कोरोना को अल्लाह का दंड मानने वाला तालिबान अब काफिरों की शरण में है..! !

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डॉ. जेपी सिंह

पिछले महीने तलिबान ने घोषणा की थी कि कोरोना वायरस से डरने की जरूरत नहीं है. यह वायरस अपनी अवज्ञा करने वाले लोगों को सबक सिखाने के लिए अल्लाह ने भेजा है. संकेत यह था कि यह वायरस काफिरों को ही नुकसान पहुंचाएगा. मार्च में ज्यादातर गैर-मुस्लिम देश ही इस वायरस की चपेट में आए थे, इसलिए तालिबान को यह तर्क गढ़ने में सुविधा हुई.

मार्च के महीने के अंत में जब कोरोना ने अफगानिस्तान में भी दस्तक दे दी, तो तालिबान ने अपने रुख में थोड़ा सा सुधार करते हुए कि कहा कि इससे डरने की जरूरत नहीं है. तालिबान के उस समय के रुख के अनुसार पवित्र उपदेशों के पालन, पवित्र किताब के पाठ और अपने पापों का पश्चाताप करते हुए दान देने से इसका असर कम होगा.

अब कोरोना वायरस ने दुनिया में अधिकांश देशों को अपनी चपेट में ले लिया है और अफगानिस्तान में भी सैकड़ों की संख्या में लोग इसकी चपेट में आ गए हैं तो तालिबान के हांथ-पांव फूल गए है. आतंकी संगठन ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों से राहत, स्वास्थ्य सामग्री भेजने की मांग की है और सहायता पहुंचाने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा का भी आश्वासन दिया है. हैरत की बात यह है कि हर घटनाक्रम को शरिया की नजर से देखने वाले इस संगठन ने सहायता के लिए हराम-हलाल की कोई शर्त नहीं रखी है. वह किसी भी संगठन और किसी भी व्यक्ति से सहायता लेने के लिए तैयार है.

एक कदम और आगे जाते हुए तालिबान ने सोशल-डिस्टेंसिंग के प्रति जागरूकता फैलाने का काम अपने हाथों में लिया है. इससे सम्बंधित चित्र भी जारी किए गए. हेरात में बड़ी संख्या में कारोना संक्रमित लोगों को पाए जाने के बाद तालिबान के रुख में यह बदलाव आया है. इस प्रांत पर तालिबानियों का अच्छा-खासा प्रभाव है. हेरात ईरान से सटा हुआ क्षेत्र है.

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01 अप्रैल को तालिबान की तरफ से कहा गया कि बदगीश में उसकी तरफ से नागरिकों में जागरूकता अभियान चलाया गया. इसके साथ मास्क और अन्य आवश्यक वस्तुएं भी स्थानीय लोगों में वितरित की गई. इससे पहले 30 मार्च को इस आंतकी संगठन की तरफ से कहा गया कि सारीपुल प्रांत में विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ कोरोना वायरस से लड़ने के लिए उसकी तरफ से साबुन, मास्क, पम्फलेट वितरित किया गया. तलिबान के अनुसार ऐसे जागरूकता अभियान काबुल-कांधार हाईवे पर भी संचालित किए जाएंगें.

तालिबान द्वारा इस तरह अपने रूख में बदलाव लाना अपनी मूलभूत मान्यताओं को बदलने और अपनी गलती मानने जैसा है. क्या अपने रूख में बदलाव लाकर तालिबान ने अपनी बेबसी और तर्कों के खोखलेपन को सबके सामने उजागर नहीं कर दिया है. देखने यह है कि अपनी हर बात को शरीयत के खांचे में देखने-परखने की आदत आगे किस रूप में हमारे सामने आती है.

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि महामारी के सामने नतमस्तक होने के तालिबानी उदाहरण का भारत और पाकिस्तान जैसे देशों पर क्या असर पड़ता है. कोरोना फैलने के शुरुआती दिनों में तालिबानी-तर्क को स्वीकार करने वालों की एक बड़ी संख्या भारत और पाकिस्तान में भी देखी गई थी. कई मौलवी यह तकरीर देते हुए सुने गए थे कि कोरोना केवल काफिरों के लिए है, मुसलमानों को इनसे से डरने की जरूरत नहीं है. शाहीन-बाग में भी इस तकरीर की गूंज खूब सुनाई दे रही थी.

अफगानिस्तान में तालिबान ने तो अपने तर्कों से छुट्टी पा ली, उसके तर्कों को भारत में बढ़ाने वालों ने मौन ओढ़ लिया है. नुकसान तो उनका हुआ, जिन्होंने उनकी बात पर विश्वास कर लापरवाही बरती, संक्रमित हुए और अब जीवन-मरण का प्रश्न उनके सामन आ खड़ा हुआ है.

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लेखक, मीडिया-विश्लेषक हैं.

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