भारत के स्वतंत्र होने के बाद जब नई सुबह का उदय हुआ, तब सबसे बड़ी चुनौती थी – देश की 562 रियासतों को एक ध्वज, एक संविधान और एक राष्ट्र के अधीन लाना। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके कुशल सचिव वी.पी. मेनन के अथक प्रयासों से यह असंभव सा कार्य संभव हुआ। अधिकांश रियासतें भारत में विलय के लिए सहमत हो गईं, किन्तु कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद की समस्या शेष रही।
इनमें से हैदराबाद सबसे बड़ी रियासत थी। वर्तमान के महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ के बड़े हिस्से उस समय हैदराबाद राज्य में सम्मिलित थे। निज़ाम उस्मान अली ख़ान औपचारिक शासक अवश्य था, परंतु वास्तविक सत्ता कासिम रिज़वी और उसकी निजी सेना रज़ाकारों के हाथों में थी। यह संगठन भारत में विलय का घोर विरोध करता था और हैदराबाद को या तो पाकिस्तान में मिलाने या एक स्वतंत्र इस्लामी राज्य बनाने का षड्यंत्र रच रहा था।
रज़ाकारों का आतंक
20,000 से लेकर लगभग 2 लाख तक की संख्या में रज़ाकारों ने हैदराबाद की धरती पर आतंक का तांडव मचाया। निर्दोष हिंदुओं की हत्याएँ, महिलाओं के साथ घोर अत्याचार, गाँवों में लूट और जबरन धर्मांतरण—ये सब रोज़ की घटनाएँ बन गई थीं। निज़ाम इन अत्याचारों को न केवल सहन करता था, बल्कि मौन समर्थन भी देता था। 85% हिंदू जनसंख्या को नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया, पुलिस और सेना में केवल मुसलमानों को स्थान दिया गया, यहाँ तक कि विधान सभा में भी मुसलमानों को बहुमत देकर कृत्रिम प्रभुत्व स्थापित किया गया।
स्वतंत्रता संग्राम और प्रतिरोध
इस दमनकारी वातावरण में भी हैदराबाद की जनता ने हार नहीं मानी। जगह-जगह स्वतंत्रता के गीत गाए गए। वारंगल किले में 1946 को स्वयंसेवकों ने भारतीय तिरंगा फहराकर संकल्प लिया कि वे प्राण देकर भी इसकी रक्षा करेंगे। ग्रामीण किसान और युवकों ने संगठित होकर रज़ाकारों का मुकाबला किया। उदगीर और बीदर क्षेत्र में किसान समूहों ने गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। महिलाओं ने खेतों में काम करते हुए इन वीर सपूतों के गीत गाए।
सरदार पटेल का निर्णायक कदम : ऑपरेशन पोलो
कासिम रिज़वी और रज़ाकारों की हिंसा दिन-ब-दिन बढ़ती गई। अंततः सरदार पटेल ने कठोर निर्णय लिया।
13 सितंबर 1948 को ऑपरेशन पोलो नामक सैन्य कार्रवाई प्रारंभ हुई। भारतीय सेना के साहसिक अभियान ने कुछ ही दिनों में रज़ाकारों और निज़ाम की सेना को परास्त कर दिया। 17 सितंबर 1948 की संध्या को निज़ाम ने आत्मसमर्पण किया और मेजर जनरल जयंतो नाथ चौधरी ने हैदराबाद के सेनाध्यक्ष से औपचारिक आत्मसमर्पण स्वीकार किया। इस प्रकार हैदराबाद राज्य का भारत में विलय हुआ।
हैदराबाद राज्य का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
हैदराबाद राज्य का नामकरण गोलकुंडा के पाँचवें कुतुब शाही सुल्तान मोहम्मद कुली कुतुबशाह (शासनकाल 1580–1612) ने किया था। यह राज्य मूसी नदी के तट पर बसा था और समय के साथ दक्षिण भारत का एक प्रमुख राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र बन गया।
