आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो स्वयंसेवक- परशुराम और सोमनाथ के साथ ऐसी बर्बरता हुई कि उन दोनों का निधन जेल में हो गया। बीमार होने के बाद भी दोनों को दवाई और रिहाई नहीं मिली
आपातकाल के नाम पर संविधान और लोकतंत्र की हत्या कर 25 जून, 1975 को भारत में श्रीमती इंदिरा गांधी और कांग्रेस ने तानाशाही तंत्र के परिप्रेक्ष्य में आतंक का राज्य स्थापित किया कर लिया था, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी हत्या का भरपूर प्रयास किया गया, परंतु यह संभव न हो सका।
आतंक के राज्य के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत का द्वितीय स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और इसमें अपनी पूर्णाहुति दी। आंतक के राज्य की 50वीं बरसी में महाकौशल प्रांत के दो स्वयंसेवकों की याद आते ही आंखें नम हो जाती हैं, क्योंकि दोनो को आपातकाल में जबरिया गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया और अत्याचार की पराकाष्ठा तब हुई जब दोनों के बीमार पड़ने पर, उन्हें न मुक्त किया गया और न ही इलाज दिया गया। दोनों स्वयंसेवक तड़फ तड़फ के पंचतत्व को प्राप्त हुए।
परशुराम के साथ पशुता :
परशुराम रजक जबलपुर के निकट कटंगी के निवासी थे। वे संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक और भारतीय जनसंघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे। सामान्य श्रमिक जीवन जीने वाले परशुराम को धारा 151 के अंतर्गत गिरफ्तार कर जबलपुर केंद्रीय कारागार में भेजा गया। वे अत्यंत बीमार थे, उन्हें दमा था। चलने की स्थिति में नहीं थे, फिर भी उन्हें हथकड़ियों में जंजीरों से बांधकर पेशियों में ले जाया जाता था। बीमारी बढ़ने पर उन्हें जेल अस्पताल में भर्ती किया गया, लेकिन वहां दवाओं का इंतज़ाम कैदियों को खुद करना होता था।
गरीब परशुराम यह कैसे कर पाते? इलाज की लापरवाही और उपेक्षा ने उनकी स्थिति और बिगाड़ दी। जब पीड़ा असह्य हो गई, तो उन्होंने दवाइयों के लिए फिर गुहार लगाई। 10 अगस्त को उन्हें पुनः अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वही लापरवाही बरती गई। 17 अगस्त की रात उनकी हालत अत्यंत गंभीर हो गई। कंपाउंडर ने उन्हें अक्षम्य ढंग से इलाज दिया। जब वे दर्द से तड़पते हुए अपनी पीड़ा बताने लगे, तब कंपाउंडर ने वार्ड में ही झिड़ककर चुप कराया और उपचार में घोर लापरवाही बरती। परिणामस्वरूप, 18 अगस्त की सुबह परशुराम बैरक में मृत पाए गए। यह न सिर्फ एक मौत थी, यह उस शासन की संवेदनहीनता का जीता-जागता प्रमाण था।
परशुराम रजक अत्यंत बीमार थे। वे चलने की स्थिति में नहीं थे, फिर भी उन्हें हथकड़ियों में जंजीरों से बांधकर पेशियों में ले जाया जाता था। बीमारी बढ़ने पर उन्हें जेल अस्पताल में भर्ती किया गया, लेकिन वहां दवाओं का इंतज़ाम कैदियों को खुद करना होता था। गरीब परशुराम यह कैसे कर पाते?
सोमनाथ हेडाऊ का बलिदान :
19 वर्षीय सोमनाथ हेडाऊ, सिवनी जिले के निवासी और बी. काम. के छात्र थे। वे संघ की शाखा में मुख्य शिक्षक थे। तदुपरांत जनसंघ के कर्मठ कार्यकर्ता भी बने। 10 अगस्त, 1975 को पुलिस ने उन्हें भी उनके साथियों सहित गिरफ्तार कर जेल भेजा। एक रात वे पीठ और गर्दन में तीव्र पीड़ा की शिकायत करने लगे। उनका साथी डॉक्टर गौतम तुरंत उन्हें देखने आया और स्पष्ट कहा कि यह टेटनस (धनुर्वात) के लक्षण हैं, जिन्हें शीघ्र बाहर अस्पताल ले जाना चाहिए। इसके बावजूद उन्हें समय पर अस्पताल नहीं भेजा गया। जब भेजा भी गया, तो स्ट्रेचर तक की व्यवस्था नहीं की गई। कड़ी धूप में उन्हें स्ट्रेचर पर यूं ही छोड़ दिया गया, जबकि टेटनस रोगी को झटका और प्रकाश से बचाना आवश्यक होता है।
सोमनाथ के पिता शिवदयाल हेडाऊ को अस्पताल आने से रोका गया। जब वे किसी तरह भीतर पहुंचे तो पुत्र को अचेतावस्था में देखकर रो पड़े। डॉक्टर ने दवा की पर्ची थमा दी, लेकिन जब वे दवा लेकर लौटे, तब तक पुलिस ने उन्हें भी थाने बुला लिया और रात भर थाने में कैद रखा।
जब उन्हें न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, तब कहा गया कि 1000 रु. के निजी मुचलके पर छोड़ा जा रहा है। इसके बाद जब वे पुनः अस्पताल पहुंचे तो देखा कि सोमनाथ का मुंह खून से भरा था। हालत लगातार बिगड़ती रही और अंततः 9 अप्रैल, 1976 की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी मौत के बाद ही अस्पताल से उनकी रिहाई के आदेश की प्रति मिली, जो उनके सिरहाने दबाई हुई पाई गई। एक स्पष्ट संदेश- उन्हें जीवित रिहा करने की कोई मंशा ही नहीं थी।
लेखक : डॉ. आनंद सिंह राणा
