संघ एवं समरसता: भारत की आत्मा और राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला

संघ शताब्दी वर्ष आलेख शृंखला अष्टादशः दिवस

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ॥
ऋग्वेद 10/191/2

हम सभी प्रेम से मिलकर एक साथ चलें एवं एक साथ बोलें। सभी ज्ञानी बनें – सब के मनों के बीच सहमति बने| अनादिकाल से देवता भी यज्ञ में अपने-अपने भाग प्राप्त कर ऐसा ही आचरण करते आ रहे हैं और इसी कारण से वह वंदनीय हैं|
सामाजिक समरसता केवल एक सामाजिक आदर्श नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व है। वेद–उपनिषद से लेकर भक्ति संतों और आधुनिक सुधारकों तक यह संदेश निरंतर मिलता है कि समाज तभी प्रगतिशील और सुखी होगा जब उसमें सभी व्यक्ति समान अधिकार, समान अवसर और समान सम्मान के साथ रहेंगे।

संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने कहा था कि समाज को जातिगत भेदभाव ने कमजोर किया है, इसलिए हिंदू समाज की एकता ही समरसता का वास्तविक रूप है। वे मानते थे कि समरसता बिना संगठन संभव नहीं है, इसलिए संघ शाखा को ऐसा स्थान बनाया जहाँ सब जातियों के लोग साथ खेलें, प्रार्थना करें और बराबरी से बैठें। गुरुजी गोलवलकर जी ने कहा “हम सब एक ही राष्ट्रदेवता की संतान हैं, इसलिए कोई ऊँच-नीच नहीं हो सकता।”
समरसता का अर्थ केवल नारा या औपचारिक आयोजनों नहीं है ,यह लोगों के अंतर्मन में उतर जाए, लोग शब्दों से ही नहीं बल्कि अपने कार्यो से यह कर दिखाए एवं ह्रदय से सबको एक माने एक जाने।

समरसता के लिए परिवार, समाज और राष्ट्र – तीनों की साझा भूमिका आवश्यक है।

  • परिवार की भूमिका – यह प्रथम पाठशाला है, जहाँ बच्चे पहली बार समानता, सम्मान और सहयोग के संस्कार सीखते हैं। उसे भेदभाव-मुक्त संस्कार मिले। संयुक्त परिवारों में बड़ों का आदर, छोटों से स्नेह और परस्पर सहयोग समरसता की नींव रखते हैं।
  • समाज की भूमिका – समाज को यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा, रोज़गार, संसाधन सभी को समान रूप से उपलब्ध हों। सांस्कृतिक कार्यक्रमों त्यौहार मेले आदि में सभी की सार्थक भूमिका हो । समज में छुआछूत, जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता जैसी बाधाओं को समाज सामूहिक चेतना से दूर करे। हर व्यक्ति को समझना होगा कि दूसरों का सम्मान करना और सार्वजनिक स्थल सबके लिए है यह जाने।
  • राष्ट्र की भूमिका – संविधान ने समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के मूल्यों को स्थापित किया है-इन्हें लागू करना राज्य की ज़िम्मेदारी है। शिक्षा का सार्वभौमिकरण , आरक्षण नीतियाँ, सामाजिक-आर्थिक विकास योजनाएँ समरसता को संस्थागत रूप देते हैं।
    राष्ट्रपिता गांधी से लेकर डॉ. आंबेडकर और विवेकानंद तक सभी ने सामाजिक समरसता को राष्ट्रीय उत्थान का आधार माना।

संघ के समरसता के लिए किया गए कार्य – सरसंचालक आदरणीय मोहन भागवत ने कई बार कहा है “मंदिर, पानी और श्मशान सभी के लिए समान होने चाहिए। समाज में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।”

  • मंदिर → धर्म से जुड़ा है, आध्यात्मिकता, पूजा और सामूहिक आस्था का केंद्र। ईश्वर सबके है।
  • तालाब → जीवन निर्वाह का केंद्र है से जुड़ा है, प्रकृति और संसाधन सबके लिए समान हैं।
  • श्मशान → मुक्ति का मार्ग, मृत्यु का सत्य और सबकी समानता का प्रतीक।

