गुरु पूर्णिमा-भगवा ध्वज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

अषाढ़ मास की ‘गुरुपूर्णिमा’ की तिथि हमारी सांस्कृतिक चेतना और विरासत का जीवंत शाश्वत प्रवाह है। जो राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति के सर्वोच्च और सार्वभौमिक सत्य और आदर्श के प्रति श्रद्धा एवं मानवंदना की प्रतीक है। गुरु पूर्णिमा को गुरु पूजन कर हम नतशीश होते हैं और गुरुकृपा का पुण्य लाभ अर्जित करते हैं भारत की इसी परंपरा ने ध्वज विशेषकर भगवा ध्वज को भी अपने गुरु और सर्वोच्च आदर्शों के रूप में माना है। भगवा ध्वज अर्थात् भगवान का ध्वज; इस रूप में हम अपने शाश्वत प्रतीकों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते आ रहे हैं। वैदिक युग से लेकर रामायण और महाभारत के कालखंड से भारतीय राजवंशों की परंपरा में ‘ध्वज’ का अपना विशिष्ट स्थान है। विशेषतया ‘भगवा ध्वज’ (केसरिया) त्याग, तप, तेज और बलिदान के प्रतीक के रूप में भारत की संस्कृति और आदर्शों में रचा बसा हुआ है।

भारतीय संस्कृति के इन्हीं समस्त मानबिंदुओं और सर्वोच्च आदर्शों के आधार पर गठित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2025 की विजयादशमी की तिथि से शताब्दी वर्ष की यात्रा पूर्ण कर लेगा। जोकि आधुनिक विश्व इतिहास में किसी भी सांस्कृतिक संगठन की तत्वनिष्ठ पद्धति के रूप में शोध का विषय है। संघ ने राष्ट्र सर्वोपरि और हिंदू समाज के संगठन का महान व्रत लिया। भारत माता को परम् वैभव संपन्न बनाने के लिए असंख्य स्वयंसेवकों की दीपमालिका तैयार की। जो समाज जीवन के समस्त क्षेत्रों में कार्यरत हैं। गुरु पूर्णिमा और भगवा ध्वज को लेकर संघ की मान्यता को लेकर प्रायः चिंतन मनन होते ही रहते हैं। ऐसे में संघ, भगवा ध्वज, गुरु पूर्णिमा और गुरु दक्षिणा को लेकर संघ की पद्धति क्या है? संघ ने किस प्रकार ये संरचना विकसित की और इसके पीछे क्या कारण हैं? इनके विषय में जानने के लिए— हमें संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार से लेकर द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी और वर्तमान तक संघ की कार्यपद्धति और दृष्टि का सिंहावलोकन करना होगा।

27 सितम्बर 1925 को विजयादशमी की तिथि को हिन्दू समाज को संगठित और सशक्त करने का ध्येय लेकर जन्मजात देशभक्त डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। 10 नवम्बर 1929 को संघ की औपचारिक संरचना के उद्देश्य से उन्हें सरसंघचालक चुना गया। इस प्रकार वे संघ के संस्थापक सरसंघचालक कहलाए। संघ की शुरुआत करने से पूर्व वे स्वतन्त्रता संग्राम के प्रखर क्रान्तिकारी नेता के रूप में भी बहुचर्चित रहे।कांग्रेस में रहने के दौरान क्रान्तिकारी गतिविधियों में शामिल होने के चलते उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। डॉ. हेडगेवार के सम्मुख भारत माता की सेवा का जो भी कार्य आया। उसे उन्होंने अपनी सम्पूर्ण निष्ठा से निभाया। वे उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ – साथ स्वातंत्र्य समर के विभिन्न समूहों के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभा रहे थे। गांधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन के समय भी डॉ हेडगेवार को ‘राज्य समिति के सदस्य’ के रूप में क्रान्तिकारी गतिविधियों में भाग लेने के चलते जेल भी जाना पड़ा था। इतना ही नहीं जब गांधी जी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभाई। आन्दोलन में सहभागिता निभाने के कारण अंग्रेज सरकार ने उन पर देशद्रोह मुकदमा दर्ज कर उन्हें कारावास में बंद कर दिया था। जहां उन्हें 19 अगस्त 1921 को 1 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। जंगल सत्याग्रह के समय भी डॉ हेडगेवार को 9 महीने का कठोर कारावास हुआ। लेकिन जेल की यातनाओं से भी क्रान्तिधर्मी डॉ. हेडगेवार किञ्चित मात्र भी विचलित नहीं हुए। बल्कि उनके अन्दर का राष्ट्रभक्त — राष्ट्रभक्ति की साधना में तपता ही चला गया।
आगे चलकर डॉ. हेडगेवार ने जब 1925 में संघ की शुरुआत की तब उन्होंने घोषणा की थी— “हमारा उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता है, संघ का निर्माण इसी महान लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए हुआ है।”

