1991 की हमारी आर्थिक स्थिती

– प्रशांत पोळ

1991 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव हुए। चुनाव के बीच में ही राजीव गांधी की हत्या हुई। चुनाव के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी। नरसिंहराव, कम्युनिस्ट पार्टी की मदद से प्रधानमंत्री बन गए।

इस मोड़ पर, भारत को खुली अर्थव्यवस्था की दिशा में जाना पड़ा। देश विवश था। आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी। कुछ ही महीने पहले विदेशी मुद्रा का भंडार अपने न्यूनतम स्तर तक पहुंच गया था। विदेशी मुद्रा में तेल, दवाइयां आदि का भुगतान करने के लिए भी पैसे नहीं थे। इसलिए चंद्रशेखर के अगुवाई वाली सरकार ने रिजर्व बैंक के माध्यम से, 400 मिलियन डॉलर जुटाने के लिए, 4 से 18 जुलाई 1991 के बीच बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान के पास 46.91 टन सोना गिरवी रखा था।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे मनहूस दिन थे।

दुनिया के इतर संपन्न देश, हमें गरीब समझकर भीख देने की पेशकश कर रहे थे। हमारा स्वाभिमान मानो हमने गिरवी रखा था।

1991 में हम वैश्विक परिदृश्य में अत्यंत निकृष्ट स्थिति में पहुंच गए थे। आर्थिक मामलों में हम विश्व में नीचे से 17 वें (सत्रहवे) स्थान पर थे । हमारा राजकोषीय घाटा (fiscal deficit) जीडीपी के 8% तक पहुंचा था। हमारा निर्यात न्यूनतम स्तर तक आ गया था।

कुल मिलाकर, नब्बे के दशक के प्रारंभ में, हम बहुत खराब स्थिति में पहुंचे थे। आंकड़ों की बात करें, तो पाकिस्तान और श्रीलंका भी हमसे अच्छी स्थिति में थे। 85 करोड़ जनसंख्या का यह विशाल देश, जिसमें अनेक जबरदस्त प्रतिभाएं छिपी थी, अपने कमजोर, अपरिपक्व और भ्रष्ट नेतृत्व के कारण दर-दर की ठोकरे खा रहा था।

यह नब्बे का दशक, विश्व में उथल-पुथल वाला दशक था। बीसवीं शताब्दी के दो दशकों ने विश्व का इतिहास और भूगोल बदला। एक – चालीस का दशक और दूसरा नब्बे का दशक।

इस नब्बे के दशक में सोवियत संघ का विघटन हुआ। 25 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ का झंडा, मास्को के क्रेमलिन से अंतिम बार उतारा गया और वहां रुस (रशिया) का झंडा फहराया गया। सोवियत संघ के विघटन से 15 राष्ट्र निर्माण हुए। इस घटना ने शीत युद्ध का स्वरूप ही आमूल-चूल बदल दिया। इस बदलाव ने भारत के लिए अनेक नए अवसर निर्माण किये। भारत, सोवियत संघ के मित्र देशों में से था। नए निर्माण हुए राष्ट्र, भारत पर भरोसा करते थे। व्यापार की दृष्टि से भारत के सामने अनगिनत अवसर आ खड़े हुए थे।

किंतु हमारा दुर्भाग्य..!

एक राष्ट्र के रूप में हम स्वतः ही कठिन परिस्थिति में थे। अतः इन अवसरों का लाभ लेने में हम चूक गए।

(इस घटना के लगभग 31 वर्षों के बाद, जब रूस – यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि में, अमेरिका समेत नाटो देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाया, तब भारत ने अमेरिका की परवाह न करते हुए, इसका जबरदस्त लाभ उठाया। रूस से सस्ते में तेल खरीदा, और वह भी रुपए के विनिमय पर, और उसे अच्छी कीमत पर यूरोपियन देशों को बेचा। यह हम कर सके, कारण हमारा नेतृत्व मजबूत था। दूर का देख सकता था।)