2023–25 में संघ ने 13,000 से अधिक गाँवों में अलग कुएँ, पृथक श्मशान, मंदिर-प्रवेश रोक जैसे भेदभाव की स्थितियाँ समझने और कम करने का अभ्यास शुरू किया।
संघ के प्रतिवेदन 2025 में अनकापल्ली ज़िले के गोंदुपालेम पलेम में व्यवसायी शाखा ने सभी जाति-नेताओं के साथ कई बैठकों के बाद यह सर्वसम्मति बनवाई कि श्मशान सबके लिए साझा होगा। गाँववालों ने शिव-मूर्ति स्थापित की, और स्वास्थ्य शिविर, शिक्षा कक्षाएँ चलाईं।
उसी प्रतिवेदन में छतरपुर विभाग (महाकौशल) के 2106 गाँवों में 9-बिंदु समरसता सर्वे का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार 1936 गाँवों में सभी जातियों को मंदिर-प्रवेश, 1913 गाँवों में साझा श्मशान, और 1954 गाँवों में धर्मशाला सबके लिए उपलब्ध पाई गईं-शेष में काम जारी बताया गया।
संघ रिपोर्ट में दर्ज है कि जागरण टोली ने चूरू/जयपुर मंडल (राजस्थान) के ग्राम-स्तर पर रास्ता चौड़ा कराया, शिव सरोवर की सफाई, दीवारों पर धार्मिक-साहित्यिक श्लोक/चित्र, और होली अब गाँव में साथ-साथ मनाई जाती है.

आपदा में संघ ने पहचान से पहले मानव-ज़रूरत देखी । 2001 के गुजरात भूकंप से लेकर 2013 के उत्तराखंड और 2015 के चेन्नई तक, तथा हाल में पंजाब, उत्तराखंड एवं हिमाचल की आपदा में सबसे आगे संघ के स्वयं सेवक मिले। हज़ारों स्वयंसेवकों ने भोजन, दवाइयाँ, चिकित्सा शिविर, स्वच्छता और पुनर्वास में योगदान दिया।
समरसता के लिए 2023–25 के दौरान संघ ने “सोशल हार्मनी प्रोजेक्ट” का विस्तार दिखाया- गाँव-गाँव पहुँच, मंदिर–स्कूल–कुआँ में समानता-परक संवाद हुआ। अब कोई “जातीय हिंदू” नहीं “राष्ट्रकारी हिंदू” होगा।

बालासाहब देवरस का ऐतिहासिक कथन- “यदि अस्पृश्यता पाप है तो सबसे बड़ा पापी मैं हूँ”- संघ की समरसता के प्रति गंभीर प्रतिबद्धता का प्रमाण माना जाता है।

संघ के प्रमुख संगठन और प्रकल्प जो समरसता के क्षेत्र में कार्यरत हैं-
समरसता मंच – संघ का सीधा संगठन जो डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर समरसता दिवस मनाता है। समरसता भोज (सभी जातियों के लोग मिलकर भोजन करना) इसका विशेष कार्यक्रम है।
सेवा भारती- दलित, वंचित और पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर काम करता है। बस्तियों, झुग्गियों क्षेत्रों में विद्यालय, स्वास्थ्य शिविर, सिलाई–कढ़ाई केंद्र, रक्तदान शिविर चलाता है। “जहाँ आवश्यकता है, वहाँ सेवा” इसका मूल मंत्र है।
वनवासी कल्याण आश्रम –आदिवासी/जनजातीय समुदायों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि–सहायता और सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाता है। आज देश भर में 20,000 से अधिक आश्रम–विद्यालय संचालित करता है।
एकल विद्यालय – आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में एक शिक्षक, एक कक्षा मॉडल पर विद्यालय। लाखों बच्चों को मुफ्त प्राथमिक शिक्षा मिल रही है।
विवेकानंद केंद्र – यह संगठन ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता, स्वावलंबन और स्वास्थ्य योजनाओं से सामाजिक समरसता को मजबूत करता है।
राष्ट्रीय सेवा भारती – यह सेवा संगठनों का छात्र संगठन है, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला–सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रकल्पों को समर्थन देता है।
अन्य प्रकल्प और प्रयास -विद्या भारती → शिक्षा के क्षेत्र में, गरीब और पिछड़े वर्गों के लिए संस्कारयुक्त शिक्षा। ग्राम विकास प्रकल्प → स्वावलंबी और जाति–भेदमुक्त गाँव की परिकल्पना। अखंड भारत संकल्प, सामाजिक न्याय अभियान → समाज में समानता और बंधुत्व का प्रचार।;समरसता संवाद → विभिन्न जातियों–समुदायों के बीच आपसी संवाद और मेल–मिलाप।

