– एड. पूजा रजक
पश्चिमी जगत के विद्वानों, धर्माचार्यों और चिंतकों से भरे उस विशाल सभागार में सभी की दृष्टि एक साधारण वेशभूषा वाले, किंतु असाधारण तेज से ओत-प्रोत युवा सन्यासी पर टिक गई। वह थे – भारत के आध्यात्मिक दूत, ।
“अमेरिका के भाइयों और बहनों…”
केवल 30 वर्ष की आयु में, भगवा वस्त्रों में, तेजस्वी मुखाकृति और करुणा से भरे हृदय के साथ जब विवेकानंद मंच पर पहुँचे तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि आने वाले क्षण मानव इतिहास के अमर अध्याय बन जाएंगे।
कुछ पल मौन साधकर जैसे ही उनके मुख से उद्घाटन वाक्य निकले – “अमेरिका के भाइयों और बहनों”, पूरा सभागार भावविभोर हो उठा। लगभग 7,000 श्रोता दो मिनट तक निरंतर गगनभेदी तालियों से गूंजते रहे। यह मात्र संबोधन नहीं था, यह भारतीय संस्कृति का शाश्वत उद्घोष था –
“वसुधैव कुटुम्बकम्” – समस्त विश्व एक परिवार है।
भारतीय संस्कृति का उज्ज्वल परिचय :
अपने भाषण में स्वामी विवेकानंद ने भारत की गौरवशाली परंपरा, उसकी सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव की अनूठी भावना का परिचय दिया। उन्होंने कहा –
“मुझे गर्व है कि मैं ऐसे देश से हूँ, जिसने सभी धर्मों और सम्प्रदायों को न केवल सहिष्णुता दी है, बल्कि उन्हें अपनाया भी है।”
भारत की यह घोषणा पश्चिमी जगत के लिए चौंकाने वाली थी। वह समाज, जो उस समय भौतिक प्रगति और औद्योगिक क्रांति पर गर्व कर रहा था, पहली बार आध्यात्मिक भारत की विशालता से परिचित हुआ। विवेकानंद ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि मानवता की शरणस्थली और आध्यात्मिक ध्रुवतारा है।
विश्व चेतना को झकझोरने वाला क्षण :
विवेकानंद का शिकागो भाषण केवल क्षणिक प्रभाव नहीं था। उसने पश्चिमी चेतना को झकझोर दिया और विश्व मानचित्र पर भारत की नई पहचान गढ़ी। यह भाषण भारतीय संस्कृति की सांस्कृतिक शक्ति, सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व का उद्घोष था।
विवेकानंद ने यह सिद्ध किया कि भारत की आत्मा केवल उपदेश देने वाली नहीं, बल्कि समस्त मानवता को दिशा देने वाली शक्ति है।
आज की प्रासंगिकता :
132 वर्ष बीत जाने पर भी यह भाषण आज उतना ही जीवंत और प्रासंगिक है। 11 सितम्बर 1893 केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की विजय का दिवस है। यह हमें स्मरण कराता है कि यदि हम अपनी जड़ों और मूल्यों से जुड़े रहें, तो सम्पूर्ण विश्व को मार्गदर्शन दे सकते हैं।
प्रेरणा का दीपस्तंभ :
आज जब हम 11 सितम्बर को स्मरण करते हैं, तो यह केवल इतिहास का अध्याय नहीं होता, बल्कि प्रेरणा का दीपस्तंभ बनकर हमारी राह रोशन करता है। यह दिन हमें विश्वास दिलाता है कि भारत की आत्मा में संपूर्ण मानवता के लिए करुणा, सद्भाव और समरसता निहित है।
स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण आने वाली पीढ़ियों के लिए अमर वाणी है। यह संदेश है कि “भारत केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए जीता है।”

