होली भारतीय सांस्कृतिक जीवन का केवल एक उत्सव नहीं,बल्कि सामाजिक चेतना की परीक्षा भी है। रंगों की उन्मुक्तता,सामूहिक उल्लास और लोक परंपराओं की जीवंतता के बीच यह पर्व हर वर्ष हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है कि क्या हम अपने मूल मूल्यों के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध हैं,जितने अपने उत्सवों के प्रति? बदलते सामाजिक परिदृश्य, तीव्र होती वैचारिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटल माध्यमों की प्रभावशाली उपस्थिति के बीच होली का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है।
पौराणिक कथा में हिरण्यकशिपु का अहंकार,प्रह्लाद की दृढ़ आस्था, होलिका का छल और अंततः भगवान नरसिंह का न्याय—ये घटनाएँ केवल धार्मिक आख्यान नहीं है,ये सत्ता और सत्य के शाश्वत संघर्ष का रूपक हैं। हिरण्यकशिपु उस मानसिकता का प्रतीक है,जो शक्ति के मद में असहमति को कुचलना चाहती है। प्रह्लाद उस साहस का प्रतीक है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने विश्वास से विचलित नहीं होता। और होलिका यह स्मरण कराती है कि अन्याय के साथ खड़ी शक्ति अंततः स्वयं भस्म हो ही जाती है।
समकालीन संदर्भ में यह कथा हमें सावधान करती है। आज समाज में विचारों का बहुलतावाद है,जो लोकतंत्र की शक्ति है। किंतु इसी के साथ एक प्रवृत्ति यह भी उभर रही है कि स्थापित सांस्कृतिक प्रतीकों को उलटकर प्रस्तुत किया जाए कभी जिज्ञासा के नाम पर, कभी प्रतिरोध के नाम पर और कभी केवल सनसनी के लिए। हाल के समय में कुछ मंचों पर होलिका को नायिका और प्रह्लाद को खलनायक के रूप में चित्रित करने के प्रयास सामने आए हैं।
निस्संदेह,किसी भी कथा का पुनर्पाठ संभव है। समाज स्थिर नहीं होता,वह प्रश्न पूछता है,नए अर्थ गढ़ता है। परंतु पुनर्व्याख्या और विकृति के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है। यदि किसी कथा की मूल आत्मा जो सत्य, नैतिक साहस और अन्याय के प्रतिरोध का संदेश देती है को जानबूझकर उलटकर प्रस्तुत किया जाए,तो वह बौद्धिक विमर्श नहीं,बल्कि सांस्कृतिक असंतुलन का कारण बन सकता है। प्रह्लाद को खलनायक सिद्ध करने का प्रयास वस्तुतः उस आदर्श को चुनौती देना है, जो कठिन समय में भी नैतिक दृढ़ता का प्रतीक रहा है। हमारी दृष्टि से प्रश्न यह है कि क्या हम अपने सांस्कृतिक प्रतीकों से संवाद कर रहे हैं या उन्हें वैचारिक संघर्ष का उपकरण बना रहे हैं? होली का मूल संदेश विभाजन नहीं,समरसता है, प्रतिशोध नहीं,आत्मशुद्धि है। होलिका दहन का अर्थ केवल एक पौराणिक प्रसंग का स्मरण नहीं,बल्कि यह स्वीकार करना है कि अहंकार,द्वेष और असत्य अंततः समाज को ही जलाते हैं।
आज यह आत्मशुद्धि केवल धार्मिक या आध्यात्मिक संदर्भ तक सीमित नहीं है। पर्यावरणीय संकट,जल-संकट और सार्वजनिक आचरण की गिरती संवेदनशीलता हमें नई जिम्मेदारियों की याद दिलाती है। यदि होली के नाम पर हम जल की अंधाधुंध बर्बादी करें, रासायनिक रंगों से प्रकृति और स्वास्थ्य को हानि पहुँचाएँ या उत्सव की आड़ में किसी की गरिमा का उल्लंघन करें, तो यह उस मूल भावना के विरुद्ध होगा, जिसका यह पर्व प्रतिनिधित्व करता है। परंपरा का सम्मान तभी सार्थक है, जब उसमें समयानुकूल विवेक भी जुड़ा हो। रंगों की होली सामाजिक समानता का प्रतीक मानी जाती है। यह वह अवसर है जब सामाजिक विभाजन की रेखाएँ क्षीण पड़ती हैं और लोग एक-दूसरे को अपनत्व के रंग में रंगते हैं। किंतु यह समरसता केवल प्रतीकात्मक न रह जाए यह सुनिश्चित करना भी समाज की जिम्मेदारी है। यदि वर्ष भर हम वैचारिक कटुता,सामाजिक दूरी और डिजिटल आक्रोश में उलझे रहें और एक दिन रंग लगाकर संतुष्ट हो जाएँ, तो यह उत्सव की आत्मा के साथ न्याय नहीं होगा।
वैश्विक स्तर पर भी होली भारत की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक बन चुकी है। दुनिया के अनेक देशों में यह उत्साह से मनाई जाती है। ऐसे में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि हम इसके मूल संदेश को स्पष्ट और संतुलित रूप में प्रस्तुत करें एक ऐसा संदेश,जो सत्य की विजय,अन्याय के प्रतिरोध और प्रेम की स्थापना पर आधारित है। अंततः होली हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं देती, वह हमें आत्ममंथन के लिए बाध्य करती है। क्या हमने अपने भीतर के अहंकार को पहचाना? क्या हमने असत्य के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाया? क्या हमने अपने सामाजिक व्यवहार में समरसता और
संवेदनशीलता को स्थान दिया? यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक हैं, तभी होली सार्थक है। अन्यथा रंग सूख जाएँगे,उत्साह क्षीण हो जाएगा और हम फिर उसी विभाजित सामाजिक यथार्थ में लौट आएँगे। होली का वास्तविक उत्सव तब होगा,जब हम अपने भीतर की होलिका को जलाकर प्रह्लाद जैसी नैतिक दृढ़ता को जीवित रखें और यह समझें कि परंपरा का उद्देश्य अतीत में लौटना नहीं,बल्कि वर्तमान को बेहतर बनाना है। यही इस पर्व का संदेश है और यही हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी।

लेखक- अमित राव पवार,देवास (म.प्र.)
युवा लेखक-साहित्यकार
