राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष केवल उत्सव नहीं, भारत की आत्मा और नेतृत्व-दर्शन को समझने का ऐतिहासिक अवसर
सत्ता से नहीं, संस्कार से बनता है नेतृत्व
विश्व राजनीति जहाँ प्रचार और प्रबंधन तक सीमित है, वहाँ भारत ने सेवा, अनुशासन और समर्पण को नेतृत्व का आधार बनाया
विश्व राजनीति में आज “नेतृत्व” शब्द का अर्थ प्रायः चुनाव, सत्ता, प्रचार और जनसमर्थन तक सीमित होकर रह गया है। आधुनिक लोकतंत्रों में नेतृत्व को अक्सर चुनावी रणनीतियों, छवि निर्माण और सामाजिक माध्यमों की लोकप्रियता से मापा जाता है। ऐसे नेतृत्व का प्रभाव कई बार तात्कालिक और परिस्थितिजन्य होता है।
किन्तु भारत की सभ्यता ने नेतृत्व को सदैव एक अलग दृष्टि से देखा है। यहाँ नेतृत्व केवल पद प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसंयम, त्याग, अनुशासन और राष्ट्रसेवा की साधना माना गया है। भारत की इसी परंपरा को यदि किसी संगठन ने सबसे व्यापक और दीर्घकालिक रूप में जीवित रखा है, तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है।
सन् 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित यह संगठन आज अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। एक छोटे से वैचारिक बीज से प्रारंभ हुआ यह प्रयास आज सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जीवन के विशाल वटवृक्ष के रूप में दिखाई देता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसने व्यक्ति नहीं, विचार को केंद्र में रखा; पद नहीं, बल्कि राष्ट्र को सर्वोपरि माना।
संघ का मूल दर्शन: व्यक्ति से ऊपर राष्ट्र
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति विश्व के अनेक संगठनों से भिन्न दिखाई देती है। यहाँ नेतृत्व का निर्माण प्रचार अभियानों से नहीं, बल्कि वर्षों की साधना, अनुशासन और सामाजिक कार्यों से होता है।
संघ के हजारों प्रचारक व्यक्तिगत जीवन की सुविधाओं, पारिवारिक अपेक्षाओं और निजी महत्वाकांक्षाओं का त्याग कर समाज और राष्ट्र के लिए स्वयं को समर्पित करते हैं। यह त्याग केवल वैचारिक घोषणा नहीं, बल्कि जीवन पद्धति का हिस्सा है।
किसी प्रचारक का जीवन देखें तो उसमें व्यक्तिगत वैभव कम और राष्ट्र के प्रति समर्पण अधिक दिखाई देता है। यही कारण है कि संघ की शक्ति केवल मंचों पर नहीं, बल्कि समाज के भीतर कार्यरत हजारों स्वयंसेवकों के माध्यम से अनुभव की जाती है।
नेतृत्व जो पद से नहीं, तपस्या से उभरता है
भारतीय जनजीवन में अनेक ऐसे व्यक्तित्व उभरे जिन्होंने संघ की कार्यसंस्कृति से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
माधवराव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने अपने बौद्धिक वैभव को संगठन निर्माण की साधना में समर्पित किया। दीनदयाल उपाध्याय ने “अंत्योदय” का दर्शन देकर राजनीति को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का विचार प्रस्तुत किया। नानाजी देशमुख ने ग्रामीण विकास और स्वावलंबन का मॉडल खड़ा किया।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान राष्ट्रीय एकता की चेतना का प्रतीक बना। इसी परंपरा में अनेक प्रचारक और स्वयंसेवक बिना किसी व्यक्तिगत प्रचार के दशकों से शिक्षा, सेवा, आपदा राहत, ग्राम विकास और सामाजिक समरसता के क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं।
वर्तमान भारत के राजनीतिक परिदृश्य में भी संघ की कार्यशैली और वैचारिक अनुशासन का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जीवन भी इसी पृष्ठभूमि से उभरे नेतृत्व का उदाहरण माना जाता है, जहाँ साधारण परिवेश से निकलकर संगठनात्मक अनुशासन और दीर्घ सामाजिक अनुभव ने राष्ट्रीय नेतृत्व का स्वरूप ग्रहण किया।
बदलते भारत में संघ की प्रासंगिकता
आज भारत सामाजिक, राजनीतिक और वैश्विक स्तर पर एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक ओर तकनीकी प्रगति, आर्थिक विस्तार और वैश्विक प्रभाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक विघटन, वैचारिक विभाजन, उपभोक्तावाद और स्वार्थ की प्रवृत्तियाँ भी तेज़ हो रही हैं।
ऐसे समय में अनुशासन, सेवा और राष्ट्रप्रथम की भावना पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। संघ की शाखाओं में केवल शारीरिक गतिविधियाँ नहीं होतीं, बल्कि सामूहिकता, समयबद्धता, सहयोग, संयम और सामाजिक दायित्व की भावना विकसित की जाती है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संघ ने भारतीय समाज में संगठन और सेवा की संस्कृति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
शिक्षा और समाज को क्या सीखने की आवश्यकता?
