राष्ट्र निर्माण में संगठन, संस्कार और समाज की भूमिका : सुरेश सोनी

जबलपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी, अभिकल्पन एवं विनिर्माण संस्थान जबलपुर में राष्ट्रीय उच्च शिक्षण संस्थान श्रेणी की एक प्रमुख जनगोष्ठी का भव्य आयोजन संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक गरिमा के साथ भारत माता की पूजा-अर्चना एवं वंदे मातरम के सामूहिक गायन से हुआ।
प्रमुख जन गोष्ठी के मुख्य वक्ता अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश जी सोनी रहे और विभाग संघचालक कैलाश गुप्ता की विशेष उपस्थिति रही।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता सुरेश जी सोनी ने राष्ट्र निर्माण, समाज परिवर्तन और संगठन की भूमिका पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता केवल एक घटना नहीं, बल्कि दीर्घकालीन संघर्ष और सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।

स्वतंत्रता संग्राम: विविध प्रयासों का संगम
अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए नरम और गरम दोनों मार्गों से प्रयास हुए। असंख्य देशभक्तों ने बलिदान दिया और 1857 से लेकर 1947 तक निरंतर संघर्ष चलता रहा।
उन्होंने बताया कि कांग्रेस ने स्वदेशी आंदोलन, जनजागरण और संगठन के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं सशस्त्र क्रांतिकारियों और आज़ाद हिंद फौज ने भी अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। इसके साथ ही समाज सुधार के कार्य भी समानांतर रूप से चलते रहे।

डॉ. हेडगेवार का संगठनात्मक दृष्टिकोण
उन्होंने कहा कि केशव बलिराम हेडगेवार ने समाज को संगठित करने के लिए चारों दिशाओं में कार्य प्रारंभ किया।
1920 के कांग्रेस अधिवेशन के बाद उन्होंने भारतीय संस्कृति के संरक्षण और समाज की मूल समस्याओं को दूर करने का संकल्प लिया। उनका मानना था कि व्यक्ति निर्माण ही राष्ट्र निर्माण का आधार है।

समाज के सामने चुनौतियाँ
मुख्य वक्ता ने कहा कि भारत को एकता स्थापित करने में हजारों वर्ष लगे हैं।
आज भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई चुनौतियाँ मौजूद हैं, जिनका सामना करने के लिए समाज का संगठित होना आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि असंगठित समाज को कोई भी परास्त कर सकता है।

स्वामी विवेकानंद का प्रेरक दृष्टिकोण
उन्होंने स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि विवेकानंद ने भारत भ्रमण कर समाज की वास्तविक स्थिति को समझा और व्यक्ति निर्माण व समरसता पर विशेष बल दिया।

संगठन और शाखा की भूमिका
उन्होंने बताया कि व्यक्ति निर्माण दैनिक साधना से संभव है, जिसके लिए शाखा पद्धति विकसित की गई।
छोटे-छोटे कार्यक्रमों के माध्यम से समाज को जोड़ने का प्रयास किया गया, जो आज व्यापक सामाजिक परिवर्तन का आधार बन चुका है।

सामाजिक आंदोलनों का प्रभाव
उन्होंने कहा कि राम मंदिर आंदोलन जैसे अभियानों ने समाज को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संगठन का उद्देश्य ऐसा वातावरण बनाना है, जहां समाज स्वयं सक्षम और स्वावलंबी बन जाए। उन्होंने निस्वार्थ सेवा और कर्तव्यनिष्ठा को समाज कार्य का मूल बताया।

समाज परिवर्तन के सिद्धांत
मुख्य वक्ता ने कहा कि समाज को अपनी संस्कृति, संस्कार और भाषा के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने जोर दिया कि भाषा और जीवनशैली समाज के विचारों को दिशा देती है और अपनी पहचान बनाए रखना आवश्यक है।

पंच परिवर्तन: सामाजिक सुधार की दिशा
उन्होंने समाज में व्यापक परिवर्तन के लिए पाँच प्रमुख बिंदु बताए—
1.परिवार सशक्तिकरण – परिवार संस्था को मजबूत करना, एकल परिवार (Single Parent) की बढ़ती प्रवृत्ति पर विचार
2. सामाजिक समरसता – जाति, वर्ग, भेदभाव समाप्त कर समानता स्थापित करना
3. पर्यावरण संरक्षण – जीवन और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना
4. स्वदेशी जीवन शैली – भारतीय जीवन मूल्यों और परंपराओं को अपनाना
5. नागरिक कर्तव्य बोध – राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी निभाना
इन बिंदुओं के माध्यम से समाज को मजबूत और संगठित बनाया जा सकता है।

युवा और शिक्षा की भूमिका
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के तहत नवाचार और अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन केवल डिग्री प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। युवाओं को चरित्रवान और जिम्मेदार नागरिक बनना होगा।

अपने उद्बोधन के अंत में उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण का आधार व्यक्ति निर्माण, संस्कार और संगठन शक्ति है।
जब समाज संगठित, समरस और जागरूक होगा, तभी भारत एक सशक्त और विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व में अग्रणी स्थान प्राप्त करेगा। गोष्ठी में शिक्षाविदों, प्रबुद्धजनों, विद्यार्थियों सहित समाज के विभिन्न वर्गों की उपस्थिति रही।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *