ईवीएम से चुनाव आयोग तक

यह तो पूरे देश को पता है कि वर्ष 2014 से जब से भाजपा केन्द्र की सत्ता में आई तभी से कांग्रेस समेत अधिकांश विपक्षी दल ईवीएम के विरूद्ध युद्ध स्तर पर अभियान चलाते रहे। यह आरोप लगाते रहे कि ईवीएम में हेर-फेर के चलते भाजपा सिर्फ केन्द्र में ही नहीं, अधिकांश राज्यों में भी सत्ता में आ रही है। यद्यपि इस सम्बन्ध में कई बार चुनाव आयोग द्वारा स्पष्टीकरण दिया गया कि ऐसा होना संभव नहीं है। इस सम्बन्ध में चुनाव आयोग द्वारा प्रेजेन्टेशन भी दिया गया और उसमें विपक्षी दल के प्रतिनिधियों को भी बुलाया गया, ताकि उनके आरोप का परीक्षण हो सके। लेकिन उक्त वक्त विपक्षी दलों ने अपने प्रतिनिधि नहीं भेजे। मामला स्पष्ट था कि विपक्षी दलों को भी पता था कि आरोप झूठे हैं, पर माहौल बनाने के लिये की हम हारते नहीं, हराये जाते हैं- इसका औचित्य बताने के लिये ऐसा प्रचारित किया गया। विपक्ष का कहना था कि ईवीएम को छोड़कर बैलेट पेपर से चुनाव होना चाहिए। यानी वह हवाई जहाज के युग से देश को बैलगाड़ी युग में वापस ले जाना चाहते थे। वह चाहते थे कि जैसे पहले बूथ लूटे जाते थे, एक ही व्यक्ति सैकड़ों बैलेट पर ठप्पा लगा देता था, उस दौर की फिर से शुरूआत हो। इसके लिये विपक्षी दल न्यायालय भी गये पर उन्हें वहाँ भी मुँह की खानी पड़ी। बहुत दिन तक जब यह नैरेटिव नहीं चल पाया और उसकी हवा निकल गई तो राहुल गाँधी समेत पूरे विपक्ष ने चुनाव आयोग पर ही हमला शुरू कर दिया और उस पर वोटो की चोरी कराकर भाजपा को जिताने के आरोप लगाने शुरू कर दिये। इसके पूर्व बिहार में निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का अभियान का भारी विरोध हुआ। कुछ ऐसा जैसे कि एसआईआर जैसा अभियान चलाने का चुनाव आयोग को कोई अधिकार ही न हो।


बिहार में चुनाव आयोग एसआईआर न कर सके, इसके लिये विपक्षी दलों समेत कुछ भाजपा विरोधी नैरेटिव चलाने चाले सर्वाेच्च न्यायालय पहुँच गये। पर सर्वाेच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के काम पर न तो रोक लगाई और न ही याचिकाकर्ताओं को कोई विशेष राहत ही दी। जहाँ तक इस सम्बन्ध में सर्वाेच्च न्यायालय में याचिकाकर्ताओं की आपत्ति है, उसमें उनका कहना है कि जब चुनाव आयोग आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी को नहीं मान रहा है तो दूसरे कागज जो उपलब्ध नहीं है, वह कहाँ से लेकर आयें। लेकिन लाख टके की बात यह कि जाति जनगणना के लिये तो कागज मिल सकता है, तो इसके लिये क्यों नहीं मिल सकता। अब तो सर्वाेच्च न्यायालय ने भी मान लिया है कि आधार, राशन कार्ड, वोटर आईडी नागरिकता तय करने के लिये पर्याप्त नहीं है। अभी हाल में ही बाम्बे उच्च न्यायालय का भी एक ऐसा फैसला सामने आया है जिसमें उसने कहा है कि आधार, राशन कार्ड, पैन कार्ड नागरिकता तय करने के लिये पर्याप्त नहीं है। निर्णायक बात यह कि सर्वाेच्च न्यायालय भी यह मान लिया है कि वोट जोड़ना और काटना चुनाव आयोग का काम है। जो लोग यह कह रहे हैं कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का नहीं, गृह मंत्रालय का काम है, तो क्या वह चाहते हैं कि कोई भारत का नागरिक भले ही न हो, उसे भी मतदान का अधिकार मिलना चाहिए। आखिर में चुनाव आयोग वोटर का नाम जोड़ना या काटने में एक ही मुख्य मापदण्ड लिया है कि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं। सर्वाेच्च न्यायालय तो यह भी कह रहा है कि पहले मतदाता सूची के लिये 7 दस्तावेज ही देखे जाते थे बिहार में चुनाव आयोग 11 दस्तावेजों का परीक्षण कर इसे ज्यादा समावेशी बना रहा है।