आज की शिक्षा व्यवस्था में करियर और प्रतिस्पर्धा पर अत्यधिक बल दिया जा रहा है, लेकिन चरित्र निर्माण और सामाजिक उत्तरदायित्व का पक्ष कमजोर पड़ता दिखाई देता है।
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में यह संदेश अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचना चाहिए कि सच्चा नेतृत्व केवल अधिकार प्राप्त करने से नहीं, बल्कि दायित्व निभाने से बनता है।
प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को यह समझना होगा कि शासन केवल करियर नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी है।
पत्रकारिता और मीडिया को भी केवल नकारात्मकता और विवादों तक सीमित रहने के बजाय उन व्यक्तित्वों और संगठनों के कार्यों को सामने लाना चाहिए जो निस्वार्थ सेवा और सामाजिक समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
परिवार और समाज के लिए भी एक संदेश
भारत में पारिवारिक विघटन और सामाजिक तनाव की बढ़ती घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि समाज में त्याग और सामूहिकता की भावना कमजोर पड़ रही है।
संघ की कार्यपद्धति यह सिखाती है कि व्यक्ति यदि अपने छोटे-छोटे स्वार्थों से ऊपर उठे, तो समाज में सहयोग और एकता का वातावरण बन सकता है।
आज आवश्यकता केवल राजनीतिक परिवर्तन की नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण की भी है।
विश्व को भारत क्या संदेश दे सकता है?
पश्चिमी देशों में नेतृत्व को प्रबंधन और कौशल के रूप में देखा जाता है। वहाँ नेतृत्व पर शोध, प्रशिक्षण और कॉर्पोरेट मॉडल विकसित किए जाते हैं।
भारत ने नेतृत्व को सदैव संस्कार, सेवा और आत्मानुशासन के रूप में देखा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी भारतीय दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है।
यह संगठन इस बात का उदाहरण है कि कोई राष्ट्र केवल राजनीतिक शक्ति से महान नहीं बनता; उसके पीछे सेवा, संगठन और सांस्कृतिक चेतना की दीर्घ परंपरा भी होती है।
मुद्दे की बात
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष केवल एक संगठन का उत्सव नहीं, बल्कि भारत की उस नेतृत्व परंपरा का स्मरण है जिसमें त्याग, अनुशासन और राष्ट्रसेवा सर्वोपरि मानी गई।
मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन किसी भी संगठन या विचारधारा का मूल्यांकन उसके दीर्घकालिक सामाजिक योगदान और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका के आधार पर होना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपने नेतृत्व मॉडल को केवल राजनीतिक सफलता तक सीमित न रखे, बल्कि सेवा, संस्कार और सामाजिक समर्पण की उस परंपरा को भी मजबूत करे जिसने इस राष्ट्र को कठिन परिस्थितियों में भी जीवित और संगठित बनाए रखा।
यदि भारत को वास्तव में विश्व में नैतिक और सांस्कृतिक नेतृत्व स्थापित करना है, तो त्याग और सेवा पर आधारित इस भारतीय नेतृत्व-दर्शन को समझना, स्वीकार करना और नई पीढ़ी तक पहुँचाना अनिवार्य होगा।
-विनोद गुप्ता
वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष — पत्रकार विकास परिषद, भारत
