कर्म ही पूजा श्रम ही धर्म 

माँ कर्मा जयंती विशेष

भारतीय संस्कृति में लोकदेवियों और लोकदेवताओं का विशेष महत्व रहा है। ये केवल किसी एक समाज के नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय समाज के प्रेरणा-स्त्रोत होते हैं। ऐसी ही महान लोकदेवी हैं भक्त शिरोमणि माँ कर्मा। कर्मा बाई की जयंती चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को समूचे देश में मनाई जाती है।

“कर्मा जैसी भक्ति कर, खिचड़ी खायें मुरार, छप्पन भोग को त्याग कर, आये भक्त के द्वार।”

माँ कर्मा रोज सुबह उठकर सबसे पहले भगवान मुरार अर्थात् जगन्नाथ प्रभु के लिए खिचड़ी बनाती थी। वे इतनी भोली और भावुक भक्त थीं कि उन्हें विधि-विधान या मंत्रों का ज्ञान नहीं था। वे बस भगवान को पुकारतीं और कहतीं— “प्रभु, आओ और भोग लगाओ।”

उनकी भक्ति इतनी भावप्रबल थी कि स्वयं भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) बालक का रूप धरकर उनके घर आते और बड़े चाव से वह खिचड़ी खाते थे।

एक बार किसी विद्वान संत ने देखा कि कर्मा बाई बिना स्नान किए, बिना शुद्धता के नियमों का पालन किए ही खिचड़ी बनाकर भगवान को खिला रही हैं। उन्होंने कर्मा बाई को डांटा और कहा, “अरी पगली! भगवान को ऐसे भोग नहीं लगता। पहले स्नान करो, पवित्र हो, मंत्र पढ़ो, तब भोग लगाओ।”

अगले दिन कर्मा बाई ने डर के मारे स्नान किया, विधि-विधान में समय लगाया और खिचड़ी बनाने में देर हो गई। उधर पुरी के मंदिर में जब भगवान के भोग का समय हुआ, तो पुजारियों ने देखा कि भगवान की मूर्ति के मुख पर खिचड़ी के कण लगे हुए हैं और भगवान के होंठों पर एक संतोष वाली मुस्कान है। इसके बाद भगवान ने मंदिर के पुजारी को सपने में दर्शन दिए और कहा, “मुझे कर्मा के प्रेम की खिचड़ी भाती है, तुम्हारे सूखे नियमों की नहीं। वह देर से आई तो मैं खुद उसके पास भोजन करने चला गया।”

आज भी पूरी में होने वाली दिव्य जगन्नाथ रथ यात्रा में भगवान का रथ माँ कर्मा के मंदिर के सामने रुकता है व उनकी खिचड़ी खाकर ही आगे बढ़ता है।

इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि ईश्वर को आडंबर, वैभव नहीं, बल्कि सच्चा प्रेम और भक्ति प्रिय होते हैं। माँ कर्मा की यह कथा आज भी लोगों को यह सिखाती है कि श्रद्धा और निष्कपट भाव से किया गया छोटा-सा कार्य भी ईश्वर को प्रिय होता है।

साहू / तैलिक समाज माँ कर्मा को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजता है, परंतु उनके आदर्श समस्त हिंदू समाज के लिए समान रूप से प्रेरणादायी व पूजनीय हैं।

लोककथाओं और जनश्रुतियों के अनुसार उनका जीवन अत्यंत सरल और ईश्वर के प्रति समर्पित था। उन्होंने यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह कर्म, सेवा और समाज के प्रति दायित्व निभाने में प्रकट होती है। उनके नाम में ही “कर्म” शब्द जुड़ा है, जो जीवन में सत्कर्म, श्रम व उद्यम की महत्ता का प्रतीक है।

माँ कर्मा का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि श्रम और स्वाभिमान मनुष्य के सबसे बड़े आभूषण हैं। साहू / तैलिक समाज परंपरागत रूप से परिश्रम, व्यापार और सेवा के लिए जाना जाता है। इस समाज में एक कहावत प्रचलित है-

“तैलिक का तेल और साहू का सौदा, दोनों मेहनत से ही चमकते हैं।”

माँ कर्मा के जीवन में भी यही भाव दिखाई देता है। उन्होंने समाज को सिखाया कि कर्म ही पूजा है और श्रम ही सबसे बड़ा धर्म है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि यदि व्यक्ति अपने कार्य को ईमानदारी और समर्पण से करता है, तो वही उसका सबसे बड़ा साधना-पथ बन जाता है।

माँ कर्मा केवल साहू समाज की देवी नहीं हैं, वे समूचे सनातनी समाज की आराध्य हैं। वे सामाजिक समरसता की भी प्रतीक हैं। उनके जीवन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। यही कारण है कि उनकी जयंती केवल एक समाज का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का पर्व बन गई है।

आज देश के विभिन्न राज्यों जैसे, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र में माँ कर्मा जयंती बड़े उत्साह से मनाई जाती है। यह उत्सव केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सेवा का भी माध्यम है।

साहू समाज में एक और कहावत कही जाती है-

साहू का शुद्ध सच्चा है तौल

तब ही तो है समाज का मोल  

उनकी कथा यह भी सिखाती है कि समाज की शक्ति उसकी एकता में होती है। यदि समाज के लोग आपसी सहयोग, विश्वास और परिश्रम के साथ आगे बढ़ें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता। माँ कर्मा का जीवन इस सत्य का प्रतीक है कि साधारण जीवन जीते हुए भी असाधारण आदर्श स्थापित किए जा सकते हैं।

माँ कर्मा जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह अपने मूल्यों और आदर्शों को स्मरण करने का अवसर है। यह दिन हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में सेवा, परिश्रम और भक्ति को स्थान दें। समाज के युवा वर्ग के लिए यह अवसर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें अपने इतिहास और परंपराओं से जुड़ने का मौका मिलता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि माँ कर्मा के आदर्शों को केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारा जाए। यदि हम उनके संदेश- सत्य, श्रम, भक्ति और समरसता- को अपनाएँ, तो हमारा समाज और राष्ट्र दोनों ही अधिक सशक्त और समृद्ध बन सकते हैं।

लेखक
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी

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