घुमंतू जातियों में अहिल्याबाई की सफल सोशल इंजीनियरिंग

यदि हम भारत की वीर, आध्यात्मिक, शासक, योद्धा, समाज सुधारक, क्रांतिकारी, चिंतक-विचारक, स्थापत्य विशेषज्ञ, राष्ट्रवादी, महिलाओं की चर्चा करें तो कदाचित् हमें हजारों, लाखों मातृ शक्ति की एक सूची बनानी पड़ेगी।
किंतु, उपरोक्त सभी गुण किसी एक स्त्री में देखने की दृष्टि का मापदंड यदि हम लगायेंगे, तो संभवतः एक ही नाम सामने आएगा। और, वह नाम होगा, पुण्यश्लोक, लोकमाता, देवी अहिल्याबाई का। अहिल्याबाई में उपरोक्त लिखित सभी गुण एकसाथ विद्यमान थे। संक्षेप में अहिल्या बाई गुणों की एक अनहद खान थी।


वह कालखंड बड़ा ही भयंकर व भयावह था जब माता अहिल्या ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ली थी। उस समय उनका राज्य विदेशी शक्तियों के अतिरिक्त आंतरिक शत्रुओं से भी भरा पड़ा था। उस समय में मालवा में चहुँओर अशांति का, हाहाकार का वातावरण बना हुआ था। मालवा, मराठों, राजपूतों के कई-कई छत्रप, योद्धा, सूबेदार, सेनापति आदि मालवा की गद्दी पर अहिल्या बाई को विराजित होने से रोकने हेतु कई-कई दुरभिसंधियां कर रहे थे।


होलकर परिवार की बहू देवी अहिल्या के सिंहासन पर बैठने के पूर्व का घटनाक्रम कोई सरल, सहज व सीधा-सीधा नहीं था। कई चाले चली गईं, कई भीतरी वार हुए, कई षड्यंत्र हुए, कई संघर्ष हुए, कई विरोधाभास हुए। अहिल्याबाई के कई अपने सगे, सम्बंधी, शुभचिंतक भी अपनेपन का चोला पहनाकर शत्रुओं के ख़ेमे आते-जाते दिखे।
उस कालखंड में मध्यप्रदेश के निमाड़ से लेकर मालवा एवं मालवा से लेकर सुदूर राजस्थान तक मुगलों व अंग्रेज़ों के षड्यंत्रों के कारण बड़ी संख्या में विवशता से जातियां अपराधी हो गईं थीं। अंग्रेज अपनी सैन्य शक्ति से जिस क्षेत्र को चाहते उसे कब्ज़ा लेते, वहाँ के संसाधनों पर कब्ज़ा करके उनका मनमाना दोहन करते व वहां के अंग्रेज विरोधी मूल निवासियों को वहाँ से पलायन हेतु विवश कर देते थे। इस क्षेत्र की गोंड, भील, रामोशी जैसी वनवासी जनजाति के लोग जो अपनी शुचिता, श्रम, रचनात्मकता, उत्पादकता, प्रकृति पूजक के रूप में जाने जाते थे वे लोग विदेशी आक्रांताओं के कारण चोर-डकैत कहलाने लगे थे। अंग्रेजों की परतंत्रता को अस्वीकार्य करने वाले इन वीर जनजातीय की समूची जातियों के बाल, आबाल, वृध्दों, निराश्रितों, निःशक्तों को भी शासकीय रूप से अपराधी जाति घोषित कर दिया जाता था। परिस्थिति यह बन गई थी कि ये बेचारे वनवासी बंधु दिन में वनों में ही छिपे रहते थे व बेबस होकर अपने बच्चों व आश्रितों का पेट पालने हेतु अपराध करने लगे थे।


इतिहास साक्षी है कि भगवान बड़ादेव या फड़ापेन या महादेव की अनन्य भक्त ये वनवासी बंधु घोर प्रकृति पूजक थे। भारत की वन्य संपदा इन वनवासी बंधुओं के दम पर ही फलती-फूलती थी व भारत को धन-धान्य से लबालब भर देती थी। विदेशी मुस्लिम व ईसाई आक्रांताओं के कारण अब सामाजिक परिदृश्य यह बना कि ये बलिष्ठ व श्रमशील जातियां अपराधी बन गईं। ये लूटपाट करने लगे। मार्गों में यात्रियों का यात्रा करना दूभर हो गया। कौन जाने कब किस मार्ग में ये लुटेरे आ जाएँ और यात्रियों का सबकुछ लूटकर ले जाएँ। लूटने के अतिरिक्त इनमें से कुछ वनवासियों ने आजीविका हेतु एक नई शैली भी अपना ली थी, इसके अन्तर्गत वे वनों के भीतर से निकलने वाले मार्गों के यात्रियों से एक प्रकार का कर वसूलते थे जिसे ‘भील कौड़ी’ कहा जाता था। वनवासी इस कर की वसूली सख़्ती से करते थे व न देने पर यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार करते व दंड देते थे। इस भयपूर्ण वातावरण में लोकमाता अहिल्या ने इस समस्या के मूल को समझा और जाना।