21 सितंबर 1687 को, गोलकुंडा सल्तनत का पतन हुआ और मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने इस क्षेत्र को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। औरंगज़ेब के सेनापति गाजीउद्दीन खान फिरोज़ जंग के पुत्र मीर कमरुद्दीन चिन किलिच खान को यहाँ का शासक बनाया गया। उन्होंने दावा किया कि उनका वंश इस्लाम के प्रथम खलीफा अबू बकर से जुड़ा है। इसी वंश से आगे चलकर निज़ामों का शासन आरंभ हुआ।
हैदराबाद को मुगल साम्राज्य का अंतिम अवशेष माना जाता है। इसकी भू-राजनीतिक स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि यह उत्तर में मध्य प्रांतों, पश्चिम में बॉम्बे प्रेसीडेंसी तथा पूर्व और दक्षिण में मद्रास प्रेसीडेंसी से घिरा हुआ था। राज्य लगभग 16 मिलियन की जनसंख्या, 26 करोड़ रुपये वार्षिक राजस्व और 82,000 वर्ग मील क्षेत्रफल वाला विशाल राज्य था। इसकी अपनी स्वतंत्र मुद्रा भी प्रचलित थी, जो इसकी संप्रभुता का प्रतीक मानी जाती थी।
ब्रिटिश प्रशासन ने हैदराबाद के साथ अन्य रियासतों की तुलना में सदैव अलग व्यवहार किया। इसके पीछे एक कारण था कि निज़ाम स्वयं को ब्रिटिश सरकार का विश्वसनीय सहयोगी सिद्ध करना चाहता था। उसने हैदराबाद को प्रमुख स्थान दिलाने की निरंतर आकांक्षा पाले रखी।
यद्यपि राज्य की लगभग 85% जनसंख्या हिंदू थी, उन्हें प्रशासन, पुलिस, सेना तथा अन्य प्रमुख पदों से वंचित रखा गया। ये सभी पद मुसलमानों के लिए आरक्षित थे। यहाँ तक कि निज़ाम द्वारा स्थापित 132 सदस्यीय विधान सभा में भी मुसलमानों को बहुमत देकर कृत्रिम प्रभुत्व कायम किया गया।
3 जून 1947 को जब ब्रिटिश सरकार ने भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र राष्ट्रों के गठन की योजना की घोषणा की, तो हैदराबाद के निज़ाम उस्मान अली खान, आसफ़ जाह VII ने अपनी स्वतंत्र संप्रभुता बनाए रखने का निश्चय कर लिया। उन्होंने फरमान जारी किया कि हैदराबाद भारत और पाकिस्तान – दोनों की संविधान सभाओं में कोई प्रतिनिधि नहीं भेजेगा और एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व बनाए रखेगा।
इसके लिए निज़ाम ने छतारी के नवाब के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल लॉर्ड माउंटबेटन से मिलने भेजा। इस प्रतिनिधिमंडल ने दो प्रमुख माँगें रखीं –
- बरार क्षेत्र को हैदराबाद को वापस किया जाए।
- हैदराबाद को ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के अंतर्गत एक स्वतंत्र डोमिनियन का दर्जा दिया जाए।
किन्तु, माउंटबेटन ने दोनों माँगों को अस्वीकार कर दिया। उनका स्पष्ट मत था कि बरार क्षेत्र पहले से ही केंद्रीय प्रांतों में एकीकृत हो चुका है और हैदराबाद को डोमिनियन का दर्जा महामहिम की सरकार केवल भारत अथवा पाकिस्तान के माध्यम से ही स्वीकार कर सकती है। इस प्रकार निज़ाम की स्वतंत्र संप्रभु राज्य की महत्वाकांक्षा को गहरा झटका लगा।
इन कठिन परिस्थितियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी जनता में जागरण और प्रतिरोध की भावना जगाई। तिरंगे के सम्मान में गीत गाना, झंडारोहण करना, और गाँव-गाँव में रज़ाकारों के विरुद्ध साहसिक संघर्ष करना- इन सबने लोगों में नई ऊर्जा भरी।
हैदराबाद मुक्ति दिवस हमें स्मरण कराता है कि स्वतंत्रता केवल कागज़ पर लिखे हुए दस्तावेज़ से नहीं मिलती, बल्कि इसके लिए बलिदान, साहस और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है।
17 सितंबर 1948 को भारत का नक्शा सचमुच पूर्ण हुआ और अखंड भारत के स्वप्न को साकार करने की दिशा में यह दिन एक स्वर्णिम मील का पत्थर बना।
