भोजशाला फैसला: पाँच आधारों पर मुस्लिम पक्ष को नहीं मिली राहत

उच्च न्यायालय · भोजशाला निर्णय

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने 15 मई 2026 को धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष की सभी याचिकाएँ खारिज करते हुए पाँच स्वतंत्र आधारों पर निर्णय दिया। यह निर्णय WP No. 10497/2022 तथा अन्य संबद्ध याचिकाओं पर आया, जिनमें से प्रमुख थीं — मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की WP No. 28334/2019 और काजी जाकउल्लाह की WA No. 559/2026।

    1. 1935 का ऐलान  असंवैधानिक

    मुस्लिम पक्ष ने अपने दावे की बुनियाद धार रियासत के शासक द्वारा 24 अगस्त 1935 को जारी ‘ऐलान’ पर रखी थी। इस ऐलान में भोजशाला परिसर को मस्जिद घोषित करते हुए वहाँ नमाज़ का अधिकार दिया गया था। मुस्लिम पक्ष का तर्क था कि यह ऐलान Government of India Act, 1935 की धारा 82 के अंतर्गत जारी किया गया था, इसलिए कानूनी रूप से वैध है।

    न्यायालय ने इस तर्क को सिरे से अस्वीकार कर दिया। पैरा [184] में न्यायालय ने पाया कि Government of India Act, 1935 स्वयं 1 अप्रैल 1937 को लागू हुआ था — अर्थात जब ऐलान जारी किया गया, उस समय यह कानून अस्तित्व में ही नहीं था। इसके अतिरिक्त, पैरा [186] में न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भोजशाला परिसर Ancient Monuments Preservation Act, 1904 के अंतर्गत 18 मार्च 1904 से ही एक संरक्षित स्मारक था। इसलिए धार रियासत के शासक को उस पर कोई आदेश जारी करने का कोई अधिकार नहीं था।

    पैरा [187] में न्यायालय का निष्कर्ष था —

    “For a pre-Constitution instrument to survive it must possess legislative character, emanate from lawful legislative authority and must satisfy the requirements of Article 365 and 372 of the Constitution. The 1935 order (Ailan) was merely an executive or administrative arrangement and not a legislative enactment.”

    2. मस्जिद का निर्माण 1034 AD के बाद
    मुस्लिम पक्ष ने ऐतिहासिक साहित्य के रूप में ‘सूफ़ीवाद’ (लेखक: पीर्भा श्रीनिवासुलु, प्रकाशक: म.प्र. हिंदी ग्रंथ अकादमी) और एम. डब्ल्यू. खान की पुस्तक (अंजुमन जि़ला धार, 1964) प्रस्तुत की। इन दोनों पुस्तकों में लिखा है कि हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती ने 1305-1307 AD में मस्जिद की नींव रखी।

      न्यायालय ने इसी सामग्री को मुस्लिम पक्ष के विरुद्ध प्रयोग किया। पैरा [190] में कहा गया —

      “None of the material relied by them shows that the disputed area which is claimed to be a mosque was constructed prior to 1034 AD. Thus, the historical material, literature and the notifications placed by the respondent No.8 and the appellant itself established that the said mosque was constructed after 1034 AD.”

      अर्थात मुस्लिम पक्ष की अपनी सामग्री ही यह सिद्ध करती है कि भोजशाला का निर्माण 1034 AD में राजा भोज ने किया था और वहाँ देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर था।

      3. वक्फ का कोई साक्ष्य नहीं
      मुस्लिम विधि के अनुसार, वक्फ तभी वैध होता है जब संपत्ति का स्वामी स्वेच्छा से उसे अल्लाह को समर्पित करे। न्यायालय ने पाया कि विवादित भूमि (खसरा नं. 604, पुराना नं. 313) के वक्फ में समर्पित होने का कोई भी साक्ष्य अभिलेखों में उपलब्ध नहीं है।

      पैरा [192] में न्यायालय का स्पष्ट निष्कर्ष था —

      “No material suggests that the part of the land No.604 (Old No.313) is a Waqf property and the same was dedicated or could be dedicated to Waqf… there can be no presumption regarding existence of a mosque in the disputed area which is prima facie established to be constructed as Bhojshala and temple of goddess Vagdevi (Saraswati) in 1034 AD.”

