वैश्विक संकट में भारत की दृढ़ रणनीति: ईरान युद्ध, हार्मुज संकट और ऊर्जा सुरक्षा की नई दिशा

नई दिल्ली, मार्च 2026 की शुरुआत से विश्व एक अभूतपूर्व संकट से जूझ रहा है। अमेरिका और इजराइल के संयुक्त सैन्य अभियानों ने ईरान में गहरा प्रभाव डाला है, जिसमें ईरानी सर्वोच्च नेता की मृत्यु, परमाणु सुविधाओं पर हमले और क्षेत्रीय अस्थिरता शामिल है। ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इजराइल और खाड़ी देशों पर ड्रोन-मिसाइल हमले किए तथा विश्व के तेल व्यापार का पाँचवाँ हिस्सा नियंत्रित करने वाले हार्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावित कर दिया। परिणामस्वरूप वैश्विक तेल कीमतें आसमान छू रही हैं, हजारों नाविक समुद्र में फँसे हुए हैं और मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चेतावनी दी है कि युद्ध “नियंत्रण से बाहर” हो चुका है।

इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत ने अपनी परंपरागत कूटनीतिक परिपक्वता और रणनीतिक स्वायत्तता का परिचय दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में स्पष्ट कहा कि स्थिति “चिंताजनक” है, लेकिन भारत विकास के पथ पर अडिग है। विदेश मंत्रालय ने 3 मार्च को जारी बयान में तुरंत डी-एस्केलेशन (तनाव कम करने) की अपील की और संवाद व कूटनीति के माध्यम से समाधान पर जोर दिया। भारत ने खाड़ी देशों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की, जबकि 25 मार्च को सभी दलों की बैठक बुलाई गई। प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों के साथ भी बैठक कर राज्यों की तैयारियों का जायजा लिया।

भारत की रणनीति तीन मजबूत स्तंभों पर टिकी है। पहला – ऊर्जा सुरक्षा। भारत अपनी 85 प्रतिशत तेल आयात आवश्यकता का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से पूरा करता है। हार्मुज संकट के बावजूद भारत ने 53 लाख मीट्रिक टन रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का उपयोग तैयार रखा है। आयात स्रोतों को 41 देशों तक विविधीकरण किया जा चुका है। रूस, अमेरिका, सऊदी अरब और UAE से आपूर्ति बढ़ाई गई है। दूसरा – कूटनीतिक संतुलन। भारत ने अमेरिका-इजराइल के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए ईरान, रूस और खाड़ी देशों के साथ भी संतुलित संबंध रखे हैं। यह “मल्टी-अलाइनमेंट” (बहु-संरेखण) की नीति का जीवंत उदाहरण है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से जोड़ा है। तीसरा – भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा। खाड़ी में 90 लाख से अधिक भारतीय काम कर रहे हैं। सरकार ने उनकी सुरक्षा के लिए विशेष फ्लाइट्स, हेल्पलाइन और समन्वय तंत्र सक्रिय किए हैं।

यह संकट भारत के लिए चुनौती तो है, लेकिन अवसर भी। विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी के बावजूद भारत 2026 में 6.6 प्रतिशत विकास दर के साथ सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। सार्वजनिक निवेश, उपभोक्ता मांग और कर सुधारों ने इसे मजबूती दी है। राइसीना डायलॉग 2026 में प्रधानमंत्री ने “संसकार” थीम के तहत वैश्विक सहयोग पर जोर दिया। भारत G20 की सफलता के बाद BRICS की अगली मेजबानी की तैयारी में है और ग्लोबल साउथ का आवाज बनकर उभर रहा है।

जनता के लिए सकारात्मक संदेश स्पष्ट है – भारत न केवल संकट से लड़ रहा है, बल्कि उसे अवसर में बदल रहा है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत स्वदेशी उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है। हर भारतीय को गर्व होना चाहिए कि दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र के रूप में हम शांति के दूत बनकर उभर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी का संदेश है – “हम रिश्ते बनाते हैं, संकट का सामना करते हैं और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं।” इस संकट से गुजरते हुए भारत न केवल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि विश्व को एक नया संदेश दे रहा है – संतुलन, संवाद और संकल्प से किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है। 2047 के विकसित भारत के सपने को साकार करने की दिशा में यह परीक्षा हमें और मजबूत बनाएगी।

विश्व संवाद केंद्र
महाकौशल

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