“World wide Hindu culture “

संस्कृति “जीवन जीने की एक पद्धति” Art of living का नाम है। जिसका विकास इस धरा पर सर्वप्रथम भारतवर्ष में हुआ, अत: वह भारतीय संस्कृति कहलायी।

श्रुति कहती है – “सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा:” आदि संस्कृति/सनातन संस्कृति का जन्म इस परम पावन धरा पर हुआ व उसने विस्व मानवता का मार्गदर्शन तब से ही करना आरंभ कर दिया जब से यंहा सृस्टि का प्रथम पुरुष जन्मा। सारे शाश्त्रीय प्रमाण यही सिद्द करते हैं कि आदि सृस्टि भारत के उत्तराखंड अर्थात व्रह्मावर्त में हुई। जिन्हे ‘आर्य’ कहा जाता है, वे पूर्णसभ्य, सन्यमी व सशक्त कोटि के मनुष्य थे, जो इस धरा पर जन्मे। अत: यह आर्यावर्त कहलाया।

‘मनु’ के वंशज होने से हम सब मनुष्य कहलाए। वही शब्द जर्मन भाषा में अपभ्रंशृ होकर ‘मेनस’ तथा अंग्रेजी भाषा में ‘मैन’ बन गया। इसी वैवस्वत मनु की कथा का अनुवाद यहूदी धर्मग्रंथों में जलप्रलय – हजरत नूह की कथा प्रकरण के रूप में बाद में आया।

बाइबिल और इस्लाम ग्रंथों में नूह की संतानों हेमेटिक और सेमेटिक से संततियों की उत्पत्ति बतलाई गई है। हेमेटिक अर्थात हिरणगर्भ यानी सूर्य कथा सेमेटिक यानी सोम- चंद्र।

सूर्यवंशी और चंद्रवंशी ही संततियां ये हैं, जिनका विवेचन हम पाश्चात्य नृतृत्वशास्त्रियों की पुस्तकों में पढ़ते हैं। किन्तु यंहा प्रतिपाद्द विषय है भारतीय संस्कृति जो मानव संस्कृति कहलायी। इसके अति प्राचीन से लेकर आज तक के रूप पर प्रतिपादन थोड़ा आगे होगा, अभी तो यह चर्चा प्रमुख है कि यह मानव संस्कृति कैसे बनी ?

भारतीय चिंतन पद्धति के अनुसार ‘मनु’ शब्द से हम सब मानव कहलाए। ‘मन’ शब्द भी मनु से बना है। मन अर्थात इच्छाशक्ति, विचारशक्ति का सामंजस्य, जिसमें हो ऐसे मनुष्य का आविर्भाव जब इस धरती पर हुआ तो मानव जाति की उत्पत्ति हुई।

इच्छाशक्ति ने “एकोस्हं बहुस्यामि” की संकल्प प्रक्रिया द्वारा सृष्टि को जन्म दिया तथा विचार शक्ति के साथ विकसित हुई विशिष्टता से अभिपूरित जीवन शैली संस्कृति कहलायी। ‘सप्तद्वीपा वसुंधरा’ में इसका जन्म भारत में हुआ। अतः यह’ भारतीय संस्कृति ‘कहलायी।

मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठापना इसका मूल उद्देश्य था अतः मानव संस्कृति बनी। चूंकि मानव में देवत्व का उदय हमारी संस्कृति का मूल उद्देश्य था। अत: यह’ देव संस्कृति ‘नाम लेकर विकसित हुई। इसके प्रणेता थे ऋषि। ऋषि वे जो चेतना के सूत्र देते हैं, अन्वेषक होते हैं तथा चेतना को काया व ब्रह्मांड रुपी प्रयोगशाला में प्रयोग करते रहते हैं। इनके नाम से यह संस्कृति ‘ऋषि संस्कृति’ कहलायी। इस संस्कृति का केंद्रीय तत्व था अध्यात्म – मानवीय संवेदना। मन की शक्ति द्वारा परिस्थितियों का निर्माण। जीवन को सामंजस्य पूर्ण विधि से सही ढंग से जीना तथा औरों के आगे बढ़ने के लिए भी पथ प्रशस्त करना, अतः यह संस्कृति’ आध्यात्मिक संस्कृति’ कहलायी।

स्थान विशेष की दृष्टि से यह सिंधुनद से लेकर सागर (कन्या कुमारी) पर्यंत विस्तृत सिंधुदेश में जन्मी -वही शब्द “हिंदू” नाम से कालांतर में बोला जाने लगा अतः यह ‘हिंदू संस्कृति’ कहलायी।
हिंदू शब्द कितना असंप्रदायिक है, यह इससे स्पष्ट होता है-

