राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक : संघ यात्रा के आधार स्तंभ

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भारतवर्ष में 1925 की विजयादशमी को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। तब से आज तक संघ ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन उसके नेतृत्व ने सदैव संगठन को समाज-जीवन के केंद्र में बनाए रखा। संघ के अब तक छह सरसंघचालक हुए हैं, जिन्होंने अलग-अलग कालखंड में संगठन को नई दिशा, शक्ति और ऊर्जा दी।

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (1925–1940) संघ के संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक:
1 अप्रैल 1889 को नागपुर में जन्मे डॉ हेडगेवार जी ने युवावस्था में ही क्रांतिकारी आंदोलनों में भाग लिया। उनका मानना था कि भारत की गुलामी का कारण हिंदू समाज की असंगठित स्थिति है। इसी विचार से उन्होंने संघ की नींव रखी। उन्होंने शाखा पद्धति के माध्यम से अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभक्ति का बीज बोया। 21 जून 1940 को उनका देहावसान हुआ, लेकिन तब तक संघ का बीज अंकुरित होकर एक पौधे का रूप ले चुका था।

द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर “श्रीगुरुजी” (1940–1973) :
19 फरवरी 1906 को जन्मे श्रीगुरुजी का कार्यकाल सबसे लंबा रहा—पूरा 33 वर्ष। उन्होंने संघ को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया। 1947 के विभाजन में लाखों शरणार्थियों की सेवा, 1948 में गांधीजी हत्या के बाद लगे प्रतिबंध का सामना, और सांस्कृतिक राष्ट्र राष्ट्रीयता की अवधारणा को देश में स्थापित करना—ये सब उनके नेतृत्व की ही देन थी। उनकी वाणी में ओज और विचारों में गहराई थी। श्रीगुरुजी ने संगठन को “वटवृक्ष” का रूप प्रदान किया।

तृतीय सरसंघचालक बाला साहेब देवरस (1973–1994):
11 दिसंबर 1915 को जन्मे बाला साहेब का कार्यकाल संघ को समाज के और निकट लाने वाला रहा। उन्होंने सेवा कार्यों पर विशेष बल दिया। वनवासी, दलित और वंचित समाज को संघ की धारा से जोड़ने का अभियान उनके नेतृत्व में तेज हुआ। आपातकाल (1975–77) में संघ के कार्यकर्ताओं ने लोकतंत्र की रक्षा हेतु जेलें भरीं और आंदोलन किए। उन्होंने स्पष्ट कहा—“संघ का कार्य केवल एक वर्ग का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का है।”

चतुर्थ सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह “रज्जू भैया” (1994–2000) :
29 जनवरी 1922 को जन्मे रज्जू भैया मूलतः भौतिकी के प्राध्यापक थे। विद्वता, सौम्यता और आत्मीयता उनके व्यक्तित्व की पहचान थी। 1994 में सरसंघचालक बने तो कार्यकर्ताओं के बीच परिवार जैसा भाव पैदा किया। उनकी कार्यशैली संवादप्रिय थी, वे सरल शब्दों में गहरी बातें समझाने की क्षमता रखते थे। स्वास्थ्य कारणों से 2000 में पद छोड़ दिया, लेकिन संघ कार्यकर्ताओं के हृदय में उनकी आत्मीय स्मृतियाँ आज भी जीवित हैं।

पंचम सरसंघचालक कुप्पाहल्ली सीतारामैया सुदर्शन (2000-2009) :
18 जून 1931 को रायपुर में जन्मे सुदर्शन जी तकनीकी पृष्ठभूमि वाले अभियंता थे। उन्होंने संघ में आधुनिक दृष्टिकोण जोड़ा। स्वदेशी, विज्ञान और अध्यात्म को मिलाकर उन्होंने संगठन को नई दिशा दी। उनका विश्वास था कि भारत की प्रगति तभी संभव है जब हम अपनी संस्कृति, स्वावलंबन और स्वदेशी पर टिके रहें। 2009 में उन्होंने पद त्याग दिया। 15 सितंबर 2012 को उनका निधन हुआ।

षष्ठम सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत : संघ नेतृत्व में नई दिशा (2009- वर्तमान) :
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास भारत की सांस्कृतिक चेतना और संगठनात्मक शक्ति का जीवंत दस्तावेज है। इस इतिहास के वर्तमान अध्याय में सरसंघचालक डॉ. मोहनराव मधुकर राव भागवत का व्यक्तित्व और कृतित्व विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर में जन्मे डॉ. भागवत जी के जीवन की धारा प्रारंभ से ही संघ से जुड़ी रही। उनके पिता मधुकर राव भागवत गुजरात के प्रांत प्रचारक थे और माता मालती जी स्वयं संघकार्य के प्रति समर्पित थीं। पारिवारिक संस्कारों ने उन्हें राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण का पाठ बचपन से ही सिखा दिया। डॉ. भागवत जी ने नागपुर से पशु-चिकित्सा विज्ञान (B.V.Sc. & A.H.) की पढ़ाई की। लेकिन उनका मन जीवन की स्थायी दिशा खोज रहा था। उन्होंने अपने पेशेवर भविष्य को त्यागकर 1977 में पूर्णकालिक प्रचारक बनने का निर्णय लिया। 1975 की आपातकालीन परिस्थितियों में उन्होंने साहस और संगठनात्मक कुशलता से कार्य किया।

प्रचारक जीवन में उन्होंने अकिंचन भाव से कार्य करते हुए संगठन की विभिन्न जिम्मेदारियाँ संभालीं। 1991 में उन्हें संघ का अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख बनाया गया। यह भूमिका निभाते हुए उन्होंने संघ की कार्यपद्धति और विचारधारा को देशभर में नई ऊर्जा के साथ पहुँचाया। 21 मार्च 2009 को वे संघ के छठवे सरसंघचालक बने। उल्लेखनीय है कि वे इस पद पर आसीन होने वाले सबसे युवा सरसंघचालक हैं। डॉ. भागवत जी का नेतृत्व संघ को आधुनिक संदर्भों में प्रासंगिक और सर्वग्राही बनाने का प्रयास है। उन्होंने हमेशा संवाद और समरसता पर बल दिया। जाति, पंथ और भाषा की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर “हम सब हिंदू हैं” का व्यापक संदेश दिया। उनकी सोच केवल परंपरा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने तकनीक, पर्यावरण, महिला सहभागिता, शिक्षा और ग्रामोन्नति जैसे समकालीन विषयों को भी संघ के कार्यक्षेत्र का हिस्सा बनाया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इन छह सरसंघचालकों ने अपने-अपने कालखंड में संगठन को केवल जीवित ही नहीं रखा, बल्कि उसे निरंतर बढ़ाया और समाज में गहराई तक पहुँचाया। डॉ हेडगेवार जी ने बीज बोया, श्रीगुरुजी ने वटवृक्ष बनाया, बालासाहेब देवरस ने उसे समाज से जोड़ा, रज्जू भैया ने आत्मीयता दी, सुदर्शन ने उसे आधुनिक विचारों के साथ जोड़ा और वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत ने उसे विश्व पटल पर आत्मविश्वास, संवाद और व्यापक स्वीकार्यता के साथ स्थापित किया। संघ आज जिस ऊँचाई पर है, उसमें इन छह सरसंघचालकों की दूरदृष्टि और तपस्या का अमूल्य योगदान है।

विनोद कुमार
प्रांत प्रचार प्रमुख

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