जब अयोध्या के राजमहल से एक राजकुमार वन की ओर कदम बढ़ाते है, तब वह अपने जीवन की दिशा बदलने के साथ ही वह सम्पूर्ण राष्ट्र की चेतना को एक नई धारा देते है। श्रीराम का वन गमन केवल त्याग की ही कथा नहीं है, पर उससे भी अधिक यह संस्कार, समरसता और सांस्कृतिक एकता का महाकाव्य है। यह पथ उत्तर की सरयू से प्रारंभ होकर विंध्य की पहाड़ियों, दंडकारण्य के जंगलों, गोदावरी के तटों और दक्षिण के समुद्र तक पहुँचता है। राम जहाँ-जहाँ गए, वहाँ उनके चरण चिन्हों ने मानवता के मूल्य स्थापित किए, वहाँ पर समाज के बिखरे हुए सूत्र जोड़े एवं वहाँ प्रकृति और संस्कृति का संतुलन विकसित किया।
श्रीराम के जीवन की चार प्रमुख यात्राएँ
श्रीराम के जीवन को चार प्रमुख यात्राओं में समझा जा सकता है
- ऋषि विश्वामित्र के साथ यात्रा – ताड़का वध, राक्षसों का संहार
- मिथिला यात्रा – सीता स्वयंवर और विवाह
- वन गमन (14 वर्ष) – मुख्य सांस्कृतिक यात्रा
- लंका विजय के बाद वापसी की यात्रा – धर्म की स्थापना
इनमें तीसरी यात्रा वन गमन सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता का आधार बनती है।
राम वन गमन पथ में स्व, कुटुंब, समरसता, पर्यावरण और नागरिक कर्तव्य एक साथ जीवित हो उठते हैं।
अयोध्या से तमसा — मैं से हम की शुरुआत
अयोध्या में श्रीराम का वनवास स्वीकारना एक राजकुमार का त्याग, कुटुंब की मर्यादा और स्व की पहचान है।
सुनु जननी सोइ सुत बड़भागी।
जो पितु मातु वचन अनुरागी॥
श्रृंगवेरपुर — जब समाज हृदय से जुड़ता है
निषादराज, श्रीराम को गले लगाते हैं, यह मिलन इतिहास का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश है। यहाँ समरसता है, कोई छोटा-बड़ा नहीं है, यहाँ अहंकार का लोप है।
केवट — जब सेवा ही सबसे बड़ा धर्म बन जाती है
केवट श्रीराम के चरण पखारते है, यह दृश्य केवल भक्ति के साथ साथ समाज का दर्शन है। इस सेवा में सम्मान है, श्रम में गरिमा है।
चित्रकूट — जब परिवार, समाज और आत्मा एक हो जाते हैं
चित्रकूट में भरत और श्रीराम का मिलन भाइयों का एवं कुटुंब मिलन का चरम आदर्श है। चित्रकूट हमें सिखाता है, जहाँ परिवार जुड़ा है, वहीं समाज सुदृढ़ है।
श्रीराम भरत से कहते हैं कि वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है और जगत् जानता है कि सेवा धर्म बड़ा कठिन है। जो व्यक्ति स्वार्थी होता है वह सच्ची सेवा नहीं कर सकता, शत्रुता में व्यक्ति धर्म-अधर्म भूल जाता है और प्रेम मे ही मग्न व्यक्ति को उचित अनुचित नहीं दिखता।
न जगु जाना॥
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू।
बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू॥
दंडकारण्य — जब प्रकृति ही गुरु बन जाती है
दंडकारण्य में श्री राम का जीवन, मानव और प्रकृति के बीच संतुलन का सबसे बड़ा उदाहरण है। यहाँ पर्यावरण अर्थात प्रकृति में ईश्वर है, यहाँ समरसता का अर्थ जनजाति और ऋषि एक है और यहाँ नागरिक कर्तव्य कमजोरों की रक्षा करना है।
पंचवटी — जब जीवन हमें सावधान करता है
पंचवटी में स्वर्ण मृग जीवन की सबसे बड़ी सीख है। यहाँ स्व-बोध विवेक है, यहाँ कुटुंब सुरक्षा है और यहाँ सबसे बड़ी सीख सजगता है।
निगम नेति सिव ध्यान न पावा।
मायामृग पाछें सो धावा॥
संसार में ऐसे अनेक लोभ, भ्रम आएंगे पर विवेक का प्रयोग कर उससे बचना ही नीति है।
जटायु — जब कर्तव्य जीवन से बड़ा हो जाता है
यहाँ नागरिक कर्तव्य का अर्थ अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना है और प्राणी मात्र से प्रेम करना समरसता है।
परहित बस जिन्ह के मन माहीं।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
तनु तिज तात जाहु मम धामा।
देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।
शबरी — जब प्रेम ही परम सत्य बन जाता है
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई।
धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा।
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
अर्थात जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता—इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल दिखाई पड़ता है।
यहाँ भक्ति में समानता ही समरसता है और ईश्वर की प्राप्ति पर सबका अधिकार है।
किष्किंधा — श्रीराम एवं सुग्रीव का मिलन
यहाँ हमे मित्रता की परिभाषा मिलती है—
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।
तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना।
मित्रक दुख रज मेरु समाना॥
अर्थात जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु के समान जाने।
हनुमान जी का लंका गमन
जब माता सीता की खोज में वानर सेना समुद्र तट पर पहुँचती है, तब सब मौन हो जाते हैं। हनुमान जी भी अपनी शक्ति भूल जाते है, तब जामवंत उन्हें स्मरण कराते हैं—
कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
हनुमान जी जब लंका की ओर जाते हैं, तब उनका एक ही लक्ष्य होता है—
राम काज राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम॥
हनुमान जी हर बाधा को बुद्धि, धैर्य और संयम से पार करते हैं।
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभाव बड़वानलहि जारि सकै खलु कूल॥
रामेश्वरम् — जब संकल्प समुद्र को भी झुका देता है
यहाँ निर्मित रामसेतु ने सामूहिक प्रयास और समरसता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
लछिमन बान सरासन आनू।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति।
सहज कृपन सन सुंदर नीति॥
ममता रत सन ग्यान कहानी।
अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा।
ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
लंका विजय — जब पाँचों आयाम पूर्ण हो जाते हैं
यहाँ स्व (धैर्य), कुटुंब (प्रेम), समाज (सहयोग), पर्यावरण (संतुलन) और नागरिक कर्तव्य (राष्ट्र धर्म) मिलते हैं।
राम वन गमन हमें सिखाता है कि स्व सुधरे तो जीवन सुधरे, कुटुंब जुड़े तो समाज बने, समाज समरस हो तो राष्ट्र मजबूत हो, प्रकृति संतुलित हो तो भविष्य सुरक्षित हो।
राम वन गमन पथ हमें सिखाता है कि सच्ची उन्नति तभी संभव है, जब व्यक्ति अपने भीतर के स्व को पहचानकर अहंकार का त्याग करे, कुटुंब में प्रेम और मर्यादा स्थापित करे, समाज में समरसता और समानता का भाव विकसित करे, प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखे।
जब हम श्री राम के इस पथ को अपने जीवन में अपनाएंगे हैं, तभी सच्चे अर्थों में एक सशक्त, समरस और जागृत भारत का निर्माण संभव होगा।

जबलपुर
