सागर। शिक्षा किसी भी राष्ट्र की नियति का निधर्धारण करती है। वर्तमान में भारत ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य की ओर अग्रसर है, जहाँ शिक्षा की गुणवत्ता केवल साक्षरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चरित्र निर्माण और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता का आधार है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 इस दिशा में एक क्रांतिकारी दस्तावेज है, जो पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर बल देता है।
स्कूल शिक्षाः नींव का सुदृढ़ीकरण
स्कूल शिक्षा बच्चों के व्यक्तित्व की आधारशिला होती है। इसमें सुधार के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। मातृभाषा और पारंपरिक ज्ञानः NEP 2020 के अनुसार, प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। इससे न केवल अवधारणात्मक स्पष्टता आती है, बल्कि बच्चा अपनी संस्कृति से भी जुड़ा रहता है। हमारे पारंपरिक ज्ञान तंत्र (IKS) को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाकर हम बच्चों में ‘भारतीयता’ के प्रति गौरव का भाव जगा सकते है।
रटंत विद्या से मुक्तिः शिक्षा की गुणवत्ता तब सुधरेगी जब मूल्यांकन ‘अंकों’ के बजाय ‘कौशल’ और ‘समझ पर आधारित होगा। अनुभवात्मक अधिगम (Experiential Learning) के माध्यम से छात्रों को प्रयोगों और गतिविधियों से जोड़ना अनिवार्य है। शिक्षक प्रशिक्षणः शिक्षक शिक्षा प्रणाली के केंद्र हैं। उन्हें निरंतर आधुनिक तकनीकों और बाल मनोविज्ञान के प्रति प्रशिक्षित करना स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की पहली शर्त है।
उच्च शिक्षाः नवाचार और शोध का केंद्र
उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि रोजगारपरक और शोध-उन्मुख मानव संसाधन तैयार करना है। बहुविषयक दृष्टिकोण (Multidisciplinary Approach): भविष्य की समस्याओं का समाधान एकल विषय से संभव नहीं है। एक मानविकी के छात्र को कोडिंग का ज्ञान और एक इंजीनियर को नृवंशविज्ञान (Anthropology) की समझ होनी चाहिए। NEP 2020 द्वारा प्रस्तावित ‘मल्टीपल एंट्री और एग्जिट’ विकल्प छात्रों को लचीलापन प्रदान करता है। अनुसंधान और विकास (Research and Development): विकसित भारत के लिए हमें ‘अनुकरण’ करने वाले समाज से बदलकर ‘नवाचार’ (Innovation) करने वाला समाज बनना होगा। उच्च शिक्षण संस्थानों को उद्योगों के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि शोध पत्रिकाओं (Journals) तक सीमित न रहकर वास्तविक समस्याओं का समाधान कर सके।
डिजिटल साक्षरता और समावेशिताः उच्च शिक्षा में ‘एडलटेक’ (EdTech) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का समावेश गुणवत्ता में सुधार कर सकता है, बशर्ते यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
स्कूल और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए कुछ अतिरिक्त महत्वपूर्ण बिंदुः
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल स्कूल के बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें समुदाय की भागीदारी भी आवश्यक है। सेवानिवृत्त पेशेवरों, वैज्ञानिकों और स्थानीय कलाकारों को स्कूलों से जोड़ना चाहिए ताकि वे छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान दे सकें। ग्रामीण क्षेत्रों में ‘स्मार्ट क्लास’ और ‘पीएम ई-विद्या’ जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करना होगा ताकि संसाधनों का अभाव गुणवत्ता में बाधक न बने।
NEP 2020 के अनुसार, कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा शुरू होनी चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में लकड़ी का काम या जैविक खेती प्रसिद्ध है, तो छात्रों को उसका प्रशिक्षण मिलना चाहिए। इससे छात्र पढ़ाई के बाद केवल ‘नौकरी खोजने वाले’ नहीं बल्कि ‘नौकरी देने वाले’ (Job Creators) बनेंगे। उच्च शिक्षा में डिग्री के साथ-साथ अनिवार्य इंटर्नशिप से छात्रों को उद्योग की वास्तविक जरूरतों का अनुभव होता है। गुणवत्ता केवल शैक्षणिक प्रदर्शन से नहीं मापी जा सकती। एक स्वस्थ मस्तिष्क ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ग्रहण कर सकता है। स्कूलों में योग और ध्यान को दिनचयां का हिस्सा बनाना चाहिए।
यह हमारी ‘पारंपरिक विरासत’ भी है और तनाव प्रबंधन का आधुनिक तरीका भी। उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए पेशेवर काउंसलर्स की उपलब्धता अनिवार्य होनी चाहिए। वर्तमान में हमारे शोध अक्सर पश्चिमी सिद्धांतों पर आधारित होते हैं। हमें अपनी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान अपनी ही परंपराओं और स्थानीय संसाधनों में खोजना होगा। उदाहरण के लिए, ‘आयुष’ (AYUSH) और आधुनिक चिकित्सा का एकीकरण। शोध पत्रों को स्थानीय भाषाओं में प्रकाशित करने के लिए ‘अनुवाद’ तकनीक (AI Translation) का उपयोग करना चाहिए, ताकि ज्ञान केवल अंग्रेजी जानने वालों तक सीमित न रहे।
विकसित भारत के नागरिक केवल तकनीकी रूप से कुशल नहीं, बल्कि नैतिक रूप से भी सुदृढ़ होने चाहिए। समानता, न्याय और बंधुत्व के साथ-साथ ‘पर्यावरण संरक्षण’ जैसे मूल्यों को बचपन से ही सिखाना होगा। प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए ‘पंचप्राण’ गुलामी की मानसिकता से मुक्ति और अपनी विरासत पर गर्व को पाठ्यक्रम के मूल में रखना चाहिए।
2047 तक भारत को एक ‘ज्ञान महाशक्ति’ (Knowledge Superpower) बनाने के लिए हमें अपनी प्राचीन ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ के मूल्यों को पुनर्जीवित करना होगा। प्राचीन भारत में नालंदा और तश्चशिला जैसे केंद्र इसलिए श्रेष्ठ थे क्योंकि वहाँ ज्ञान का आदान-प्रदान स्वतंत्र और जिज्ञासा आधारित था। आज हमें उसी ‘स्वदेशी दृष्टि’ को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है, जहाँ शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन न होकर ‘आत्मबोध’ और ‘राष्ट्र सेवा’ का माध्यम बने।
शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं है, इसके लिए समाज, शिक्षक और अभिभावकों को सामूहिक भागीदारी अनिवार्य है। जब हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों (Traditional Knowledge) को आधुनिक वैश्विक मानकों के साथ जोड़ेंगे, तभी हम ‘विकसित भारत’ के स्वप्न को साकार कर पाएंगे। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए हमें ‘जड़ से जुड़ाव और भविष्य की ओर झुकाव’ का मंत्र अपनाना होगा। जब हमारी शिक्षा व्यवस्था आधुनिक तकनीक (Al, Robotics) का स्वागत करते हुए अपनी जड़ों (वेद, योग, स्थानीय भाषा) को मजबूती से धामे रहेगी, तभी भारत वास्तव में ‘विश्व गुरु’ के रूप में उभरेगा।