वैसे 1925 में संघ की विधिवत शुरुआत हो चुकी थी लेकिन स्थायित्व और संगठनात्मक सुव्यवस्था – दृढ़ीकरण को लेकर डॉ. हेडगेवार चिंतन करते रहते थे।चूंकि किसी भी संगठन को चलाने के लिए अर्थ (धन) की आवश्यकता होती है। अतएव संघ के लिए धन कहां से आएगा? आर्थिक अनुशासन के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए। इन समस्त बिन्दुओं पर उन्होंने स्वयंसेवकों से विचार विमर्श किया। किसी ने चंदा लेने, किसी ने दान, किसी ने सदस्यता शुल्क तो किसी ने निजी बचत से संघ कार्य के संचालन का सुझाव दिया। अन्ततः डॉ. हेडगेवार ने ‘गुरु पूजन और समर्पण’ की अपनी संकल्पना प्रस्तुत की। इसके लिए गुरु पूर्णिमा ( व्यास पूर्णिमा ) को चुना गया। तय किया गया कि इसी दिन गुरु के समक्ष सभी स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा के रूप में समर्पण करेंगे। चूंकि डॉ. हेडगेवार ने उस समय स्वयंसेवकों के मध्य यह प्रकट नहीं किया था कि गुरु के रूप में वे किसे स्वीकार कर रहे हैं? इसलिए सभी स्वयंसेवकों के मन में भांति-भांति प्रकार की जिज्ञासा थी। गुरु को लेकर अपनी अपनी कल्पना – परिकल्पना थी। किन्तु जब 1928 में संघ के पहले गुरुपूजन, गुरु पूर्णिमा का अवसर आया तो डॉ. हेडगेवार के भाषण को सुन वहां उपस्थित स्वयंसेवक अचम्भित रह गए। उस दिन सर्वप्रथम उन्होंने कहा था — “गुरु के रूप में हम परम पवित्र भगवा ध्वज का पूजन करेंगे और उसके सामने ही समर्पण करेंगे।”

अर्थात् हेडगेवार ने स्पष्ट रूप से संघ के गुरु के रूप में ‘भगवा’ ध्वज की प्रतिष्ठा की घोषणा कर दी थी‌। उन्होंने संघ के लिए ‘भगवा ध्वज’ को ही गुरु के रूप में क्यों स्वीकार किया। इसके सम्बन्ध में गुरुपूजन के अवसर पर उन्होंने भगवा ध्वज की महत्ता और उसकी ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा पर विस्तार से प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था कि— “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी भी व्यक्ति को गुरु न मानकर परम् पवित्र भगवा ध्वज को ही गुरु मानता है। व्यक्ति कितना भी महान हो फिर भी उसमें अपूर्णता रह सकती है। इसके अतिरिक्त यह नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति सदैव ही अडिग रहेगा। तत्व सदा अटल रहता है। उस तत्व का प्रतीक भगवा ध्वज भी अटल है। इस ध्वज को देखते ही राष्ट्र का सम्पूर्ण इतिहास, संस्कृति और परम्परा हमारी आँखों के सामने आ जाती है। जिस ध्वज को देखकर मन में स्फूर्ति का संचार होता है वह अपना भगवा ध्वज ही अपने तत्व के प्रतीक के नाते हमारे गुरु-स्थान पर है। संघ इसीलिए किसी भी व्यक्ति को गुरु-स्थान पर रखना नहीं चाहता।”

अपने भाषण के उपरान्त सबसे पहले डॉ. हेडगेवार ने स्वयं गुरु पूजन किया। तत्पश्चात वहां उपस्थित स्वयंसेवकों ने भगवा ध्वज की गुरु के रूप में पूजा की और अपना- अपना समर्पण दिया। इस प्रकार वर्ष 1928 में नागपुर में संपन्न हुए गुरु पूर्णिमा- गुरुपूजन उत्सव में स्वयंसेवकों ने 84 रुपए और कुछ आने ही गुरु दक्षिणा के रूप में समर्पण किया। स्पष्टतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में संगठन की शुरुआत करते हुए डॉ. हेडगेवार ने संघ के लिए ‘व्यक्तिनिष्ठ’ के स्थान पर ‘तत्वनिष्ठ’ होने की पद्धति विकसित की। पद नहीं अपितु ‘दायित्व’ की पद्धति को अपनाया।‌