अब जब बिहार में चुनाव आयोग ने जुलाई के अंत में एसआईआर के तहत वोटर लिस्ट से 65 लाख करीब नाम काट दिये हैं। इसमें मृत वोटरों की संख्या 22 लाख, बिहार के बाहर जो मतदाता लम्बे समय से चले गये हैं, उनकी संख्या 36 लाख और जिन मतदाताओं के नाम दो जगह पर हैं, उनकी संख्या करीब 7 लाख है। कुल मिलाकर बिहार में इसके बाद मतदाताओं की संख्या 7.9 करोड़ से घटकर 7.24 करोड़ रह गई है। चुनाव आयोग का कहना है, एक भी सही मतदाता छूटे ना, एक भी फर्जी मतदाता जुड़े ना। लेकिन फर्जी वोटो के सहारे जो चुनाव जीतने की आस लगाये बैठे थे तो वह तो विधवा-विलाप करेंगे ही। गौर करने की बात यह है कि जहाँ पर विपक्षी दल आधार के आधार पर वोटर लिस्ट बनाये जाने की बातें कर रहे हैं, वहाँ बिहार के सीमांचल में किशनगंज में 68.1 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, लेकिन आधार 126 प्रतिशत बने हुये हैं। कटिहार में मुस्लिम मतदाता 44.12, अररिया में 43.27 और पूर्णिया में 38 प्रतिशत हैं। लेकिन मुस्लिम बहुल इलाकों में 100 लोगो पर पर 123 प्रतिशत कवरेज है। जबकि पूरे बिहार में यह आधार कवरेज 94 प्रतिशत है। इससे यह समझा जा सकता है कि यदि आधार के सहारे मतदाता सूचियाँ बनाई गई, तो कितना बड़ा फर्जीवाड़ा होगा।

वस्तुतः बिहार में एसआईआर की शुरूआत ही 24.06.2025 को शुरू की गई जिसका उद्देश्य ही मतदाता सूचियों में मृत, स्थानान्तरित और दोहरे पंजीकरण वाले मतदाताओं का नाम हटाना और छूट गये मतदाता का नाम मतदाता सूची में शामिल करना है। लेकिन ऐसा नहीं कि जिन 65 लाख लोगो के नाम मतदाता सूची से हटाये गये हैं, वह अंतिम है, वस्तुतः यह ड्राफ्ट सूची है। मतदाता अपना नाम निर्वाचन आयोग की बेवसाइट पर देख सकते हैं और 01.09.2025 तक दावे और आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकते हैं, जिसमें आधे अगस्त तक 17665 लोग अपने दावे और आपत्ति प्रस्तुत कर चुके हैं। लेकिन इससे यह समझा जा सकता है कि अधिक-से-अधिक 50 हजार लोग ही दावे और आपत्ति प्रस्तुत कर सकते हैं। इसका मतलब यह कि 65 लाख मतदाताओं के नाम काटने का चुनाव आयोग का फैसला कुल मिलाकर सही है, जबकि राजद, कांग्रेस कमेत विपक्षी दल एसआईआर को एक षणयंत्र बता रहे हैं, जिसका उद्देश्य गरीब, दलित, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनना है। इसे वह बैकडोर एनआरसी बता रहे हैं, जो एक दिन पूरे देश में लागू की जायेगी। जबकि असलियत में यह बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंयाओं की घुसपैठ एवं अन्य फर्जी मतदाताओं को बाहर करने का मामला है।

अब एक तरफ तो राहुल गाँधी चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगा रहे हैं, कह रहे हैं कि एक ही पते पर कई वोटर्स, डुप्लीकेट और फेक वोटर हैं। कई के मकान नम्बर 0 है। वह तो यहाँ तक कहते हैं कि मोदी वोट चोरी करके प्रधानमंत्री बने हैं। यदि राहुल गाँधी की बाते आंशिक रूप से भी सच है, तो फिर देश में मतदाता सूचियों को गहन परीक्षण की जरूरत है। यह बात और है कि जब चुनाव आयोग राहुल गाँधी से इस सम्बन्ध में शपथ-पत्र माँगता है, तो वह शपथ-पत्र पर अपने आरोप लगाने को तैयार नहीं, क्योंकि शपथ-पत्र झूठा होने पर 7 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। कुल मिलाकर विपक्ष सर्वाेच्च न्यायालय जा सकता है। संसद को कई दिनों से बाधित कर रख्खा है और तमाम उल्टे सीधे आरोप लगा रहा, पर शपथ-पत्र पर अपनी बात कहने को तैयार नहीं। इसी से समझा जा सकता है कि मुद्दा विहीन विपक्ष के पास ईवीएम के बाद यह दूसरा प्रयोग गढ़ा है।

लेखक – वीरेन्द्र सिंह परिहार

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