      4. ASI वैज्ञानिक सर्वेक्षण: पूर्ववर्ती मंदिर संरचना सिद्ध
      न्यायालय के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 22 मार्च 2024 से एक बहु-विषयक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण में GPR (ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार), GPS मैपिंग, स्तरविज्ञान (Stratigraphy), XRF संरचना-विश्लेषण, पुरालेख (Epigraphy) तथा मानक पुरातत्व पद्धतियाँ अपनाई गईं। 10 खंडों में विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई और सर्वेक्षण के दौरान दोनों पक्षों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

        सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार रहे:

        • वर्तमान संरचना एक पूर्ववर्ती विशाल संरचना के ऊपर बनाई गई है जो पारमार काल (10वीं-11वीं शताब्दी) की है।
        • कुल 94 मूर्तियाँ एवं खंड प्राप्त हुए जिनमें गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह, भैरव, सूर्य, पशु एवं मानव आकृतियाँ शामिल हैं। मस्जिद में मानव व पशु मूर्तियाँ वर्जित होती हैं; अनेक स्थानों पर इन्हें जानबूझकर खंडित किया गया था।
        • 150 से अधिक संस्कृत एवं प्राकृत अभिलेख मिले जो पारमार राजाओं के काल से संबंधित हैं।
        • 15वीं शताब्दी के खिलजी काल का एक अभिलेख (Mahmud Shah, AH 859 / 1455 CE) प्रत्यक्ष रूप से मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित किए जाने का उल्लेख करता है।

        पैरा [208] में न्यायालय ने ASI रिपोर्ट का मूल्यांकन करते हुए कहा —

        “Scientific survey conclusively shows the existence of pre-existing temple structure, later conversion/modification. The Court must rely on Scientific archaeological evidence and not on speculative historical narratives.”

        5. हिंदू पूजन की निरंतरता और मंदिर के धार्मिक चरित्र की स्थायिता
        न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या निर्णय (M. Siddiq Thr. Lrs. v. Mahant Suresh Das) में प्रतिपादित 10 सिद्धांतों को इस प्रकरण पर लागू किया। उनमें से एक प्रमुख सिद्धांत यह था कि प्राण-प्रतिष्ठा के बाद किसी मंदिर का धार्मिक चरित्र सदा के लिए स्थापित हो जाता है — चाहे मूर्ति हटाई जाए या संरचना तोड़ी जाए। पैरा [206] में इस सिद्धांत को स्वीकार किया गया।

          पैरा [210] में न्यायालय का अंतिम ऐतिहासिक निष्कर्ष था —

          “…the character of the disputed area was Bhojshala as a Centre of Sanskrit learning associated with Raja Bhoj of Parmar dynasty and the literature and architectural reference including those connected with the period of Raja Bhoj indicate the existence of temple dedicated to the goddess Saraswati at Dhar.”

          न्यायालय का अंतिम आदेश
          हिंदू पक्ष की याचिकाएँ (WP No. 10497/2022 और WP No. 10484/2022) स्वीकार करते हुए न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश दिए —
          (i) विवादित क्षेत्र 18 मार्च 1904 से Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958 के अंतर्गत संरक्षित स्मारक है।
          (ii) भोजशाला परिसर का धार्मिक चरित्र देवी वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर के रूप में घोषित किया जाता है।
          (iii) ASI का 7.4.2003 का वह आदेश, जिसमें हिंदुओं की पूजा पर प्रतिबंध और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज़ की अनुमति थी, निरस्त किया जाता है।
          (iv) ASI भोजशाला मंदिर के संरक्षण, प्रबंधन एवं धार्मिक पहुँच के नियमन पर पूर्ण पर्यवेक्षण नियंत्रण बनाए रखेगा।
          (v) केंद्र सरकार लंदन म्यूज़ियम से देवी सरस्वती की प्रतिमा वापस लाने संबंधी प्रतिवेदनों पर विचार कर सकती है।
          (vi) यदि मुस्लिम समाज धार जिले में नई मस्जिद हेतु भूमि आवंटन का आवेदन करे, तो राज्य सरकार उस पर विधि के अनुसार विचार करे।

          मुस्लिम पक्ष की दोनों याचिकाएँ — WP No. 28334/2019 (मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी) और WA No. 559/2026 (काजी जाकउल्लाह एवं अन्य) — खारिज कर दी गईं। पैरा [212] में न्यायालय ने कहा —

          “WP No.8986/2026 filed by Salek Chand Jain is hereby dismissed. WP No.28334/2019 filed by Maulana Kamaluddin Welfare Society through its President Abdul Samad Khan… and WA No.559/2026 filed by Qazi Zakullah & Ors. are also dismissed. No order as to costs.”

          इस निर्णय का महत्व केवल धार के भोजशाला तक सीमित नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह प्रकरण स्वामित्व (title) का नहीं, बल्कि संरक्षित स्मारक के धार्मिक चरित्र के निर्धारण का था। इसके लिए न्यायालय ने ऐतिहासिक साहित्य, स्थापत्य विशेषताओं और ASI के बहु-विषयक वैज्ञानिक सर्वेक्षण को आधार बनाया तथा अयोध्या निर्णय के 10 सिद्धांतों को मार्गदर्शक के रूप में अपनाया।

          एड. शीर्ष अग्रवाल, जबलपुर

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