“आसिन्धो सिन्धु पर्यंता यस्य भारत भूमिका
पितृभू: पुण्य भूश्चैव स वै हिंदूरिती स्मृत:।।”

अर्थात – “जो इस सिन्धुनद से लेकर सागर पर्यंत विस्तृत भारत भूमि को अपनी पित्रभूमि और पुण्यभूमि मानता है, वह हिंदू है।”

यह सब स्पष्टीकरण इसलिए जरूरी है क्योंकि दुनिया भर की भ्रांतियां इन सब के विषय में काल के प्रवाह के साथ जोड़ दी गई हैं, जबकि मानवतावादी संस्कृति होने के कारण भारतीय संस्कृति आज की समस्याओं का न केवल समाधान है वरन उसमें अपनी वैशिस्ट्य के कारण “विश्व संस्कृति – मार्गदर्शक संस्कृति “कहे जाने की पात्रता भी है।

किसी देश काल की ‘सभ्यता’ किसी के लिए अहितकारी भी हो सकती है किंतु संस्कृति सर्वदेश, सर्वकाल में सभी के लिए सर्वथा हितकारी होती है। इस परिभाषा की दृष्टि से भारतीय संस्कृति ही इस कसौटी पर खरी सिद्ध उतरती है।

संस्कृति और सभ्यता दो अलग-अलग शब्द है। सामान्यतया सभी संस्कृति (कल्चर) शब्द का प्रयोग सभ्यता (सिविलाइजेशन) के पर्याय के रूप में करते हैं, जबकि दोनों में मौलिक अंतर है। सभ्यता वहिरंग का तत्व है तो संस्कृति आभ्यांरिक।

सभ्यता वेशभूषा, रहन-सहन,खान-पान इत्यादि पक्षों तक ही सीमित है ,जबकि संस्कृति- चिंतन से लेकर जीवन व्यवहार एवं मानवीय संवेदना से लेकर समष्टिगत एकता जैसे पक्षों को स्पर्श करती है। सभ्यता की आसानी से नकल की जा सकती है किंतु संस्कृति को अपनाना समय साध्य प्रक्रिया है।

संस्कृति व दृष्टिकोण है ,जिससे कोई समुदाय विशेष जीवन की समस्याओं पर दृष्टि विक्षेप करता है। संस्कृति उस समय विशेष का लोक प्रचलन, धर्म, वान्ग्ड्मय, चित्रकला, मूर्तिकला शाश्वत तत्व ऐसे हैं, जिससे वोध होता है अनगढ़ता को सुगढ्ता में बदलने का। यही आध्यात्म है। इतने बड़े व्यापक अर्थ के परिपेक्ष में जब चिंतन किया जाता है तो स्पष्ट समझ में आता है कि जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो इसके सार्वभौम, सर्वकालीन, सामासिक गुणो के प्रसंग में चर्चा कर रहे हैं, ना की जाति, वर्ण, आश्रम, षोडश संस्कार आदि उसके विभिन्न विभाजनो की परिधि तक सीमित रह कर।

भारतीय संस्कृति शाश्वत मूल्य Imortal values अक्षय ,अमृतत्व ,दैवी चेतना से प्रणीत Divine energy , ओत-प्रोत संस्कृति है। सृष्टि के अनादि काल से एक दैवी चेतना का दिव्य प्रवाह चला आ रहा है। इसे ही ‘सनातन’ नाम से पुकारा गया। क्योंकि दैवी चेतना (डिवाइन एनर्जी) सारस्वत है, अखंड Monolithic है ,अनंत Infinite है ,अविनाशी तत्व Immortal है। ‘ सनातन ‘ अथार्थ- जो सदा से है और सदा रहेगी। इसीलिए इसका नाम ‘ सनातन संस्कृति ‘ पड़ा। अंग्रेजी में चेतना को एनर्जी कहा जाता है और विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है की एनर्जी कभी नष्ट नहीं होती । आत्मा (चेतना ) एनर्जी ही तो है ,और भारत का अध्यात्म इसी (चेतना/आत्मा) एनर्जी का विज्ञान है। भारत का सनातन धर्म /हिंदू धर्म ‘ ब्रह्मांड का शाश्वत धर्म ‘ यानी ”The Law of Universe ” है।

भारतीय संस्कृति ‘देव संस्कृति’ कही गई है अर्थात – मनुष्य में देवत्व की भावना का संचार करने वाले, उसे देव मानव बना देने वाले सारे तत्व उसमें विद्यमान हैं। तत्वदर्शन की प्रधानता होते हुए भी वह विशुद्धत: पारलौकिक नहीं है। उसमें जीवन को स्पर्श करने वाली हर उस दिशा- धारा का समावेश है, जो जीवन निर्माण से संबंधित है।

