स्टैनफोर्ड में दत्तात्रेय जी का व्याख्यान
केलिफोर्निया की तीन स्थानीय कहावतें और वहाँ के तीन प्रमुख नगर, इनसे हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले के अमेरिका प्रवास को और विशेषतः स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में दिए व्याख्यान को संबद्ध कर सकते हैं।
पहली कहावत: “Disrupt or be disrupted.”“या तो बदलाव लाओ, या खुद बदलाव का शिकार बनो।” दूजी: “The best way to predict the future is to invent it.” “भविष्य को जानने का सबसे अच्छा तरीका है, उसे स्वयं बनाना।” तीजी कहावत है,“If you’re not embarrassed by your first product, you launched too late.” “यदि आपको अपने पहले प्रयास पर झिझक नहीं हुई, तो आपने बहुत देर कर दी।
इन तीन केलिफोर्नियन कहावतों और तीन केलिफोर्नियन नगर – सेक्रामेंटो, लास एंजेलिस और स्टैफोर्ड की चर्चित विशेषताओं और कैलोफोर्नियन राजमुद्रा के साथ हम संघ के कार्यप्रमुख के अमेरिका प्रवास को जोड़ सकते हैं। कहावतें स्पष्ट हैं। तीन नगर राजधानी सेक्रामेंटो, लास एंजेलिस और स्टैनफोर्ड की चारित्रिक विशेषताएँ भी बड़ी ही प्रसिद्ध, विरोधाभासी व चर्चित हैं। इन त्रि नगरीय विशेषताओं में संघ विचार की केलिफोर्निया में चर्चा भी बड़ी ही प्रासंगिक है।
संघ शताब्दी वर्ष में हम दत्तात्रेय जी के व्याख्यान की चर्चा करते समय केलिफोर्नियन राजमोहर पर अंकित रोमन देवी मिनर्वा के चित्र और लिखे हुए एक शब्द ‘यूरेका’ (अरे वाह, मैंने पा लिया) की चर्चा भी प्रासंगिक लगती है।
संघ के शताब्दी वर्ष में वैश्विक प्रवास अंतर्गत, तीन देशों जर्मनी, इंग्लैंड और केलिफोर्निया (अमेरिका) में संघ नेतृत्व के ये प्रवास बहुत से प्रतीक व एक बड़े नरेटिव को निर्मित करते हैं।
स्टैनफोर्ड विवि के थ्राइव सम्मेलन, 2026 में, आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले ने “विज्ञान, ज्ञान-प्रणालियाँ एवं सभ्यतागत नेतृत्व” पर भाषण में भारतीय अवधारणाओं के वैश्विक अभिमुख को प्रमुखता दी। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय, नैतिक तकनीक, प्रकृति के सम्मान और भारतीय शिक्षा प्रणाली में प्राविवेक (wisdom) की भूमिका को प्रखरता से उच्चारा। उन्होंने कहा कि विवेकहीन ज्ञान अहंकार और दंभ को जन्म देता है, जबकि विवेकयुक्त ज्ञान ही वास्तविक कल्याणकारी होता है। यह विचार आज के “डेटा-ड्रिवन” युग में अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ जानकारी की अधिकता है, परंतु उसके सही उपयोग के लिए आवश्यक नैतिक मार्गदर्शन का अभाव दिखाई देता है।
स्टैनफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में ‘थ्राइव 2026’ सम्मेलन में विज्ञान और अध्यात्म के संगम पर अपनी बात कहते समय उन्होंने उन्होंने दृढ़ता से भारत को व्यक्त किया कि – “ innovation के साथ wisdom भी परम आवश्यक है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इस युग में भारतीय प्राचीन ज्ञान की प्रासंगिकता, सटीकता व स्थायित्व की चर्चा व उसकी चिरंतन उपयोगिता को स्थापित करना वर्तमान समय में आवश्यक दुस्साहस है। विज्ञान और सभ्यता के मूल्यों की संयुक्त स्थापना हेतु वैश्विक स्तर पर प्रयासरत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से दिया गया यह संभाषण, विवेकानंद जी के ‘शिकागो संभाषण’ का ही एक समयानुरूप आंशिक वाचन है।
नोबेल लारेट प्रो. स्टीवन चू और पूर्व अमेरिकी सुरक्षा सलाहकार एचआर मैकमास्टर, गूगल के बोर्ड डायरेक्टर श्रीराम जी, वैश्विक निवेशक विनोद खोसला जैसे दिग्गजों की उपस्थिति में दत्तात्रेय जी का यह व्याख्यान भारतीय मान्यताओं का ‘वैश्विक चार्टर’ है।
आधुनिक वैज्ञानिक चेतना और भारतीय सभ्यता की समग्र दृष्टि के बीच सेतु है। यह व्याख्यान। “विज्ञान, ज्ञान-प्रणालियाँ एवं सभ्यतागत नेतृत्व” विषय पर यह व्याख्यान ऐसे स्थान पर दिया गया, जो स्वयं नवाचार, प्रयोग और वैश्विक नेतृत्व का प्रतीक है। होसबले जी का सिलिकॉन वैली में भारतीय संस्कृति, दृष्टि, ज्ञान संचय का उल्लेख कोई नव प्रयोग नहीं है। यह हमारा पीढ़ीगत युगीन दायित्व व क्रम रहा है जिसे आरएसएस ने व्यक्त किया है।
होसबले जी ने कहा कि “भारतीय परंपरा में विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हैं। उपनिषद जैसे ग्रंथ इस समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जहाँ मानव चेतना, प्रकृति और ब्रह्माण्ड के संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है।”
