मूल निवासी दिवस समाज को विघटित करने का षड्यंत्र – प्रोफेसर मनीषा शर्मा
9 अगस्त को विश्व मूल निवासी दिवस मनाया जाता है। मूल निवासियों को उनके अधिकार देने हेतु ,उनकी समस्याओं पर ध्यान और उसके समाधान हेतु, उनकी भाषा, परम्पराओं के संरक्षण हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा जेनेवा में 09 अगस्त 1994 को विश्व के मूल निवासियों के प्रतिनिधियों का प्रथम अंतराष्ट्रीय मूल निवासी सम्मेलन आयोजित किया गया।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिवस के आयोजन पर विचार करते हुए विभिन्न संदर्भ और इतिहास देखते हुए माना कि विश्व में बसे मूल निवासियों को उपनिवेशकारी शक्तियों द्वारा उनकी जड़ों से अलग किया गया। उन पर अन्याय,अत्याचार कर उनके मूल अधिकारों से वंचित किया गया। औपनिवेशिक शक्तियो द्वारा मूल निवासियों को उनकी भूमि से बेदखल कर उनकी भूमि से वंचित कर उनके देश पर कब्जा किया गया।
ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अफ्रीका अमेरिका ऐसे देश में इन मूल निवासियों के साथ अत्याचार कर उन्हें दबाया गया और उन पर शासन किया गया, उनका नरसंहार किया गया। इन उपनिवेशवादी शक्तियों के चंगुल से जो लोग जिंदा रहे उन लोगों के वंशज आज अपने सम्मान के लिए,अपनेअधिकार के लिए, अपने स्वाभिमान के लिए लगातार संघर्ष कर रहे है।
इन्हीं मूल निवासियों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व मूल निवासी दिवस घोषित किया है जो की 9 अगस्त को मनाया जाता है। अब बात कर ली जाए भारत की तो भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र की इस बात का समर्थन करते हुए ऐसे लोगों के प्रति संवेदना जाहिर करते हुए कहा था कि वह हमेशा उनके स्वाभिमान, सम्मान की रक्षा के लिए तत्पर है और उनके संघर्ष में सदैव साथ खड़ा है। कुछ वर्षों से भारत में भी इस दिवस को आदिवासी गौरव दिवस के रूप में मनाने का प्रचलन हो गया है। लेकिन इस दिवस को मनाने का जो कारण है वो भारत के संदर्भ में लागू नहीं होता।
भारत में जनजाति समाज को मूल निवासी दिवस के साथ जोड़कर समाज में एक अलग ही तरह का षड्यंत्र फैलाने का प्रयास किया जा रहा है। विश्व मूल निवासी दिवस को आदिवासी दिवस या आदिवासी गौरव दिवस के रूप में मनाया जा रहा है और बताया जा रहा है कि आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए इस दिन को पूरी तरह से गौरव के साथ मनाना चाहिए। ये राजनीतिक उद्देश्य और समाज को जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा के नाम पर तोड़ने वाले वामपंथ की सोच है। जिनका मूल मकसद ही समाज में संघर्ष का वातावरण बना उसे तोड़ना है।
जनजाति युवाओं को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर राजनीतिक पार्टिया लोगो और समाज में एक तरह का संघर्ष पैदा कर अलगाव उत्पन्न करने का कार्य कर रही है। जनजाति समाज हमारे ही देश की संस्कृति का, हमारा अभिन्न अंग है वह किसी भी प्रकार से हमसे अलग नहीं है। ये बंधु हमारे देश के सांस्कृतिक सूत्र में बंधे हुए हैं उन्हें ऐसे दिवस को मनाने की आवश्यकता नहीं है। यह पश्चिम की देन है। यह वस्तुत: अंग्रेजों के अपराध बोध को स्वीकार करने के दिन के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस शोक दिवस है, उपनिवेशवादी दासता के कारण उन लोगों पर हुए अत्याचार को याद कर उस पर पश्चाताप करने का दिन है। इसे जनजातीय समाज द्वारा गौरव दिवस के रूप में मनाना एक झूठे विमर्श का हिस्सा है।
भारत के सभी लोग भारत के मूल निवासी है। मूल निवासी के नाम पर एक विभाजनकारी रेखा खींची जा रही है। अतः मूल निवासी के नाम पर किसी भी तरह का संघर्ष, पृथक्करण, अलगाव हमारे देश की एकता के लिए एक सुनियोजित खतरा है। हमें इस भ्रामक विचार के जाल में नहीं आना चाहिए।
लेखिका शिक्षाविद् है।