अहिल्या बाई केवल एक महारानी या राजा ही नहीं थी। उनके मानस में एक कुशल नीति-निर्माता बसा हुआ था। इसी का परिणाम था कि एक उनके दरबार में किसी अंग्रेज हथियार विक्रेता के आने पर अहिल्या बाई ने उनसे केवल तीन बंदूक़ें ख़रीदी। उस समय उनके दरबार में बैठे सभी राज दरबारी व वह अंग्रेज व्यापारी भी आश्चर्यचकित किंतु दुखी हो उठा कि इतने बड़े राज्य की महारानी ने उनसे केवल तीन बंदूक़ें ही खरीदी। तब जब राज्य की सुरक्षा हेतु आवश्यकता सैकड़ों बन्दूकों की थी तब तीन बंदूक खरीदना भला किसे अच्छा निर्णय लगता?! किंतु अहिल्याबाई के मानस में तो जैसे एक कुशल व्यापारी भी बैठा रहता था। उन्होंने मात्र तीन बंदूकें क्रय करके अपने राज्य के भील समाज के लोहारों की बैठक बुलाई व गुप्त रूप से बड़े पैमाने पर ऐसी बंदूक़ें बनाने की चुनौती उनके समक्ष रख दी। भील लोहार समाज ने भी महारानी की इस चुनौती को स्वीकारा व उन्हें निराश नहीं होने दिया। उन्होंने बाद में अपने राज्य की स्वयं की टकसाल (मिंट) भी बनवाई थी जहां उनकी राजमुद्रा की ढलाई की जाती थी। अपने इन कार्यों से महारानी ने दोहरे लक्ष्य साधे थे, एक तो उनके राज्य का धन बाहरी राज्यों में जाने से बच जाता था और दूसरा लाभ यह था कि इस माध्यम से उन्होंने लूट-पाट व अपराधी प्रवृत्ति वाले समाजों को रचनात्मकता में लगाकर उनका जीवन बदल दिया था। लोकमाता अहिल्या बाई के कार्यकाल में अपराधी जातियां उत्पादक जातियों में परिवर्तित होकर समाज में सम्मानजनक रूप से अपना जीवन यापन करने लगी थी।


लोकमाता ने इन वनवासी बंधुओं से जिन्हें अपराधी जाति कहा जाने लगा था, उन्हें सम्मानपूर्वक अपने राज दरबार में आमंत्रित कर उनसे संवाद किया। वे एक बड़ी सोशल इंजीनियरिंग की योजना पर काम कर रहीं थीं, यह उसका एक भाग था। बहुत से जनजातीय समूह राज दरबार में आये और महारानी से संतुष्ट हुए। कुछ समूह जो महारानी के राज दरबार में नहीं आये व उनकी अवज्ञा की उनसे भी लोकमाता अहिल्या ने कोई दुर्व्यहार नहीं किया और ना ही उन्हें दंडित किया, बल्कि वे स्वयं वनों में जाकर उनसे मिलीं और उनके पुनर्वास हेतु उन्हें समझाया और संतुष्ट किया। जो महारानी के समझाने से नहीं समझें उन्हें बंदी बनाकर बंदीगृह में लाया गया। बंदीगृह में भी उन्हें पहले दंडित नहीं करके, पुनः समझाया बुझाया गया और सद्मार्ग पर चलने हेतु प्रवचन सत्रों में बैठाया गया। इस प्रकार इन जबरन अपराधी घोषित कर दी गई जातियों के बंधुओं पर लोकमाता ने एक बड़ी सोशल इंजीनियरिंग की योजना चलाई थी व इन्हें ठीक किया था। माता अहिल्या इन बलिष्ठ, श्रमशील, प्रकृति के विशेषज्ञ, औषधियों व वनोपजों के विशेषज्ञों के गुणों का उपयोग करने की एक बड़ी योजना पर काम कर रहीं थीं।

अंततः लोकमाता ने इन अपराधी जातियों को अपने राज्य में बसाया, इन्हें अभयदान दिया और इन्हें सरंक्षित किया। इन अहिल्या सरंक्षित जनजातियों ने मालवा की वन संपदा को सरंक्षित किया और उसे विकसित किया। कालांतर में बहुत से बलिष्ठ लुटेरे व डकैत महारानी की सेना में नियुक्त हुए व अपनी राज्य निष्ठा सिद्ध करके बड़े-बड़े सैन्य पदों पर आसीन हुए। इन वनवासी बाहुबलियों के दम पर महारानी ने अपनी सैन्य शक्ति को द्विगुणित कर लिया था। इस प्रकार एक बड़ी नकारात्मक शक्ति को लोकमाता ने अपनी स्वप्नशील व संकल्पशील कर्मण्यता से रचनात्मक शक्ति में परिवर्तित कर दिया था। जिस सोशल इंजीनियरिंग को अब जाना-पहचाना जाने लगा है और विदेशी शिक्षा को इसका जनक माना जाता है वह सोशल इंजीनियरिंग माता अहिल्या ने आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व भारत में कर दी थी। वस्तुतः यह सोशल इंजीनियरिंग हमारें रामायण, महाभारत से लेकर वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर देखने-पढ़ने को मिलती है। लोकमाता अहिल्या अपने धार्मिक, वैदिक साहित्य की साधना, पठन-पाठन व मनन से ही यह सब दुर्लभ्य व दुर्लक्ष्य कार्यों को कर पाई थीं।


डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी

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