त्याग, तप और तेज की त्रिवेणी — गुरु तेगबहादुर : श्री रामदत्त जी चक्रधर

350वें शहीदी वर्ष पर प्रेरणादायी व्याख्यान संपन्न

जबलपुर। सनातन धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान देने वाले सिखों के नौवें गुरु गुरु तेगबहादुर जी के 350वें शहीदी वर्ष के उपलक्ष्य में संस्कृति थिएटर, कल्चरल स्ट्रीट, भंवरताल, जबलपुर में एक भव्य एवं प्रेरणादायी व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में नगर के विभिन्न वर्गों, व्यवसायों एवं सामाजिक संगठनों से जुड़े प्रबुद्धजन बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री रामदत्त जी चक्रधर ने अपने ओजस्वी एवं भावपूर्ण उद्बोधन में गुरु तेगबहादुर जी के अद्वितीय त्याग, तपस्या, धैर्य और अप्रतिम साहस का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी का जीवन केवल एक धार्मिक महापुरुष का जीवन नहीं था, बल्कि वह अन्याय के विरुद्ध निर्भीकता से खड़े होने और सत्य की रक्षा के लिए सर्वस्व अर्पण करने की प्रेरक गाथा है।

श्री चक्रधर जी ने बताया कि गुरु तेगबहादुर जी, गुरु हरगोविंद के सुपुत्र थे। बाल्यावस्था में उनका नाम त्यागमल था, किंतु मात्र 13 वर्ष की आयु में युद्धभूमि में असाधारण वीरता का परिचय देने पर उन्हें “तेगबहादुर” की उपाधि प्राप्त हुई। यह नाम केवल एक सम्मान नहीं,बल्कि उनके तेजस्वी व्यक्तित्व और अदम्य साहस की पहचान बन गया—तेग (तलवार) की धार जैसी प्रखरता और बहादुरी का प्रतीक।

मुख्य वक्ता ने उस ऐतिहासिक कालखंड का स्मरण कराया जब औरंगज़ेब के शासनकाल में धार्मिक असहिष्णुता और अत्याचार चरम पर थे। उन्होंने कहा कि उस समय अनेक स्थानों पर लोगों पर जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जा रहा था और समाज भय एवं असुरक्षा के वातावरण में जी रहा था। ऐसे कठिन समय में गुरु तेगबहादुर जी ने निर्भीकता के साथ अन्याय को ललकारा और स्पष्ट घोषणा की कि यदि उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए विवश किया जा सकता है, तभी अन्य किसी को बाध्य किया जा सकता है। यह घोषणा केवल एक चुनौती नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की सशक्त उद्घोषणा थी।

श्री चक्रधर जी ने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि धर्म केवल पूजा-पद्धति का विषय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आस्था की स्वतंत्रता का प्रतीक है। उनका बलिदान किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए था।

उन्होंने गुरुजी के साथियों—भाई मति दास, भाई दयाल दास और भाई सती दास—के अद्भुत साहस का भी उल्लेख किया। विपरीत परिस्थितियों और अमानवीय यातनाओं के बावजूद उन्होंने अपनी आस्था नहीं छोड़ी और अडिग रहे। श्री चक्रधर जी ने कहा कि यह बलिदान केवल सिख समाज का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के आत्मसम्मान, सहिष्णुता और धर्मनिष्ठा का अमर अध्याय है।

अपने वक्तव्य के समापन में उन्होंने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी का बलिदान भारतीय इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता, नैतिक साहस और मानवीय गरिमा की अमिट मिसाल है। उनका जीवन हमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, सत्य का साथ देने और समाज में आत्मबल जागृत करने की सतत प्रेरणा देता है।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉक्टर अमर दीप बंसल जी, विभाग संघचालक डॉ. कैलाश जी गुप्ता, प्रांत संघचालक डॉ. प्रदीप जी दुबे तथा प्रांत प्रचारक श्री ब्रजकांत जी, विशेष रूप से उपस्थित रहे। राष्ट्रगीत के साथ कार्यक्रम का गरिमामय समापन हुआ।कार्यक्रम में विभाग संघचालक डॉ. कैलाश जी गुप्ता, प्रांत संघचालक डॉ. प्रदीप जी दुबे तथा प्रांत प्रचारक श्री ब्रजकांत जी विशेष रूप से उपस्थित रहे। राष्ट्रगीत के साथ कार्यक्रम का गरिमामय समापन हुआ।

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