कुंभ मेले की रौनक है अखाड़ों के पेशवाई जुलूस

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श्री पंचनाम दशनाम जूना अखाड़ा का प्रयागराज जनपद में नगर प्रवेश हो गया। जूना अखाड़ा ने पूरब की ओर से प्रयागराज में प्रवेश किया। जूना अखाड़ा के संत, पूरब की दिशा से प्रयाग में प्रवेश करना शुभ मानते हैं। अब धीरे – धीरे सभी अन्य अखाड़ों का नगर प्रवेश होगा और उसके बाद पेशवाई जुलूस निकलेगा। अखाड़े पहले प्रयाग में नगर प्रवेश करते हैं और उसके कुछ दिन बाद जब मेला क्षेत्र में अखाड़ों को भूमि आवंटित हो जाती है तब पूरी सज-धज के साथ पेशवाई जुलूस निकलते हैं। अखाड़ों के पेशवाई जुलूस का आकर्षण देखते ही बनता है। इस जुलूस की साज- सज्जा, रथों पर सवार संत और दिगंबर अवस्था में नागा सन्यासियों की युद्ध कला लोगों को बरबस आकर्षित करती है। पेशवाई जुलूस के माध्यम से अखाड़े कुम्भ मेला क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। हर अखाड़े का अपना एक अलग पेशवाई जुलूस निकलता है। यह जुलूस कुम्भ मेला का सबसे पहला आकर्षण होता है। पहले के जमाने में इसे शोभा यात्रा कहा जाता था बाद में मुगलों के समय में इसे पेशवाई जुलूस कहा जाने लगा। 

इस पेशवाई जुलूस में सज- धज के साथ अखाड़ों के आचार्य महामंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर एवं नागा संन्यासी चलते हैं. पेशवाई जुलूस में हाथी,घोड़ों एवं रथ आदि पर सवार होकर संत महात्मा निकलते हैं। बैंड-बाजे के साथ यह जुलूस मेला क्षेत्र में प्रवेश करता है। पेशवाई जुलूस को देखने के लिए काफी बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं। मेले की सीमा क्षेत्र में प्रवेश करते ही कुम्भ मेला के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पेशवाई जुलूस का स्वागत करते हैं और उसके बाद पेशवाई जुलूस के साथ-साथ चलकर गंतव्य तक पहुंचाते हैं।

दरअसल मुगलों के शासन के दौरान धर्म को बचाने के लिए अखाड़ों ने धर्म युद्ध के लिए नागा संन्यासियों की फ़ौज तैयार की थी। यह परंपरा आज भी चली आ रही है। नागा संन्यासियों में आज भी युद्ध की ताकत और तलवार कला का कौशल विद्यामान है। युद्ध कला के माहिर यह नागा सन्यासी अपनी युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं। सामान्य रूप से लोगों को नागा संन्यासियों के दर्शन नहीं हो पाते हैं। यही वजह है कि लोग नागाओं की युद्ध कला और ताकत से परिचित नहीं हैं। नागा संन्यासी तलवारबाजी एवं अन्य युद्ध कला के अलावा अत्यंत साहसिक कार्यों को भी अंजाम देना जानते हैं। उनमें से कुछ साहसिक कार्य इस पेशवाई जुलूस में देखने को मिलते हैं. मसलन, कुछ नागा सन्यासी तो अपनी कमर में रस्सी बांध कर भारी ट्रक को खींच कर पेशवाई जुलूस में चलते हैं।

जूना अखाड़ा के श्री महंत एवं अखाड़ा परिषद के महामंत्री श्रीहरी गिरी बताते हैं “ पहले नगर प्रवेश होता है। उसके कुछ दिन बाद पेशवाई जुलूस के माध्यम से अखाड़े कुम्भ मेला क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। अभी प्रयागराज में अखाड़ों को भूमि का आवंटन का कार्य चल रहा है। भूमि आवंटन हो जाने के बाद अखाड़े पेशवाई जुलूस के माध्यम से कुम्भ मेला क्षेत्र में प्रवेश करेंगे। पेशवाई हो जाने के बाद अखाड़ों के बसने की प्रक्रिया शुरू होगी।

श्रीहरी गिरी बताते है कि “ पेशवाई जुलूस के निकलने का इतिहास कितना पुराना है. इसका कोई सटीक समय तो नहीं ज्ञात है मगर इस परम्परा की शुरुआत उस समय से हुई थी. जब साधू-संत कहीं जाते थे तो उस गावं के सम्पन्न एवं सम्मानित लोग साधू- संतो की अगवानी करते थे. किसी समय में ऐसा हुआ होगा कि अखाड़ों ने शोभा यात्रा आदि निकालना शुरू किया होगा और बाद में उसे पेशवाई जुलूस कहा जाने लगा होगा. उसी के बाद किसी समय से पेशवाई का स्वागत करने के लिए मेला के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक भी आने लगे. अब वर्तमान समय में यह परम्परा है कि जब हम लोगों की पेशवाई कुम्भ मेला क्षेत्र में प्रवेश करती है तब वहाँ पर कुम्भ के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्वागत करने आते हैं और फिर जुलूस के साथ चलकर अखाड़े को उसकी आवंटित की गयी भूमि तक पहुंचाते हैं.

विकास हुआ तब बढ़ गयी आधुनिकत

निर्मोही अखाड़े के श्री महंत राजेन्द्र दास बताते हैं ” उस जमाने में साधुओं की जमात मेला क्षेत्र से 40 किलोमीटर दूरी पर डेरा डाल देती थी. पहले हम लोग समूह बना करके आते थे. इसे शोभा यात्रा कहा जाता था, बाद में पेशवाई जुलूस कहा जाने लगा. उस समय आस – पास के लोग स्वागत करते थे. आधुनिक युग जब आया तब से संत – महात्मा गाड़ियों एवं रथों में सवार होकर आने लगे. पहले यह सब कुछ नहीं हुआ करता था. आज काफी विकास हो गया है. काफी सुविधाएं बढ़ गयी हैं इसलिए अब पेशवाई जुलूस काफी साज – सज्जा के साथ निकलता है. सन्यासियों के अखाड़े थोड़ा पहले अपना पेशवाई जुलूस निकालते हैं. उसके बाद बैरागियों के अखाड़े पेशवाई जुलूस निकालते हैं.

ये अखाड़े निकालेंगे पेशवाई जुलूस

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