इस दशक ने खाड़ी युद्ध भी देखा। सद्दाम हुसैन ने जब कुवैत पर जबरन कब्जा जमा लिया, तब अमेरिका और नाटो देश बड़ी संख्या में सेना लेकर खाड़ी युद्ध में उतरे। अरब राजनीति के अनेक समीकरण इस युद्ध ने बदल दिए।

यह दशक संचार क्रांति का था। माइक्रोसॉफ्ट का उदय और विंडो सिस्टम का प्रादुर्भाव हुआ। इंटरनेट की खोज हुई और इंटरनेट घर-घर पहुंचना प्रारंभ हुआ। जीएसएम के रूप में डिजिटल मोबाइल की शुरुआत हुई। इसी दौरान सैटेलाइट टीवी भी लोगों तक पहुंचने लगा। नब्बे के दशक के प्रारंभ में हुई इन चार घटनाओं ने विश्व का भविष्य बदल दिया। विशेषरूप से इंटरनेट और मोबाइल ने सब कुछ बदल दिया।

इन सब का असर भारत पर पडना था। पडा भी। इन्हीं दिनों हमारी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण और वैश्विक बाजार के दबाव के कारण, हमें खुली अर्थनीति अपनाना पड़ी थी। भारत के लिए यह एक जबरदस्त टर्निंग पॉइंट था। अनेक प्रचंड अवसर इन सब बातों में छिपे थे। हम उनमें से कुछ तो पकड़ सके, किंतु अधिकतम अवसर गवां दिए। आईटी के क्षेत्र में हमारे अभियंताओं ने, डेवलपर्स ने, प्रोग्रामर्स ने अच्छा काम किया। विश्व में अपनी धाक जमाई। किंतु हम मात्र ‘व्हाइट कॉलर मजदूर’ बनकर रह गए। हमने प्रोग्रामर्स और डेवलपर्स की फैक्ट्री खोली। किंतु हम प्रोडक्ट न बना सके। सरकार में उतनी दूरदर्शिता नहीं थी। भारत के उद्यमियों ने भी प्रोग्रामर्स / डेवलपर्स उपलब्ध कराने का सरल रास्ता ही अपनाया। अत्यंत कुशल प्रतिभाएं होने के बाद भी हमारे देश में एक भी माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, ऑरेकल, अमेजॉन, आईबीएम, सिस्को… जैसी कंपनियां खड़ी नहीं हुई। एक अच्छे अवसर को हमने यहां भी छोड़ दिया।

नब्बे का दशक हमारे लिए भारी उथल-पुथल वाला रहा। जहां विश्व के अनेक देश सूचना क्रांति का लाभ लेकर लंबी छलांग मार रहे थे, तब हम स्थिरता और आंतरिक समस्याओं से ही जूझ रहे थे। 1991 से 1996 तक तुलना में स्थिर सरकार रही, किंतु यह सरकार भी किसी के भरोसे से टिकी थी। ऊपर से विश्व बैंक, आईएमएफ जैसी वित्तीय संस्थाओं का दबाव था। हमने हमारी अर्थव्यवस्था मुक्त कर दी, किंतु मुक्त करते समय यह देशी / विदेशी, सभी के लिए मुक्त हो गई। हमारे देश का उद्योग जगत नियंत्रित अर्थव्यवस्था में व्यवसाय करता था। उसे मानो सरकार ने, अचानक विदेश की सधी हुई, शक्तीशाली कंपनियों के सामने प्रतिस्पर्धा के लिए फेंक दिया।

(शिघ्र प्रकाशित ‘इंडिया से भारत : एक प्रवास’ इस पुस्तक के अंश। यह पुस्तक हिंदी के साथ ही मराठी, गुजराती, तेलुगु और अंग्रेजी मे प्रकाशित हो रही हैं।)

प्रशांत पोळ

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