भारत की पहचान उसके सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रभाव में निहित : विनोद दिनेश्वर

सीधी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में टाटा कॉलेज, सीधी में शिक्षाविदों की एक प्रमुख जनगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रांत प्रचार प्रमुख (महाकौशल) श्री विनोद दिनेश्वर उपस्थित रहे। गोष्ठी में जिले के शिक्षाविदों, प्राचार्यों एवं प्रबुद्ध नागरिकों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

अपने उद्बोधन में श्री विनोद दिनेश्वर ने कहा कि प्रत्येक देश और समाज की अपनी विशिष्ट पहचान एवं लक्ष्य होता है। भारत प्राचीन काल से ही अपनी सांस्कृतिक समृद्धि, आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक संरचना के कारण विश्व में अग्रणी रहा है। इसी गौरवशाली पहचान के कारण विभिन्न विदेशी शक्तियों ने समय-समय पर भारत को कमजोर करने के प्रयास किए, किंतु भारतीय समाज की मूल शक्ति उसकी संस्कृति और एकात्मता में निहित रही है।

उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में विभिन्न धाराओं के माध्यम से स्वतंत्रता का आंदोलन चला। इसी कालखंड में 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य संगठित, संस्कारित और राष्ट्रनिष्ठ समाज का निर्माण करना था। डॉ. हेडगेवार के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि बाल्यकाल से ही उनमें राष्ट्रभक्ति और नेतृत्व के गुण विद्यमान थे।

उन्होंने आगे कहा कि संघ ने अपने 100 वर्षों की यात्रा में समाज के विविध क्षेत्रों में कार्य करते हुए अनेक संगठनों के माध्यम से राष्ट्र जीवन को सशक्त करने का प्रयास किया है। मातृशक्ति के जागरण के लिए राष्ट्रसेविका समिति, शिक्षा के क्षेत्र में विद्याभारती जैसे संगठनों ने भारतीय संस्कृति आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया है।

श्री दिनेश्वर ने वर्तमान सामाजिक चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय समाज को जाति, भाषा, क्षेत्र एवं संप्रदाय के आधार पर विभाजित करने के प्रयास निरंतर हो रहे हैं, जिनसे सजग रहना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ही वह आधार है जिसने भारत को ‘विश्व गुरु’ के पद पर स्थापित किया और आज भी यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।

उन्होंने ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा पर विशेष जोर देते हुए कहा कि कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी जीवन शैली एवं नागरिक कर्तव्यों के पालन के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त बनाया जा सकता है। साथ ही ‘स्व’ के भाव को जागृत करते हुए स्वभाषा, स्वभोजन, स्ववेश, स्वभजन एवं भारत दर्शन (भ्रमण) को जीवन में अपनाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में वक्ता ने भारतीय परिवार व्यवस्था के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि संस्कारित कुटुंब ही सशक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण करते हैं। भारत की परंपरा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के आदर्श पर आधारित है, जो विश्व शांति और मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। कार्यक्रम का समापन वन्देमातम के साथ हुआ।

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