उन्होंने संघ को लेकर जिन मूल संकल्पनाओं एवं व्यवस्थाओं का सूत्रपात किया वे वर्तमान तक अपने उसी स्वरुप में दिखाई देती हैं। संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्री गुरुजी’ से लेकर वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत तक ने गुरु के रूप में ‘भगवा ध्वज’ की महत्ता को बारम्बार उद्धाटित किया है। 23 अगस्त 1966 को पुणे में आयोजित गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्री गुरुजी ने स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा था कि —“हम सब लोग जानते हैं कि हमारे संघ कार्य में हमने किसी व्यक्ति विशेष को गुरु नहीं माना है। शास्त्रों में गुरु की बड़ी महत्ता बतायी गई है। गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना गया है। हमारे ऋषियों ने गुरु के गुण विस्तार से बखाने हैं। अब इतने गुण किसी एक व्यक्ति में पाना कठिन है। किसी व्यक्ति में हम कुछ श्रेष्ठ बातें देख लेते हैं, तो हम उसका आदर करने लगते हैं। परन्तु थोड़े ही दिनों में जब उसके दोष ध्यान में आ जाते हैं तब हमारे मन में अनादर उत्पन्न होता है। कदाचित् हम उसका तिरस्कार ही करने लगते हैं। यह सब घोर अनुचित है। क्योंकि गुरु का त्याग अपने यहाँ बड़ा पाप माना गया है। परन्तु यह सब हो सकता है, क्योंकि मनुष्य मात्र स्खलनशील है। गायत्री मंत्र के निर्माता विश्वामित्र बड़े उग्र तपस्वी और महान द्रष्टा थे। परन्तु उनका भी तो आखिर पतन हुआ।अतः किसी भी व्यक्ति को ऐसा अहंकार नहीं करना चाहिए कि मैं निर्दोष हूँ और परिपूर्ण हूँ। मनुष्य – जीवन की कली खिलकर बड़ा सुंदर और सुगंधी पुष्प विकसित हो जाता है । परन्तु पता नहीं कैसे और कहाँ से उसमें कीड़ा लग जाता है।अतः जब तक जीवन पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक उसका मूल्यांकन नहीं किया जाता । इसलिये संघ कार्य में उचित समझा गया है कि हम भावना, चिन्ह, लक्षण या प्रतीक को गुरु मानें। हमने संघ कार्य के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र के पुनर्निर्माण का संकल्प किया है। समाज के सव व्यक्तियों के गुणों तथा शक्तियों को हमें एकत्र करना है।इस ध्येय की सतत् प्रेरणा देने वाले गुरु की हमें आवश्यकता थी।”

संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी गुरु दक्षिणा और भगवा ध्वज की महानता के सन्दर्भ में अपने उद्बोधनों के माध्यम से उन्हीं विचारों को प्रकट करते हैं। विज्ञान भवन नई दिल्ली में आयोजित ‘भविष्य का भारत ‘ व्याख्यानमाला कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था— “हमारा संघ स्वावलंबी है। जो खर्चा करना पड़ता है वो हम ही जुटाते हैं। हम संघ का काम चलाने के लिए एक पाई भी बाहर से नहीं लेते। किसी ने लाकर दी तो हम लौटा देते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयंसेवकों की गुरुदक्षिणा पर चलता है। साल में एक बार भगवा ध्वज को गुरु मानकर उसकी पूजा में दक्षिणा समर्पित करते हैं। भगवा ध्वज गुरु क्यों, क्योंकि वह अपनी तब से आज तक की परम्परा का चिह्न है। जब-जब हमारे इतिहास का विषय आता है, ये भगवा झंडा कहीं न कहीं रहता है।”

डॉ. हेडगेवार ने जब संघ के संचालन के लिए आदर्श और प्रतीक चुने तो व्यक्ति को नहीं बल्कि विचारों को चुना। इसके लिए उन्होंने भारत के स्वर्णिम अतीत को आत्मसात करने का दिग्दर्शन प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति के शाश्वत प्रतीक द्वय — ‘भगवा ध्वज’ और ‘भारत माता की जय’ के घोष को केन्द्र में रखा और संघ कार्य प्रारम्भ किया। अभिप्रायत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत की महान परंपरा और संस्कृति के महान आदर्शों को आत्मसात किया।श्रेष्ठ मूल्यों और विचार दृष्टि के साथ संघ की कार्यपद्धति विकसित की। राष्ट्रीयता के मूल्यों के आलोक में समाज का संगठन करते हुए सर्जनात्मकता का वृहद वातावरण निर्मित किया। जो संजीवनी शक्ति के तौर पर स्वयंसेवकों के आचरणों और संघ कार्य में स्पष्ट दिखाई देता है। संघ में ‘गुरु’ के रूप में ‘भगवा ध्वज’ की प्रतिष्ठा — तत्व निष्ठा के सर्वश्रेष्ठ -सर्वोच्च प्रतिमान के रूप में दिखाई देती है। यह डॉ. हेडगेवार की उसी दूरदृष्टि का सुफल है कि अपनी ‘तत्व निष्ठा’ के चलते ही संघ अपने विविध अनुषांगिक संगठनों के साथ वृहद स्वरूप ले पाया है। साथ ही समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में संघ और उसके स्वयंसेवक अपने-अपने कार्यों एवं विचारों से अमिट छाप छोड़ने में सफल हो रहे हैं। डॉ हेडगेवार और श्री गुरुजी का विशद् दृष्टि का अनुकरण करते हुए समस्त क्षेत्रों में अपनी कर्त्तव्याहुति समर्पित कर रहे हैं।‌लेकिन इसमें कहीं भी ‘अहं’ नहीं है बल्कि ‘वयं’ और ‘मैं नहीं तू’ की उदात्त भावना है। जो ‘कर्ता भाव’ के साथ राष्ट्रीयता के संस्कारों की दिव्य ज्योति को घर-घर तक पहुंचाने के लिए कृतसंकल्पित है।

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
(साहित्यकार, स्तम्भकार एवं पत्रकार)

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