हमारे तो डीएनए में ही स्टार्टअप संस्कृति रही है। मुस्लिमों के आक्रमण के पूर्व हमारे बत्तीस प्रतिशत वैश्विक उत्पादन में योगदान से अधिक तेज और बड़ा भला क्या हो सकता था?! होसबले जी के अनुसार, यदि इस “तेजी” में विवेक और नैतिकता का समावेश न हो, तो प्रगति असंतुलित हो सकती है। भारतीय परंपरा “धीरे चलो, पर सही दिशा में चलो” की चेतना भी देती है, ताकि विकास और संतुलन साथ-साथ चलें।
भाषण में स्पष्ट किया गया कि विदेशी आक्रमणों और परतंत्रता के कारण भारतीय ज्ञान-परंपराओं को गहरी क्षति पहुँची। यह ऐतिहासिक संदर्भ केवल अतीत का वर्णन नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए भी एक चेतावनी है।
आज जब भारत अपनी ज्ञान-परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है, तब उसे वैश्विक मंचों पर प्रस्तुत करना आवश्यक हो जाता है और स्टैनफोर्ड जैसा मंच इसके लिए आदर्श है।
भारत की चिरंतन गति, मति, चिति, गीति, गेयता को ही आज विश्व एल्गोरिद्म कह रहा है। होसबले जी ने विधिक ढाँचे, वैज्ञानिक प्रणालियों को मनुष्य जीवन, जीविका और कल्याण के लिए कार्यरत रहने को ही ‘मानवीय एल्गोरिद्म’ बताया। स्टैनफोर्ड में हमने बताया कि मनुष्य इन मशीनी, तकनीकी प्रणालियों का दास नहीं अपितु नियंता बने यह ही हमारे मानवीय एल्गोरिद्म का मूल तत्व है।
ज्ञान के लोकतंत्रीकरण पर भी उन्होंने विशेष बल दिया। यह केलिफोर्नियन कहावत
“Information wants to be free.”
“सूचना स्वतंत्र होना चाहती है” को संपूर्णतः व्यक्त करता है। ज्ञान का समान वितरण अब एक चुनौती है। तकनीकी प्रगति के बावजूद, समाज का एक बड़ा वर्ग शिक्षा और संसाधनों से वंचित है। होसबले जी ने अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी, पर्यावरण और नीतिशास्त्र की चिरकालीन प्रासंगिकता को प्रौद्योगिकी में स्थायित्व देने के भाव प्रतीक रूप में कहे।
संघ शताब्दी वर्ष में ‘स्टैनफोर्ड संभाषण’ जहाँ दार्शनिकता है वहीं “Go where the opportunities are” के संदर्भ में यह भी संदेश था कि जहाँ जाओ ‘स्व’ के संग जाओ। ‘स्व’ को तजना वैश्विकता को तजने सदृश ही होता है।
स्टैनफोर्ड विवि, जिसे नवाचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्टार्टअप संस्कृति और वैज्ञानिक शोध का वैश्विक केंद्र माना जाता है, वहाँ भारतीय सभ्यता की समन्वित ज्ञान दृष्टि का प्रस्तुत होना अपने आप में एक वृहद प्रतीकात्मक महत्व रखता है। एक ओर यह स्थान आधुनिक विज्ञान की तीव्रतम प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है, तो दूसरी ओर होसबले जी का वक्तव्य उस परंपरा को सामने लाता है जहाँ विज्ञान और अध्यात्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो आयाम हैं। यही वह बिंदु है जहाँ स्थान और संदेश का गहरा अंतरसंबंध स्थापित होता है।
आध्यात्मिक और वैज्ञानिक ज्ञान के मध्य कोई कृत्रिम विभाजन नहीं है। उपनिषदों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि ये केवल धार्मिक लेखन नहीं, अपितु मानव चेतना, शरीर-रचना, मनोविज्ञान और अस्तित्व के गूढ़ प्रश्नों पर गहन वैज्ञानिक विमर्श है।
अमेरिकी मंच से संघ ने यह भी व्यक्त किया कि “विदेशी आक्रमणों और दीर्घकालीन परतंत्रता के कारण भारतीय ज्ञान-परंपराएँ क्षतिग्रस्त हुईं और उनका वैज्ञानिक पक्ष उपेक्षित रह गया। यह तथ्य केवल अतीत की पीड़ा का वर्णन नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक चेतावनी भी है कि यदि ज्ञान का संरक्षण और पुनर्पाठ नहीं किया गया, तो सभ्यतागत विरासत विस्मृति में खो सकती है। आज भारत में नई शिक्षा नीति व भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से इस ज्ञान को पुनर्जीवित करने का प्रयास उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नोलॉजी, डिजिटल अर्थव्यवस्था आदि समूचे विश्व को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में यदि इन तकनीकों के विकास में भारतीय परंपरा की ‘प्रकृति के साथ संतुलन’ एवं ‘ज्ञान के लोकतंत्रीकरण’ की अवधारणा को शामिल किया जाए, तो यह वैश्विक स्तर पर स्थायी विकास (sustainable development) का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। विज्ञान और अध्यात्म के मध्य अनिवार्य पुरकता के भारतीय तथ्य को स्वीकारना ही होगा।
दत्तात्रेय जी द्वारा अमेरिका में व्यक्त यह व्याख्यान ऐसे समय में आया है जब विश्व नई दिशा की खोज में है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय का मंच और भारतीय सभ्यता की समग्र ज्ञान दृष्टि: इन दोनों का संगम एक नई वैश्विक चेतना की ओर संकेत करता है। यदि इस संवाद को आगे बढ़ाया जाए, तो यह न केवल भारत के लिए, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए एक संतुलित, समावेशी और टिकाऊ भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

