थान के श्रीनाथ मंदिर में आदिवासियों के प्रवेश शामिल थे।

किंतु विषमता और शोषण से जुड़ी भूमण्डलीय आर्थिक उदारवादी नीतियों को जबरन अमल में लाने की प्रक्रिया ने देश में एक बड़े लाल गलियारे का निर्माण कर दिया है, जो पशुपति नेपाल से तिरुपति आंध्र प्रदेश तक जाता है। इस पूरे क्षेत्र में माओवादी वाम चरमपंथ पसरा हुआ है।

इसने नेपाल, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश छतीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश समेत देश के पचास जिलों में फैला हुआ है। इन जिलों के ऐसे बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, जो बेशकीमती जंगलों और खनिजों से भरे हैं।

छतीसगढ़ के बैलाडीला में लौह अयस्क के उत्खनन से हुई यह शुरुआत उड़ीसा की नियमगिरी पहाड़ियों में मौजूद बॉक्साइट के खनन तक पहुंच गई है। यहां आदिवासियों की जमीनें वेदांता समूह ने अवैध हथकंडे अपनाकर जिस तरीके से छीनी थी, उसे गैरकानूनी खुद देश की सर्वोच्च न्यायालय ने ठहराया था।

इतने बड़े भू-भाग में नक्सलियों का असर इस बात का संकेत है कि उन्हें स्थानीय लोगों से लेकर राजनीतिज्ञों और पड़ोसी देशों से समर्थन मिल रहा है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और चीन माओवाद को बढ़ावा 5 देने की दृष्टि से हथियार पहुचाने की पूरी एक श्रृंखला बनाए हुए हैं।

चीन ने नेपाल को माओवाद का गढ़ ऐसे ही 5 सुनियोजित षड्यंत्र रचकर वहां के हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को ध्वस्त किया। नेपाल के पशुपति से तिरुपति तक इसी तर्ज के माओवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है। हमारी खुफिया एजेंसियां नगरों से चलने वाले हथियारों और रशद की सप्लाई चैन का भी पर्दाफाश करने में कमोबेश नाकाम रही हैं।

यदि एजेंसियां इस चैन की ही नाकेबंदी करने में कामयाब हो जाती हैं तो एक हद तक नक्सली बनाम । माओवाद पर लगाम लग सकती है ? जब किसी भी किस्म का चरमपंथ राष्ट्र-राज्य की  परिकल्पना को चुनौती बन जाए तो जरुरी हो जाता है, कि उसे नेस्तनाबूद करने के लिए जो भी कारगर उपाय उचित हों, उनका उपयोग किया जाए ?

किंतु इसे देश की आंतरिक समस्या मानते हुए न तो इसका बातचीत से हल खोजा जा रहा है और न ही समस्या की तह में जाकर इससे निपटाने की कोशिश की जा रही है? जबकि समाधान के उपाय कई स्तर पर तलाशने की जरूरत है। यहां सीआरपीएफ की तैनाती स्थाई रूप में बदल जाने के कारण पुलिस ने लगभग दूरी बना ली है।

जबकि पुलिस जरूरत है। क्योंकि अर्द्धसैनिक बल के जवान एक तो स्थानीय भूगोल से अपराचित हैं, दूसरे वे आदिवासियों की स्थानीय बोलियों और भाषाओं से भी अनजान हैं। ऐसे में कोई सूचना उन्हें टेलीफोन या मोबाइल से मिलती भी है, तो वे वास्तविक स्थिति को समझ नहीं पाते। पुलिस के ज्यादातर लोग उन्हीं जिलों से हैं, जो नक्सल प्रभावित हैं।

इसलिए वे स्थानीय भूगोल और बोली के जानकार होते हैं। हालांकि देश में तथाकथित शहरी बुद्धिजीवियों का एक तबका ऐसा भी है, जो माओवादी हिंसा को सही ठहराकर संवैधानिक लोकतंत्र को मुखर चुनौती देकर नक्सलियों का हिमायती बना हुआ है। यह न केवल उनको वैचारिक खुराक देकर उन्हें उकसाने का काम करता है, बल्कि उनके लिए धन और हथियार जुटाने के माध्यम भी खोलता है।

बावजूद इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब ये राष्ट्रघाती बुद्धिजीवी पुख्ता सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किए गए तो बौद्धिकों और वकीलों के एक गुट ने देश के सर्वोच्च न्यायलय को भी प्रभाव में लेने की कोशिश की और गिरफ्तारियों को गलत ठहराया था। माओवादी किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पसंद नहीं करते हैं। इसलिए जो भी उनके खिलाफ जाता है, उसकी बोलती बंद कर दी जाती है।

                प्रमोद भार्गव

(लेखक साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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