“औपनिवेशक मानसिकता किस कदर हावी है -कविता के बहाने वक्रोक्ति/व्यंग्योक्ति”
कविताओं का जीवन, व्यक्तित्व और संस्कृति निर्माण में महती योगदान होता है, परन्तु क्या कविताओं से साहित्य और संस्कृति को विरुपित किया जा सकता है? उत्तर है-हाँ-और इसकी शुरुआत बाल साहित्य से ही होती है!!
अब देखिए न ईसाई मिशनरियों की औपनिवेशिक मानसिकता की कविता कितने षड़यंत्र से केन्या में सिखाई जाती थी अमेरिकी प्रोफेसर फ्रैंसेलिया बटलर ने 1989 की अपनी पुस्तक में बताया कि यह कविता 1980 के दशक में केन्या में सुनाई जाती थी। यह 20वीं सदी की शुरुआत की पुरानी कविता मानी जाती है, जो भारत और अन्य देशों में लोकप्रिय कराई गई। परिणाम यह हुआ कि इन देशों की बाल कविताएं विस्मृति के गर्भ में समा गयीं।
“जाॅनी जाॅनी यस पापा” नर्सरी कक्षा से ही सिखा रही है कि जाॅनी ने चोरी से शक्कर (मिठाई) खा ली है और पिता पूंछ रहा कि जाॅनी तुमने मिठाई खाई? तो जाॅनी कह रहा है नो पापा, याने बचपन से चोरी और झूंठ बोलना सीख गया है और इसलिए उसके पापा को मुँह खुलवाना पड़ रहा है और चोरी पकड़े जाने पर दोनों हंस रहे हैं, तो अब समझ ही गए होंगे कि मिशनरियाँ इतनी झूठी, मक्कार और धोखेबाज क्यों होती हैं, हमने तो ये भी सुना है कि तुतलाने, मोटापे और डायबिटीज की समस्या भी आ सकती है!!
हाँ एक बात और तथाकथित सेक्यूलरों और वामपंथियों में यह कविता नर्सरी के बाल विद्यार्थियों की बुद्धि के विकास का पेरामीटर होता है, बच्चों ने जैसे ही ‘म’ और ‘प’ अक्षर बोलना शुरु किया वेंसे ही इस कविता का रट्टा अनिवार्य हो जाता था, इसलिए यह कविता माता-पिता मिलकर नन्हे बच्चों को येन-केन-प्रकारेण याद कराते हैं और फिर उसकी परीक्षा जब-तब होती रहती थी, याने कोई मेहमान घर आए या मिले तो बच्चों की शामत आ जाती थी, और यदि ये कविता बच्चा नहीं सुना पाया तो समझिए की गधा है और सुना दी तो जीनियस है, क्योंकि यह कविता बच्चों के लिए आई.ए.एस. (I.A.S.) की परीक्षा मानी जाती है।
इस कविता ने तो बच्चों का जीना हराम कर दिया है, ये कविता न सुना पाने पर बच्चों को हिंदी और इंग्लिश में क्या-क्या सुनना और सहना पड़ता है? मसलन गधा, डंकी, डफर, मूर्ख, बोदा, भोंदू, पोंगा और बुद्धू आदि शब्दों से अलंकृत किया जाता है! ये कविता न हुई ये तो नन्हे बच्चों की पहली चुड़ैल है!! इसे तो बाल संरक्षण आयोग को संज्ञान में लेना चाहिए!!
वहीं देखिए सनातन में हिंदी की कक्षा 1 की ये कवितायें
माँ के महत्व और ममत्व का कितना अद्भुत एवं अद्वितीय संदेश दे रही हैं। पहली शिक्षक माँ नन्हे-नन्हे बालक-बालिकाओं को प्रकृति ज्ञान के साथ हौले से दिन कैंसे निकलता है, समझा रही है। अक्षर ज्ञान और शब्दार्थ का व्यवहारिक रुप समझा रही है।
यही तो शिक्षा के साथ दीक्षा है।ऐंसी कविताओं को भारतीय पाठ्यक्रम से जानबूझकर गायब किया गया है और अब समय आ गया है कि पुनः हम अपनी ऐंसी कविताएँ पाठ्यक्रम में लाएं और चोरी और झूठ सिखाने वाली कविताओं को पाठ्यक्रम से अलग कर “स्व” का भारत बनाएं।

