रायसेन: कोई एक तिथि ऐसी होती है जिस दिन योद्धा का जीवन नहीं, मृत्यु भी इतिहास रचती है। उसका वही निर्णय, वही बलिदान आने वाली पीढ़ियों की सांसों में स्वतंत्रता और स्वाभिमान बनकर बस जाता है। छह मई 1532 ऐसी ही तिथि है। आज से ठीक 494 साल पहले रायसेन की एक स्वाभिमानी रानी की जिद और जौहर ने आक्रांता बहादुर शाह को बड़ी शिकस्त दी थी।
आत्मगौरव के लिए किले के अग्निकुंड में रानी दुर्गावती ने 700 महिलाओं व बच्चों के साथ किया था आत्मोत्सर्ग
जीवन का मोह छोड़कर अगले तीन दिनों तक अपने से कई गुनी सैन्य वाहिनी से लड़ते रहे थे राजपूत
बात तब की है जब रायसेन पर तोमर वंश के शिलादित्य का शासन था। उनका विवाह चित्तौड़गढ़ के राणा सांगा की पुत्री दुर्गावती से हुआ था। उसी दौरान हुमायूं और शेरशाह सूरी के नेतृत्व में अफगान शक्ति के बीच टकराव बढ़ा हुआ था। मुगल बंदरगाह तक पहुंचने के लिए गुजरात पर कब्जा चाहते थे। इन सबके बीच गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने व्यापारिक मार्ग पर कब्जे के लिए मालवा पर आक्रमण किया। मध्यकाल तक रायसेन मालवा का प्रवेश द्वार था। ऐसे में रायसेन किले पर कब्जा अनिवार्य था।
राजा शिलादित्य की शक्ति को देखते हुए बहादुर शाह सीधे आक्रमण का साहस नहीं कर पा रहा था। उसने धोखाधड़ी की योजना बनाई और अपने अमीर नस्सन खान को दूत बनाकर भेजा। दूत के प्रस्ताव पर राजा शिलादित्य धार के पास नालछा जाकर सुल्तान से मिलने को तैयार हो गए। लेकिन वहां उन्हें बंदी बनाकर मांडू भेज दिया गया। राजा के पुत्र भूपति राय को यह खबर मिली तो वे एक छोटी सी सेना के साथ मांडू पर हमला करने निकल गए। भूपति राय को किले से हटने का इंतजार कर रहे बहादुर शाह ने दूसरे रास्ते से आकर रायसेन को घेर लिया। उस समय किले की जिम्मेदारी रानी दुर्गावती और राजा शिलादित्य के भाई लक्ष्मणसेन के हाथ में थी। इसकी सूचना पर भूपति राय मेवाड़ के राणा से सैन्य मदद लेकर वापस लौटे। इससे घबराए बहादुर शाह ने किले पर कब्जे के लिए बंदी राजा शिलादित्य को आगे करके किले का द्वार खुलवाने की कोशिश की। लेकिन रानी यह चाल भांप गई।
राजा को अकेले किले में बुलाकर अंतिम हमले की तैयारी
रानी ने संदेश भिजवाया कि राजा स्वयं दुर्ग में आकर रानी से बात करें। बहादुरशाह ने रानी की इस शर्त को स्वीकार कर लिया और शिलादित्य को मलिक शेर के साथ किले में पहुंचा दिया। अपने लोगों के बीच पहुंचकर राजा संतुलित हुए। रानी ने उन्हें समझाया कि जीते जी किले को शत्रु को सौंप देने से पूर्वजों की कीर्ति कलंकित होगी। उन्होंने राजा और वहां मौजूद राजपूत सरदारों को अंतिम युद्ध के लिए प्रेरित किया और खुद जौहर के लिए तैयार हो गईं।
धधक उठी जौहर की ज्वाला
छह मई को राजा शिलादित्य और उनके भाई लक्ष्मणसेन के नेतृत्व में राजपूत सैनिक केसरिया बाना पहनकर किला छोड़कर शत्रु सैनिकों पर टूट पड़े। यह उनका साका (अंतिम युद्ध) था। इधर महल के नीचे तहखाने की तरफ एक बड़े कुंड में जौहर की आग धधक उठी। रानी दुर्गावती के साथ 700 महिलाएं अपने बच्चों के साथ अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए भस्म हो गईं। राजपूत अगले तीन दिनों तक शत्रु सेना से जूझते रहे। राजा शिलादित्य 10 मई को बलिदान हुए। उसके बाद ही बहादुर शाह की सेना किले तक पहुंच पाई।
बहादुर शाह की यह विजय अस्थायी रही। भूपति राय ने लौटते ही बहादुर शाह और उसके सामंत को हराकर रायसेन से भगा दिया। किले पर फिर से तोमरों का कब्जा हुआ। रायसेन के किले में इस जौहर के कई प्रमाण हैं। गजेटियर में भी इसका उल्लेख है।
लेखक: राजीव लोचन चौबे