चेतनात्मक स्तर पर व्यक्तित्व को अनगढ़ से सुगढ बनाने के लिए क्या प्रयोग व प्रयास किए जाएं, इन सबका मार्गदर्शन उसमें विद्यमान है। अतः यह अकारण नहीं कि – भारत भूमि को ”स्वर्गादपि गरीयसी” तथा यहां के निवासियों को संसार भरने ने ‘देवमानवो’ ,’भूसूर’ ,तैतीष कोटि देवताओं की संज्ञा दी थी वस्तुतः ज्ञान और विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी होने के कारण ही यह राष्ट्र ‘जगतगुरु’ – ‘विश्वगुरु’ – ‘चक्रवर्ती ‘आदि नामों से सम्मानित हुआ था।

इतिहास साक्षी है कि भारत ने किसी भी मत-संप्रदाय का दमन किए बिना अपने यहां धार्मिक एकता स्थापित की सभी मत – मतांतरों को अपने गर्भ में पलने- विकसित होने दिया, जैसे भारत ने किसी भी जाति की विशिष्टता को नष्ट किए बिना उन सभी को एक सूत्र में आबद्ध कर दिया।

भारत ने बिना किसी भाषा की गरिमा घटाएं सबको विकसित होने का अवसर देकर संस्कृत को राष्ट्रीय संस्कृति की भाषा बनाकर देश की सभी भाषागत कठिनाइयों का समाधान निकाला, विविधता में भी एकता दर्शाने वाली एक अद्भुत सामासिक संस्कृति विकसित की, वैसी ही लगभग कुछ उसी प्रकार से आज संसार के भिन्न मत- मतांतरों ,नस्लों – जातियों , विचारणाओ, भाषाओं वाले सभी रास्ट्रो के मध्य एक सांस्कृतिक क्रांति यह राष्ट्र (भारत) संपन्न करने में सक्षम है। गुस्से व तनाव से भरे विश्वमानव को शांति का संदेश देने की सामर्थ भारतीय संस्कृति में है ,जो सहिष्णु है, उदार है, मानवतावादी है तथा पूर्णत: आध्यात्मिक है।

युगऋषि ,वेदमूर्ति ,युगव्यास ,आध्यात्मिक विभूति प.श्रीराम शर्मा जी कहते हैं कि –
“अगले दिनों सारा विश्व एक कुटुंब के रूप में आबद्ध हो, यह नियति है। सृष्टा ऐसा ही चाहता है व इस पुण्य प्रयोजन के लिए देव संस्कृति के धारणकर्ताओं को आगे आने देना चाहता है। यह सूक्ष्म जगत से संचालित दैवी सत्ताओं के क्रियाकलाप हैं, जो कुछ प्रमाणों द्वारा मानव मात्र के एक सूत्र में आबद्ध होने का संकेत दे रहे हैं।

अणु-आयुधो के खिलाफ विश्वभर के राज नेताओं का एकजुट हो जाना, समष्टिगत दैवी विपत्तियों के लिए हर राष्ट्र का एक – दूसरे की सहायता के लिए आगे आना, तथा पृथ्वी के पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने के लिए विश्व मनीषा द्वारा एक साथ बैठकर हल निकालने के प्रयास यह बताते हैं कि – महर्षि अरविंद का 21वीं सदी का अतिमानस निश्चित ही धरती पर उतरने को तत्पर हो चुका है ।

नोस्ट्राडेमस ने भी विश्व -वसुधा के एक हो जाने व भारतीय संस्कृति द्वारा विश्व मानव के मार्गदर्शन की घोषणा अपने ‘दिव्य चक्षुओं से की है। मनुष्य में देवत्व का उदय व धरती पर स्वर्ग का अवतरण – मानवीय चेतना में आमूलचूल परिवर्तन तथा धरती पर अनुकूल स्वर्गोपम परिस्थितियों के विनिर्मित होने की घोषणा ‘ सतयुग की वापसी ‘ के रूप में इन्हीं दिनों आगामी 10-15 वर्षों के भीतर संपन्न होने की है। अर्थात यह सब तो निश्चित रूप से होना ही है। हम सबको तो चिर पुरातन के गौरव को विज्ञान -सम्मत व तथ्य संमत बनाते हुए उन्हें युगानुकूल ढंग से प्रस्तुत भर करना है।”

अगले दिनों ऐसा ही बहुत कुछ होने जा रहा है जो अभिनव,अद्भुत व अकल्पनीय होगा। इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

लेखक:- डॉ. नितिन सहारिया
संपर्क सूत्र:- 8720857296

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