समरसता के लिए पहल
मंदिरों में समरसता- मंदिर-प्रवेश अभियान: जहाँ वंचित वर्गों को मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता था, वहाँ संघ कार्यकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कई गाँवों में दलित समाज को लेकर मंदिर-प्रवेश कराया। कुछ स्थानों पर संघ और उससे जुड़े संगठनों ने दलित पुजारियों को प्रशिक्षित कर मंदिरों में नियुक्त करवाने में मदद की।आज अनेक मंदिर में दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग के पुजारी है , नवनिर्मित राम मंदिर में भी ऐसी व्यवस्था है ; मंदिर प्रांगण में समरसता भोज (सभी जातियों के लोग साथ बैठकर प्रसाद/भोजन ग्रहण करना) संघ की प्रमुख पहल रही है।
परिवार और समरसता – संघ शाखाओं में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक, सभी जाति-वर्ग के लोग साथ खेलते, प्रार्थना करते और व्यायाम करते हैं। जिससे भेदभाव-मुक्त सोच का संस्कार घर-घर तक जाता है। परिवारों को जोड़कर दीवाली, होली, नवरात्र जैसे त्योहार सामूहिक रूप से मनाना।
गाँव और सामाजिक जीवन – कई गाँवों में संघ कार्यकर्ताओं सभी जाति वर्ग के लोगो को लेकर भजन मंडली, सत्संग और सामूहिक कीर्तन की परंपरा शुरू कराई, यही कार्य मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के गाँवों में संघ ने जनजाति और गैर-जनजाति समाज को जोड़ने के लिए किया।
गाँवों में सफाई अभियान, जल-संरक्षण, मंदिर-मरम्मत, तालाब-सफाई जैसे काम सबको साथ लेकर किए गए। दलित और जनजाति बस्तियों में शाखाएँ लगाई गई , इससे सामाजिक कम हुई एवं बच्चों और युवाओं को समानता का संस्कार मिला। शिक्षा में समरसता के लिए विद्या भारती और एकल विद्यालय में सभी जातियों और वर्गों के बच्चों को समान शिक्षा।

संघ ने समरसता के लिए शताब्दी वर्ष में समाज में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए 11360 ब्लॉक/कस्बों में सामाजिक सद्भाव बैठकें आयोजित की जाएँगी। संघ संरचना के अनुसार कुल 924 जिले हैं। इन जिलों में प्रमुख नागरिक संगोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा। संगोष्ठियों में भारत के विचार, भारत का गौरव, भारत का स्व आदि विषयों पर चर्चा होगी।
विवेकानंद ही कहते है धर्म का मापदंड मंदिरों में पूजा करने से नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति की सेवा करने से होता है। तभी भारत आगे बढ़ सकता है। विवेकानंद जी कहना है- हमारे देश को ऐसे युवकों की आवश्यकता है जिनका मस्तिष्क विशाल हो, जिनका हृदय विशाल हो और जिनकी बाहें शक्तिशाली हों, समरसता केवल एक विचार नहीं, बल्कि ऐसा जीवन-मंत्र है, जब एक साथ सब मिलकर भोजन करें, एक ही मंदिर में सब मिलकर दीप जलाएँ, और एक ही श्मशान में सबकी चिता समान अग्नि से प्रज्ज्वलित हो-तभी सच्चा भारत खड़ा होता है।

संघ के सेवा-कार्य हों या विवेकानंद के अमर संदेश-दोनों यही पुकारते हैं कि “उठो, जागो और इस देश को समरसता के दीप से आलोकित करो।” शिक्षित युवाओं से यही अपेक्षा है कि वे अपनी विद्या का उपयोग केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन करोड़ों के लिए करें जिनकी आँखें आज भी बराबरी के सपनों की प्रतीक्षा में हैं।
समरसता, राष्ट्र के पुनर्निर्माण की अनिवार्य शर्त है। जिस दिन हर भारतीय अपने भीतर यह अनुभव करेगा कि “मैं और मेरा पड़ोसी एक ही राष्ट्र के अंग हैं”उसी दिन भारत सच्चे अर्थों में विश्वगुरु के पथ पर बढ़ेगा।

– दीपक द्विवेदी
इतिहास संकलन समिति

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